श्रद्धेय की लेश्या से जुड़ें

संतों के चरणों में बैठने का आनंद आपने अनुभव किया होगा। उनके सान्निध्य में उनका आभा-मंडल हमें प्रभावित करना आरंभ कर देता है। उनकी लेश्या हममें अपना प्रभाव प्रवाहित करती है जिससे हममें परिवर्तन होने लगता है। यह लेश्या का खेल है। अपनी लेश्या को बदलने की सीधी सरल प्रक्रिया है- इष्ट की आराधना। अपने श्रद्धेय की भक्ति में मग्न होने से लेश्या का जो शुभ संचार होता है, उसका वर्णन शब्दों से नहीं कर सकते हैं।

जो कृपा आप अपने श्रद्धेय से ग्रहण कर रहे हैं, उसमें अपार शक्ति होती है। कृपा-दृष्टि या कृपा-स्पर्श से एक क्षण में हत्यारे का जीवन भी बदल जाता है। इसका सिद्धांत है कि आप जिनका ध्यान करते हैं, उनकी लेश्या को ग्रहण करने में समर्थ बन जाते हैं।

आप तीर्थंकर प्रभु का केवलज्ञान ग्रहण नहीं कर सकते हैं परंतु तीर्थंकर के आभामंडल में पहुँच कर उनकी आभा को ग्रहण करके उससे प्रभावित अवश्य हो सकते हैं। आप तीर्थंकर का चरित्र अंगीकार नहीं कर सकते हैं परंतु तीर्थंकर के आभा-वलय में पहुंचकर अपने मन, वचन व काया को रूपांतरित कर सकते हैं। कोई भी व्यक्ति ऐसा कर सकता है। लेश्या का गणित केवल इतना ही है।

रूपस्थ ध्यान करें

अनेक परंपराओं में आत्मा के दिव्य स्वरूप पर ध्यान किया जाता है। इसे रूपस्थ ध्यान कहते हैं। इसमें आराध्य के रूप, रंग, रस तथा स्पर्श का ध्यान करते हैं। उनके दिव्य स्वरूप एवं असाधारण गुणों पर ध्यान करते हैं। तीर्थंकर प्रभु का ध्यान करने के लिए श्री चिन्तामणि पार्श्वनाथ स्तोत्र का यह श्लोक उत्तम है-

किं कर्पूरमयं सुधारसमयं किं चंद्ररोचिर्मयं,
किं लावण्यमयं महामणिमयं कारुण्य केलीमयं।
विश्वानंदमयं महोदयमयं शोभामयं चिन्मयं,
शुक्लध्यानमयं वपुर्जिनपतेर्भयाद भवालम्बन।

अर्थात् कपूर के समान शुद्ध व श्वेत जिनका रूप है, अमृतमय जिनका रस है, चन्द्रमा के समान जो शीतल हैं, लावण्य युक्त महामणि के समान, करुणा से ओतप्रोत, आनंद से परिपूर्ण, शोभामय, शुक्ल ध्यान से युक्त उस प्रभु का शरीर है।
यहाँ रक्त तथा माँस से निर्मित औदारिक शरीर का नहीं अपितु प्रभु के ध्यानमय शरीर का वर्णन है। उसका ध्यान करें।

संघ साधना करें

संघ साधना अर्थात् मिल-जुलकर धार्मिक क्रियाओं में भाग लेना। संघ-साधना पर इसलिए बल दिया जाता है, क्योंकि इसमें सभी साधक अपनी लेश्या को उत्कृष्ट स्तर पर ले जा सकते हैं। यही तीर्थंकर परमात्मा की संघ व्यवस्था का सूत्र है। जो संघीय भाव में रहते हैं, वे अन्तेवासी कहलाते हैं। अन्तेवासी अर्थात् जो तन से समीप न होकर भी अपने गुरु की लेश्या के समीप होते हैं। इसलिए संघ साधना पर बल दें एवं अपनी आत्मा का उत्थान करें।

गुणीजनों के गुण गाएँ

जब आप किसी की प्रशंसा, गुणगान, अनुमोदना करते हैं, तब उस अनुमोदना के माध्यम से उन तपस्वियों, गुणीजनों, श्रद्धेय-महापुरुषों की लेश्या को ग्रहण करते हैं। कदाचित् वे समीप हैं या दूर, जीवित हैं या नहीं, आप अनुमोदना की शक्ति से उनकी लेश्या को ग्रहण कर सकते हैं। जैसे आप उनकी शुभ लेश्या ग्रहण करने लगेंगे, वैसे भीतर में पवित्रता का संचार आरंभ होगा, जिससे आपका चरित्र भी पवित्र होता जाएगा। तीर्थंकर की ऊर्जा संपूर्ण लोक में व्याप्त है, आप उस ऊर्जा को निरंतर ग्रहण करते रहें। (जैन धर्म में इस लोक को चौदह रज्जु लोक कहा जाता है।)

प्रार्थना को अपनी दिनचर्या में ढालें

प्रार्थना में असीम ग्रहण शक्ति है। आप किसी भी धर्म परंपरा के अनुयायी हैं, किसी भी भाषा में ईश्वर से आंतरिक संवाद करें, आप उस ऊर्जा शक्ति को ग्रहण कर सकते हैं। जैसे-जैसे उस ऊर्जा को ग्रहण करते हैं, वैसे-वैसे अंदर में शुभ परिवर्तन होने लगते हैं।

प्रवीण ऋषि
प्रवीण ऋषि

यदि कभी भटक गए या कहीं अटक गए, तब पुनः अपने मूल स्रोत को ग्रहण करें। इसलिए जैनियों के पास पंच परमेष्ठी है, ब्राह्मणों की त्रिकाल संध्या है, मुसलमानों में नमाज की परंपरा है। हर परंपरा में त्रिकाल या चौकाल संध्या का उल्लेख है। मुसलमान दिन में पाँच बार नमाज पढ़ते हैं, ब्राह्मण परंपरा में तीन बार संध्या करते हैं। इन सभी का एक ही परम लक्ष्य है- परमात्मा की शुभ लेश्या से जुड़ना।

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