बेहद ज़रूरी है वायु प्रदूषण पर नियंत्रण!

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किसी भी समस्या का समाधान उसकी गंभीरता को समझने के बाद ही निकाला जा सकता है, जिसके लिए ठोस व विश्वसनीय डाटा की आवश्यकता हो सकती है। डाटा में हाथ की सफाई दिखाने से हेडलाइंस तो हासिल की जा सकती हैं, लेकिन ज़मीनी स्थिति को नहीं बदला जा सकता। इसलिए दिल्ली या मुंबई में वायु प्रदूषण की वास्तविक स्थिति जानने के लिए पर्याप्त निगरानी स्टेशन होने चाहिए और ईमानदारी से रिपोर्टिंग की जानी चाहिये। समस्या को समझने व उसका हल निकालने के लिए ग्रैनुलर डाटा की ज़रूरत है। पूरे भारत में धूल की वजह से वायु की गुणवत्ता सबसे अधिक प्रभावित होती है।

अगर आप दिल्ली के ज़हरीले वायु प्रदूषण से बचने के लिए देहरादून जाने की योजना बना रहे हैं, तो दो बार सोच लीजिये। अब उत्तराखंड की राजधानी की वायु गुणवत्ता भी चिंताजनक है। देहरादून का भी एक्यूआई (एयर क्वालिटी इंडेक्स) लगभग 300 हो गया है। अगले कुछ दिनों के दौरान घने कोहरे की वजह से स्थिति बद से बदतर होने का अनुमान मौसम वैज्ञानिकों को है।

दरअसल बात सिर्फ दिल्ली या देहरादून की ही नहीं है, देश के जिन क्षेत्रों में एक्यूआई बर्दाश्त की हदों में रहता था, वहां भी हवा का मिज़ाज अच्छा नहीं है। इसलिए यह आश्चर्य नहीं है कि दैनिक अख़बार कोहरे के कारण हो रही दुर्घटनाओं की खबरों से भरे हुए हैं। यमुना एक्सप्रेस वे पर तो कुछ दिन पहले जीरो विज़िबिलिटी की वजह से 19 वाहन आपस में टकराये, भीषण आग लगी और 16 व्यक्ति इस दुर्घटना से बुरी तरह से जलकर मरे। स्थिति इतनी खौफनाक थी कि लाशों की शिनाख्त भी न हो सकी।

पीएम 2.5 बना ‘साइलेंट किलर’, सालाना 20 लाख समयपूर्व मौतें

उधर लखनऊ में भारत व दक्षिण अफ्रीका के बीच चौथा टी-20 मुकाबला खेला जाना था, दर्शक स्टैंड्स में थे, खिलाड़ी अंधेरे में थे और मैच को धुंध खा गई। संक्षेप में बात इतनी सी है कि फॉग (कोहरा) स्मोग (धुंधभरी ज़हरीली हवा) बन गया है, देश के अधिकतर हिस्से पर छाया हुआ है और जीवन को अस्त-व्यस्त किये हुए है। स्टेट ऑ़फ ग्लोबल एयर रिपोर्ट 2025 के अनुसार भारत में पीएम 2.5 (खराब या ज़हरीले वायु प्रदूषण) और घरेलू प्रदूषण के कारण सालाना 20 लाख से अधिक समय-पूर्व मौतें होती हैं, जोकि भारत में कोविड-19 से भी बड़ी कातिल हैं।

चिंताजनक एक्यूआई की वजह से हृदय रोग, स्ट्रोक्स, श्वांस संबंधी बीमारियां और फेफड़ों के कैंसर में भयावह वृद्धि हो रही है यानी एक्यूआई जब 300-400 या उससे ऊपर हो जाता है, जैसा कि इस समय दिल्ली के लक्ष्मी नगर, आनंद विहार आदि क्षेत्रों में है, तो हर किसी को प्रभावित करने लगता है, लेकिन गरीबों पर इसका अत्यधिक कुप्रभाव पड़ता है। भारत में वायु प्रदूषण (विशेषकर शहरों में) कम करने के लिए अक्सर सुझाव दिया जाता है कि चीन का अनुसरण किया जाना चाहिए।

यह सही है कि चीन ने शहरी वायु प्रदूषण पर ज़बरदस्त नियंत्रण स्थापित किया है, उसकी कुछ योजनाएं अध्ययन योग्य भी हैं, लेकिन एक तानाशाह सरकार वह परिवर्तन लागू कर सकती है, जो लोकतंत्र नहीं कर सकता और साथ ही भारत चीन जितना पैसा खर्च करने की स्थिति में भी नहीं है। इसलिए बीजिंग, नई दिल्ली के लिए मॉडल नहीं हो सकता। हमें अपने ही मॉडल तलाश करने होंगे।

संसद में प्रदूषण पर बहस नहीं, समाधान की कमी पर उठे सवाल

इसलिए संसद में इस विषय पर चर्चा होना जरूरी था ताकि कुछ अच्छे सुझाव सामने आते, लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि हमारे जनप्रतिनिधियों ने सोच लिया है कि वायु प्रदूषण का कोई हल नहीं है, यह मौसमी समस्या है, अत वह ग़ैर-ज़रूरी बहसों में संसद का शीतकालीन सत्र का समय बर्बाद करते रहे, जिसकी अवधि मात्र 1 से 19 दिसंबर 2025 तक रही। ज्ञात रहे कि वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने के समाधान रॉकेट साइंस नहीं है, बस ज़रूरत वास्तविक प्रशासनिक इच्छा की है।

बहरहाल भारत में स्मोग की समस्या इतनी कड़वी सच्चाई है कि इसके अस्तित्व को स्थापित करने के लिए आपको लोकसभा में बहस की आवश्यकता नहीं है – यह तो स्पेस से भी दिखायी देती है। इसलिए इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि इस विषय पर लोकसभा में जो बहस 18 दिसंबर 2025 को होनी थी, जिसकी लम्बे समय से प्रतीक्षा थी, वह हुई ही नहीं। दरअसल, हमें बहस नहीं, समाधान चाहिए ताकि दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, अहमदाबाद, देहरादून, छोटे शहर, बड़े शहर, गांव व क़स्बे ज़हरीली हवा से घुटकर मरने से बच जाएं।

सेंटर फ़ॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर का अनुमान है कि अकेले दिल्ली में 2023 में वायु प्रदूषण के कारण 17,200 व्यक्तियों की जानें गई थीं। कुल मिलाकर राष्ट्रीय राजधानी में वायु प्रदूषण हर साल 4.9 लाख स्वस्थ लोगों को बीमार कर देता है। इसलिए स्टेट ऑ़फ ग्लोबल एयर रिपोर्ट 2025 का यह डाटा सही प्रतीत होता है कि भारत में वायु प्रदूषण के कारण हर वर्ष 20 लाख से अधिक लोग अपनी मौत से पहले ही मर जाते हैं।

बीजिंग से लंदन तक, सख्त नीतियों से हवा हुई साफ

लम्बे समय तक यह बात दोहरायी जाती रही है कि ज़हरीली हवा विकास का साइड-इफ़ेक्ट है। क्या 1940 के दशक में लॉस एंजेल्स अपनी स्मोग के लिए कुख्यात नहीं था? लंदन में चार्ल्स डिकंस के युग से 1952 के घातक सप्ताह तक 12,000 व्यक्ति खराब हवा के कारण मरे थे। दिल्ली से दो दशक पहले बीजिंग के सिर पर प्रदूषित राजधानी का ताज था और ज़हरीली हवा हर साल 20 लाख चीनियों की जान ले लेती थी। ये सब बातें सच हैं। लेकिन अमेरिका, इंग्लैंड, चीन व अन्य देशों ने दिखाया है कि वायु प्रदूषण का होना लाज़मी नहीं है। उसे नियंत्रित किया जा सकता है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कुछ दिन पहले ही दुनिया के सबसे गरीब मुल्कों में से एक इथोपिया में थे, जिसकी राजधानी अदीस अबाबा की आबोहवा इतनी साफ व स्वच्छ है कि दमे का मरीज़ भी खुलकर सांस ले सकता है व सीधा नल या तालाब से पानी पी सकता है। अगर बीजिंग में नीला आसमान दिखायी दे सकता है तो दिल्ली में क्यों नहीं? तानाशाही बनाम लोकतंत्र का बहाना नहीं दिया जा सकता; क्योंकि लंदन ने शत-प्रतिशत लोकतंत्र के साथ अपनी हवा को 70 प्रतिशत स्वच्छ कर दिया है। हां, लोकतंत्र को अपने समाधान खुद तलाश करने होते हैं जोकि तानाशाही से जुदा होते हैं। वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए हमारे कुछ सुझाव हैं, जिन्हें सरकार विचार करके अपना सकती है।

किसी भी समस्या का समाधान उसकी गंभीरता को समझने के बाद ही निकाला जा सकता है, जिसके लिए ठोस व विश्वसनीय डाटा की आवश्यकता हो सकती है। डाटा में हाथ की सफाई दिखाने से हेडलाइंस तो हासिल की जा सकती हैं, लेकिन ज़मीनी स्थिति को नहीं बदला जा सकता।

यह भी पढ़ें… क्या वामपंथ का आखिरी किला भी ढहने वाला है?

निजी वाहनों की बढ़ती संख्या से शहरों में प्रदूषण और हरियाली पर असर

इसलिए दिल्ली या मुंबई में वायु प्रदूषण की वास्तविक स्थिति जानने के लिए पर्याप्त निगरानी स्टेशन होने चाहिए और ईमानदारी से रिपोर्टिंग की जानी चाहिये। समस्या को समझने व उसका हल निकालने के लिए ग्रैनुलर डाटा की ज़रूरत है। पूरे भारत में धूल की वजह से वायु की गुणवत्ता सबसे अधिक प्रभावित होती है।

धूल 40 प्रतिशत पीएम 10 और 30 प्रतिशत पीएम 2.5 पार्टिकल्स बनाती है, दिल्ली की गर्मी की हवा में। शहरों में धूल निर्माण साइट्स व कच्चे रास्तों से उठती है। इसलिए निर्माण साइट्स को ढकने व पानी दिये जाने को सख्ती से लागू किया जाये। साथ ही शहरों में व उनके आसपास हरियाली बढ़ाना भी ज़रूरी है। लाखों कारें, हज़ारों बसों से अधिक प्रदूषण फैलाती हैं। कारों को पार्किंग के लिए भी अधिक जगह चाहिए होती है, जिससे सार्वजनिक हरे-भरे क्षेत्रों पर कुप्रभाव पड़ता है।

इसलिए बड़ी तादाद में आरामदायक व अच्छा पब्लिक ट्रांसपोर्ट होना भी आवश्यक है। भारत के अधिकतर प्राइवेट वाहन पुराने व प्रदूषण फैलाने वाले हैं। सरकार इनके मालिकों को इंसेंटिव दे कि वह इन्हें कबाड़ में निकाल दें। चूंकि वाहन टायर, ब्रेक व रोड वियर से भी प्रदूषण फैलाते हैं, इसलिए क्षमता को ध्यान में रखते हुए वज़न व स्पीड की सीमाएं निर्धारित की जानी चाहिए।

नौशाबा परवीन
नौशाबा परवीन

कोयला सबसे गंदा उद्योग ईंधन है, उद्योगों को उसकी व तेल या गैस की जगह बिजली का प्रयोग करना चाहिए। लकड़ी, गोबर व पराली का जलाना भी समस्या है, जिसे नियंत्रित किया जाये, लेकिन पराली जलाना बंद तभी हो सकेगा जब सरकार किसानों को गेहूं व धान के चक्र से निकाले। तटीय क्षेत्रों में अन्य एमिशन को भी रोकना होगा और अंतरराष्ट्रीय समन्वय भी आवश्यक है, क्योंकि हवाएं किसी सीमा से बंधी नहीं होतीं, वह पाकिस्तान व अन्य पड़ोसी मुल्कों से भी आती हैं।

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