स्वरूप की भक्ति ही शाश्वत : सद्गुरु रमेशजी

हैदराबाद, जो ज्ञानी अपने स्वरूप का अनुसंधान कर भक्ति करता है, वही सबसे उत्तम भक्ति है। ज्ञानी रूप की नहीं, बल्कि स्वरूप की भक्ति करता है, जो शाश्वत और सदैव रहने वाली है। इसलिए व्यक्ति स्वयं यानी स्वरूप को जानें, तभी जीवन में सार्थक भक्ति प्राप्त होगी। उक्त उद्गार बंजारा हिल्स स्थित अवर पैलेस में हाउस ऑफ एंटरटेनमेंट द्वारा आयोजित सत्संग में सद्गुरु रमेशजी ने व्यक्त किये।

रमेशजी ने कहा कि कई बार व्यक्ति जो अपनी आँखों से नहीं देख सकता, वह दूसरों की आँखों से देख सकता है। हम हमारी आँखों से उस ब्रह्म को नहीं देख सकते, लेकिन वह हमें गुरु की आँखों से दिखता है। दूसरे की आँखों का सहारा लेना भी चाहिए। दिखे या न दिखे पर अनुभव कर सकते हैं। ज़िन्दगी में हर चीज हमारे हिसाब से हो, यह जरूरी नहीं, पर उसको अनुभव तो कर सकते हैं।

भक्त और ज्ञानी में अंतर: रमेशजी की शिक्षाएँ

नहीं देखने वाला इंसान आँखों वालों को जीवन जीना सिखाता है। इन्सान में सकारात्मकता हो तो सब कुछ संभव है। किसी में कमियाँ न निकालें। जब कोई हमारी सोच के विपरीत सोचता है, तो हम उसे गलत ठहराते हैं। दूसरों की सोच हमारे हिसाब से हो, यह जरूरी नहीं। रमेशजी ने कहा कि सारी सृष्टि में एक ज्ञानी ही है जो समदृष्टि रखता है। संसार जैसा भी हो, हमें अच्छा ही सोचना चाहिए। कितना भी बुरा हो, फिर भी अच्छी भावना हो, यह ज्ञानी की अवस्था है।

रमेशजी ने कहा कि भगवान के दो पुत्र हैं भक्त और ज्ञानी। जैसे माँ के दो बच्चे एक छोटा एक बड़ा है। माँ दोनों से प्रेम करती है, पर देखभाल छोटे बच्चे की ज्यादा होती है, क्योंकि उसे देखभाल चाहिए। बड़ा बेटा खुद देखभाल कर सकता है। उसी प्रकार भगवान भक्त की देखभाल ज्यादा करते हैं, क्योंकि वह छोटा बच्चा है और वह रूप से समर्पित है। वह ईश्वर पर निर्भर है। भक्त और ज्ञानी में थोड़ा अंतर है।

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भक्ति और ज्ञान का संगम: रूप से स्वरूप की ओर

भक्ति में भक्त भक्ति के द्वारा भगवान को पाना चाहता है। भक्त प्रभु को रूप मानता है और दोनो को जोड़ने की कड़ी है भक्ति। भक्ति के द्वारा भगवान से मिलने का प्रयास करता है, लेकिन ज्ञानी अपने स्वरूप को जानने का प्रयास करता है। भक्त अपने भगवान को जानता ह। वह ईष्ट देवता का पूरा शोध करता है, जबकि ज्ञानी आकार और रूप से परे निराकर सर्वव्यापक में अपने आपको देखता है। वह सारी सृष्टि से अपनी चेतना से जुड़ता है और उस ब्रह्म से एकाकार कर लेते हैं।

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भगवान कृष्ण ने गीता में कहा कि मुझे ज्ञानी भी पसंद है और भक्त भी, लेकिन दोनों में ज्ञानी ज्यादा पसंद है। क्योंकि भक्त शरीर से जुड़ा है और किसी शरीर आकार की भक्ति कर रहा है। भक्त कई बार भगवान को दोष देता है। जहाँ शरीर होगा, वहाँ मन, बुद्धि, इंद्रिया होंगी और वहाँ दोष दृष्टि भी होगी। भक्ति में शक्ति भी है और आशक्ति भी है। शक्ति आशक्ति दोनों साथ चलती हैं।

ज्ञानी के साथ कुछ हो, तो वह अपने आपको दोषी मनेगा। ज्ञानी अपने स्वरूप का अनुसंधान करता है, चिंतन, मनन करता है और निराकार से अपनी चेतना को जोड़ता है। ज्ञानी की स्थिति में अच्छा बुरा नहीं होता, इसलिए ज्ञानी हर पल आनंद में रहता है। भक्ति और ज्ञान का मिश्रण डायनेमिक होता है। ज्ञान और भक्ति का समावेश हो जाए, तो भीतर की अज्ञानता को ब्लास्ट कर सकता है। रूप नहीं, स्वरूप की भक्ति करो, जो शाश्वत है, क्योंकि रूप सदैव नहीं रहेगा।

गुरु माँ का भक्ति के नौ प्रकारों पर उपदेश

गुरु माँ ने अपने संबोधन में कहा कि भक्ति 9 प्रकार की होती है। इसमें पहली है श्रवण की भक्ति। इसमें उनके बारे में जानेंगे तभी दिलचस्पी हो। दूसरी भक्ति कीर्तन की, जिसे जानने लगे तो उनकी गाथाएँ, कहानी भजन करें, इससे भक्ति जागृत होती है। तीसरी स्मरण है, जिसकी भक्ति कर रहे हैं, उसे हमेशा याद करें। चौथी है सेवा, जिसकी भक्ति करें उसकी सेवा करें।

पाँचवीं हैं अर्चना व पूजा करना है। छठी है चरणों में साष्टांग होना। उनके अलावा और कोई नहीं, क्योंकि वही सब कुछ हैं। सातवीं भक्ति दास यानी दास भाव हो, क्योंकि जब तक अहं होगा, भक्ति नहीं होगी। आठवीं सखा भाव भक्ति और नौंवीं है आत्मा भक्ति।

यह सारीं भक्त प्रह्लाद में थीं। इसके बल पर उसके असुर पिता हिरण्यकश्यप का वध करने के लिए नरसिंह अवतार हुआ। गुरु माँ ने कहा कि इसी प्रकार की भक्ति शिष्य अपने गुरु के प्रति रखे, क्योंकि शिष्य की हर समस्या का समाधान केवल गुरु ही दे सकता है। गुरु ही गोविंद के दर्शन करवा सकता है।

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