क्या चीनी हथियारों पर अंधे भरोसे के कारण जंग में ईरान पस्त हुआ ?

मीडिया में ईरान के चीनी हथियारों की विफलता का शोर है, विशेषज्ञ इसे ऑपरेशन सिंदूर के समय पाकिस्तान और वेनेजुएला में मिली असफलता से जोड़ रहे हैं, क्या वाकई तकनीकी का ताऊ कहलाने की मंशा रखने वाला चीन अपने हथियार निर्माण और उसके बाजार में बुरी तरह पिछड़ रहा है या यह प्रचार किसी चीन विरोधी अमेरिकी लॉबी की चाल है? हमारी रणनीति क्या होनी चाहिये।

चीनी हथियार चौपट हैं यह चर्चा चहुंओर है। ये वाकई अनस्तरीय हैं या आकलन ही पूर्वाग्रहपूर्ण है? यदि कुछ एक मौकों पर एक दो हथियारों या हथियार प्रणालियों की बात होती तो इसे अतिरेकी विवेचना या चीनी विरोधी लॉबी, प्रतिद्वंद्वी हथियार निर्माताओं अथवा अमेरिकी दुष्प्रचार कहकर इसकी उपेक्षा की जा सकती थी। क्योंकि अमेरिकी और यूरोपीय रक्षा कंपनियों का लॉबिंग नेटवर्क प्रभावशाली है, वह चीनी हथियारों की कमियों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर सकता है। लेकिन चीनी हथियारों की विफलता के कई प्रत्यक्ष प्रमाण का वाकई बहस तलब है कि चीन जो दुनियाभर में अमेरिका, रूस और फ्रांस के बाद चौथा सबसे बड़ा हथियार निर्यातक है, जिसके कुछ हथियार अमेरिका तक के लिये भी दहशत के बायस हैं।

चीन के अत्याधुनिक हथियार भी कई जगह फिसड्डी साबित

रक्षा और अंतरिक्ष क्षेत्रों में जिसकी तकनीक की तूती बोलती है, जो मिलेट्री एआई और रॉकेट-मिसाइल इंट्रीग्रेशन के मामले में अमेरिका से भी आगे निकलने की स्थिति में हैं, विनिर्माण के क्षेत्र के महारथी के बनाए हथियार इतने भोथरे और फिसड्डी साबित हो रहे हैं। बेशक उन देशों के लिये जो चीन के हथियारों का जखीरा जमा कर चुके हैं अथवा जिनकी चीनी हथियारों पर निर्भरता जरूरत से ज्यादा है या फिर जिनके अस्त्रागार में महत्वपूर्ण मोर्चे के लिये चीनी हथियार प्रणाली मौजूद है, जो चीनी हथियारों के दम पर सीना फुलाए बैठे हैं, यह उनके लिये छाती पीटने का समय है। इन हथियारों के दम पर भारत के खिलाफ मंसूबाबंदी करने वालों के लिये चिंतित और पुनर्विचार की आवश्यकता है कि आखिर निर्यातित चीनी हथियारों के बारे में ऐसा क्यों है ?

हाल ही में अमेरिका इजराइल संग ईरान के संघर्ष में चीनी हथियारों की विफलता का चलन तब दिखा जब पिछले दो महीने पहले ही डिलिवर हुआ नया नकोर चीनी एयर डिफेंस सिस्टम एचक्यू-9 अमेरिकी मिसाइलों को रोक नहीं पाया। ऐसे में मीडिया में आते चीनी हथियारों के फेल रहने की खबरों को अतिरंजित अथवा किसी दुर्भावनाग्रस्त नहीं कह सकते; क्योंकि स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट यानी सीपरी की रिपोर्ट हो या रैंड कॉरपोरेशन, अमेरिकी, फ्रेंच संस्थाओं का आकलन अथवा तमाम ख्यातिनाम रक्षा विशेषज्ञों का विश्लेषण, सभी ने पाया कि वाकई चीन निर्मित और खास तौरपर निर्यातित हथियार खामी भरे हैं और ऐन उसी वक्त पर जब उनको काम आना था नाकाम साबित हुए, चीनी एयर डिफेंस सिस्टम उम्मीदों पर कतई खरे नहीं उतरे।

बांग्लादेश, पाकिस्तान और म्यांमार में चीनी युद्धक उपकरण फेल

कंबोडिया में चाइनीज लाइट मशीन गन 80/95 का बार-बार जाम होना। बांग्लादेश के एफ-7 जेट्स, मुख्य युद्धक टैंक-2000 और फ्रिगेट्स में रडार तथा इंजिन में खराबी पाया जाना। पिछली साल पाकिस्तान के एचक्यू9 पी, एचक्यू-16 सैम सिस्टम और वाईएलसी 8ई रडार ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय हमलों के आगे नाकाम रहना। उसके एफ-22पी फ्रिगेट में बार-बार सेंसर, इंजन और रडार की खराबी, म्यांमार के चीनी जेएफ-17 जेट्स ढांचे में दरारें पाये जाने से ग्राउंड करने पड़े तो नाइजीरिया के एफ-7 बार बार क्रश हुए तो उसने बचे विमानों को उन्हें चीन को लौटा दिया।

लैंडिंग, मिशन-कंप्यूटर की खराबी और एयरफ्रेम संबंधी समस्याओं के चलते कई देशों ने चीनी उपकरणों को संचालन के लिए अनुपयुक्त घोषित करके अपने बेड़े को ही खत्म दिया। यही नहीं चीनी मिसाइलें बहुधा अपने लक्ष्य से भटकती दिखीं, तो ड्रोन बिना अपने लक्ष्य पर पहुंचे टपकते रहे। चीनी हथियारों के अनस्तरीय होने के जो प्रमुख कारण समझ में आते हैं- उनका रिवर्स- इंजीनियर्ड होना, खराब विनिर्माण मानक, गुणवत्ता नियंत्रण का कमजोर होना, अपर्याप्त परीक्षण और ग्राहक देश हेतु हथियार को सस्ता करने के चक्कर में उसकी सक्षमता से समझौता एवं इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर के प्रति संवेदनशीलता। चीन विफलताओं से सीखता तो है, लेकिन निर्यात मॉडल्स में सुधार में सुस्त है।

एक बात और चीन जिन देशों को हथियार बेचता है वे पाकिस्तान, अल्जीरिया, मिस्र, इथियोपिया, इंडोनेशिया, इराक, सऊदी अरब, मिस्र और उज्बेकिस्तान, सेनेगल, वेनेजुएला और बोलीविया मोरक्को, म्यांमार, सर्बिया और यूएई वगैरह युद्ध जैसी परिस्थितियों में उसकी वास्तविक क्षमता कम ही परख पाते हैं। चीन ने खुद 1979 के बाद से कोई बड़ा युद्ध नहीं लड़ा। उसकी आधुनिक प्रणालियां वास्तविक युद्ध में परखी नहीं गईं जबकि अमेरिकी और यूरोपीय हथियार लगातार परखे जाते रहे हैं, जिससे उनके प्रदर्शन का लंबा रिकॉर्ड उपलब्ध है।

चीन के हथियार सस्ते और विकासशील देशों के बजट में फिट

अब सवाल यह भी कि चीन के हथियार अगर इतने बेकार हैं तो बिकते क्यों हैं अगर वे नहीं बिकते तो फिर चीन दुनिया का चौथा सबसे बड़ा हथियार निर्यातक कैसे बना हुआ है। यह सही है कि विगत वर्षों में चीन से हथियार खरीदने वालों और उसके कुल रक्षा निर्यात में पांच फीसद से ज्यादा की कमी आयी है फिर भी वह चौथे नंबर पर काबिज है, कैसे और क्यों? असल में चीनी हथियारों को कई विकासशील देश इसलिये खरीदते हैं क्योंकि ये उनके बजट के अनुकूल या सस्ते होते है, कई बार तो पश्चिमी या यूरोपीय हथियारों से आधे दाम में।

पाकिस्तान अगर चीनी पीएल 15 मिसाइलें और एचक्यू-9 एयर डिफेंस की जगह अमेरिकी पैट्रियट या यूरोपीय मेटियोर खरीदता तो उसे दुगने दाम देने पड़ते। बांग्लादेश जैसे देशों को वह सॉफ्ट लोन, कम ब्याज और लंबी अवधि वाली किश्तों पर हथियार बेच देता है तो ईरान को तेल के बदले।

नाइजीरिया जैसे कुछ ऐसे देश जिन पर अमेरिकी या कोई प्रतिबंध लगा होता है उसे भी वह बिना राजनीतिक शर्तों के हथियार बेच देता है, किसी को सैन्य अड्डे की सुविधा लेकर तो किसी तकनीकी हस्तांतरण और बुनियादी ढांचा विकसित करने के नाम पर तत्काल आधुनिकीकरण अथवा सैन्य आवश्यकता को देखकर विकासशील छोटे देशों की सरकारें सैन्य सौदे में कमीशन खाने के चक्कर में अपने देश की रक्षा, सुरक्षा, संप्रभुता तथा हथियारों की गुणवत्ता की अनदेखी करती हैं और चीन अपनी आर्म डिप्लोमेसी में सफल रहता है, भ्रष्ट और किंचित कारणों से मजबूर सरकारें विश्वसनीयता की चुनौतियों के बावजूद चीनी हथियार खरीद लेती हैं, तो यह सब बिकने की सूची में दर्ज होता है और चीन अपने खराब गुणवत्ता वाले हथियारों के बावजूद इस सूची में ऊपर बना रहता है।

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पाकिस्तान, बांग्लादेश और म्यांमार में चीनी हथियार तैनात

चीनी हथियारों से हमारा साबका पड़ सकता है। हमारे आसपास चीनी हथियारों की भरमार है। पाकिस्तान के पास जीएफ-17, एचक्यू-9 वायु रक्षा प्रणाली और चीनी ड्रोन हैं तो बांग्लादेश, म्यांमार और श्रीलंका में भी चीनी नौसैनिक प्लेटफॉर्म मौजूद हैं। हिंद महासागर में चीनी मूल के पोत और पनडुब्बियां दीर्घकालिक चुनौती बनी हुई हैं इसके अलावा म्यांमार भी चीनी हथियार रखता है। हमारी चिंता का विषय तकनीकी गुणवत्ता नहीं, बल्कि सामरिक तैनाती है।

तकनीक की बात करें तो चीनी हथियारों की विफलता के साथ यह भी सत्य है कि चीन ने हाइपरसोनिक मिसाइलों, एंटी-शिप बैलिस्टिक मिसाइलों और लंबी दूरी की वायु-रक्षा प्रणालियों में उल्लेखनीय प्रगति की है। भारत के पास चीनी कैरियर किलर और डीएफ26, वाईजे-21 हाइपरसोनिक, पीएल-17 बीवीआर मिसाइलों और बड़े पैमाने की ड्रोन-उत्पादन क्षमता का फिलहाल कोई काट नहीं।

संजय श्रीवास्तव
संजय श्रीवास्तव

उसके जे-20 स्टील्थ फाइटर और डीएफ-ज़ेड एफ ग्लाइडर भी हमारे लिए बड़ी चुनौती हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित सैन्य अनुप्रयोगों में भी वह आगे है। ध्यान रखना चाहिए कि हथियारों की विफलता हमेशा निर्माता की तकनीकी अक्षमता का प्रमाण नहीं होती; प्रशिक्षण, रख-रखाव और सामरिक उपयोग भी उतने ही महत्वपूर्ण कारक हैं। चीन के कई ग्राहक विकासशील देश हैं, जहां प्रशिक्षण और रख-रखाव ढांचा सीमित है- फलस्वरूप प्रदर्शन अपेक्षा से कमतर दिख सकता है। ऐसे में चीन द्वारा बेचे गये हथियारों को कमतर आंकने की बजाय रणनीतिक परिपक्वता यही होगी कि प्रतिद्वंद्वी की वास्तविक ताकत को समझकर उसके अनुरूप राष्ट्रीय सुरक्षा ढांचा सुदृढ़ की जाए।

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