रोज करें प्रणाम, प्रार्थना और परोपकार : चन्द्रप्रभजी

हैदराबाद, जो व्यक्ति रोज सुबह उठकर माता-पिता, सास-ससुर, भाई-भाभी व अन्य बड़ों को प्रणाम कर दुआएँ लेता है, 24 घंटे में 24 मिनट प्रभु की प्रार्थना करता है, गरीब व जरूरतमंद लोगों का सहयोग करता है, पशु-पक्षियों का पेट भरता है, वह सदा खुश और प्रसन्न रहता है। उसके जीवन का बेड़ा पार हो जाता है। उक्त उद्गार नामपल्ली स्थित प्रदर्शनी मैदान में आयोजित 53 दिवसीय प्रवचनमाला में कैसे कमाएँ दुआओं की दौलत विषय पर प्रवचन देते हुए राष्ट्र संत चन्द्रप्रभजी म.सा. ने व्यक्त किये।

चन्द्रप्रभजी म.सा. ने कहा कि बारहखड़ी में सबसे महत्वपूर्ण अक्षर प है, क्योकि परिवार, पढ़ाई, पैसा, पति, पत्नी, पैरेंट्स, पुण्य, पाप, परलोक, प्रभु जैसे अक्षर प से प्रारंभ होते हैं। प से हम बेहतरीन जीवन जीने की कला सीख सकते हैं। प से हमें तीन प्रेरणाएँ मिलती हैं- प्रणाम, प्रार्थना और परोपकार। म.सा. ने कहा कि संत के दो धर्म हैं ज्ञान और ध्यान। इसी तरह गृहस्थ के भी दो धर्म हैं दान और पूजा। पुण्याई दान देने से बढ़ती है।

दान, प्रणाम और पारिवारिक सौहार्द का संदेश

प्रकृति में हर चीज लौटकर आती है। जो मानवता के काम में दस रुपये लगाता है, भगवान उसे हजार गुना करके लौटाते हैं। म.सा. ने कहा कि हर व्यक्ति जीवन में दान देने की आदत डाले। लक्ष्मी और सरस्वती की कृपा सदा वहाँ बरसती है, जहाँ इनका सद उपयोग होता है। इस दुनिया में दो तरह के लोग होते हैं, कुछ खाकर खुश होते हैं, तो कुछ खिलाकर। जो खाकर खुश होते हैं, वह सदा औरों पर आश्रित रहते हैं, पर जो खिलाकर खुश होते हैं, उनके भंडार प्रभु-कृपा से सदा भरे हुए रहते हैं।

संतश्री ने प्रणाम करने की प्रेरणा देते हुए कहा कि एक-दूसरे को प्रणाम करने से परिवार का वातावरण आनंदमय हो जाता है। पहले के जमाने में बेटा पचास साल तक भी बाप से अलग नहीं होता था, क्योंकि घरों में प्रणाम करने की आदत थी, लेकिन आज प्रणाम न करने की आदत होने से बेटा शादी करते ही अलग हो जाता है। जबसे प्रणाम करने की आदत कम हुई है, तब से परिवारों के टूटने और तलाक बढ़ने की बाढ़-सी आ गई है।

प्रार्थना, दुआ और समर्पण से बदलता है जीवन

जिस घर में सुबह की शुरुआत प्रणाम से होती है, वहाँ कभी कलह का वातावरण निर्मित नहीं हो सकता। प्रतिदिन प्रार्थना करने की सीख देते हुए संतप्रवर ने कहा कि अगर घर के सभी लोग सुबह उठकर प्रार्थना करेंगे, तो पूरे घर का आभामण्डल ठीक रहेगा। अगर हमारे जीवन या घर पर ग्रह-गोचरों का नकारात्मक प्रभाव है, तो वह भी प्रार्थना करने से दूर हो जाएगा। संतप्रवर ने उद्योगपतियों से कहा कि वह फैक्ट्री में भी सुबह-सुबह प्रार्थना करवाएँ।

एक माह बाद चमत्कार होगा, उत्पादन दुगुना हो जाएगा और वातावरण मधुर बन जाएगा। संतप्रवर ने कहा कि भगवान को चंदन, नारियल, सोना, सिक्के, मिठाइयाँ और फूल नहीं, हमारे समर्पण भरे भाव चाहिए। प्रार्थना को संकट की वेला का शस्त्र बताते हुए संतप्रवर ने कहा कि अगर हमारा कोई परिजन संकटग्रस्त हो जाए, तो दुःखी या बेचैन होने की बजाय उसके लिए प्रभु से दुआ माँगे।

सारी दवाएँ भले ही निष्फल हो जाएँ, पर परमार्थ भाव से की गई दुआ अवश्य सफल होती है। जिस ईश्वर ने हमें चौबीस घंटे दिए हैं, उन्हें हम चौबीस मिनट अवश्य समर्पित करें। याद रखें, पति को पत्नी का आसरा है और पत्नी को पति का, पर अंत में दोनों को अगर किसी का आसरा है, तो प्रभु का है। वह सुख में हमारे साथ रहता है, पर दुःख में हमें अपनी गोदी में उठा लेता है। संतश्री ने कहा कि जो औरों को देता है, वही देवता कहलाता है।

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सेवा, दान और इंसानियत की जीवन में महत्ता

जो गरीब और जरूरतमंद लोगों के काम आता है, उनकी सेवा करता है, भगवान उसकी झोली सदा भरते हैं। जिसके भीतर औरों का भला करने की भावना है, उससे अगर सौ गलतियाँ भी हो जाएँ, तो भगवान उसे माफ कर देते हैं। अन्नदान करने की प्रेरणा देते हुए म.सा. ने कहा कि जो अन्नदान करता है उसका अन्न भंडार सदा भरा रहता है। व्यक्ति आतिथ्य सत्कार के लिए सदा तैयार रहे। महिलाएँ चार मुठ्ठी आटा ज्यादा भिगोएँ।

चार रोटियों से आपको तो कोई फर्क नहीं पड़ेगा, पर जिसके पेट में अन्न जाएगा, उसका बहुत भला होगा। घर में अनुपयोगी अथवा पुराने कपड़ों को देने में संकोच न करें। कोई गरीब बीमार हो जाए तो उसे औषधि दिलाने का पुण्य कमाएँ। घर के बाहर मटकी भर के रख दें, छत पर कुंडी भर के रख दें, ताकि औरों की प्यास बुझाने का सौभाग्य मिल सके। श्रमदान करने की प्रेरणा देते हुए संतप्रवर ने कहा कि आप जिस क्षेत्र में हैं, उसमें श्रमदान करें।

व्यापारी महीने में एक दिन न फायदा न घाटे में सामान बेचे, डॉक्टर एक दिन फ्री में देखें, गरीबों के ऑपरेशन निशुल्क करें, रक्तदान और नेत्रदान का सौभाग्य लें। संतप्रवर ने कहा कि धर्मस्थान में हम एक घंटा रहते हैं, लेकिन और घर में 23 घंटे। इसलिए धर्म की शुरुआत मंदिर-मस्जिद-चर्च-गुरुद्वारे से नहीं, घर से की जानी चाहिए। जो माता-पिता का न हो पाया, वह भला परमात्मा का क्या हो पाएगा।

चातुर्मास स्थापना एवं संतों के प्रेरणादायी प्रवचन

संतप्रवर ने कहा कि जिस मंदिर को हमने बनाया हम उसकी तो पूजा करते हैं, पर जो माँ-बाप हमें बनाते हैं, उनकी पूजा क्यों नहीं करते। अगर व्यक्ति केवल घर के सात-आठ लोगों के बीच रहने और जीने की कला सीख जाए, तो उसका जीवन स्वर्ग बन जाएगा। डॉ. मुनि शांतिप्रियजी ने नवकार महामंत्र की सामूहिक प्रार्थना करवाई। समारोह का शुभारंभ महावीर कुंभट (चेन्नई), सुभाष रांका, संबोधि धाम, जोधपुर के महामंत्री प्रवीण मेहता द्वारा भगवान महावीर की मूर्ति के समक्ष दीप प्रज्ज्वलित कर की गयी।

अवसर पर संघ के संरक्षक विमल नाहर, अध्यक्ष मोतीलाल भलगट, वाइस चेयरमैन उमेश बागरेचा, अध्यक्ष प्रदीप सुराणा, कार्य अध्यक्ष अमित मुणोत, स्वागत अध्यक्ष प्रवीण पांड्या, प्रधान संयोजक नवरतनमल गुंदेचा, महामंत्री अशोक नाहर, कोषाध्यक्ष मानकचंद्र पोकरणा, वरिष्ठ उपाध्यक्ष विमलचंद मुथा, उपाध्यक्ष कुशल कांकरिया, योगेश गांधी, महावीर चोपड़ा, निर्मल कोठारी, मंत्री प्रवीण सुराणा, चंद्रप्रकाश लोढ़ा, सह मंत्री रोमिल गोलेच्छा, महावीर भलगट व अन्य उपस्थित थे।

मंच संचालन नवरतनमल गुंदेचा ने किया। आभार अशोक नाहर ने व्यक्त किया। चातुर्मास समिति के प्रशांत श्रीश्रीमाल ने बताया कि बुधवार, 9 जुलाई को चातुर्मास की स्थापना होगी। राष्ट्र संत ललितप्रभजी सुबह 9 से 10.30 बजे तक चातुर्मास में क्या करें कि जीवन हो जाए धन्य विषय पर प्रवचन देंगे। अधिक जानकारी के लिए समिति के अध्यक्ष प्रदीप सुराणा से संपर्क किया जा सकता है।

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