फैशन का फटका, दिल ही नहीं दिमाग़ भी अटका

आजकल फैशन का जमाना है। अजी! जित देखो तित फैशन का बवाल है और फैशन का ही सवाल है। अजी ! आज के जमाने में आदमी कपड़े पहनकर नहीं, बल्कि कपड़े दिखाकर जीता है। रामलुभाया जी का बेटा इस कला में मास्टर है। पिछले हफ़्ते जब वह नई जींस लेकर आया, तो रामलुभाया जी दंग रह गए। कहने लगे-बेटा, इसमें तो चार-चार जगह छेद हैं! बेटा हँसते हुए बोला, यही तो लेटेस्ट फैशन है। इसको कहते हैं रिप्ड जींस।

रामलुभाया जी माथा पकड़कर पकडकर कहने लगे मूर्ख, हम तो गांव में ऐसी फटी पैंट में गोबर डालकर खेतों में बिजूका(स्केयरो) बनाते थे, और तू इसे पहनकर कॉलेज जाएगा, बाजार में दोस्तों संग घूमेगा। इस पर बेटा मुस्कुरा दिया और कुछ नहीं कहा। वैसे रामलुभाया जी के सुपुत्र के पास ग़ज़ब का कलेक्शन है धूप हो या अंधेरा, गोगल्स हमेशा आँखों पर रहते हैं। वह पार्टी में कैज़ुअल और मंदिर में पार्टी वियर पहनना पसंद करता है। बालों में तेल नहीं, जेल लगाना उसका शौक है।

फैशन की अजीबोगरीब दुनिया और उलझनें

बेटे की आदतों को देख उस दिन रामलुभाया जी फिर कहने लगे हमारे ज़माने में तो एक ही ड्रेस होती थी – वही स्कूल, वही खेल, वही शादी-ब्याह। यहाँ तो कैज़ुअल, फॉर्मल, स्पोर्ट्स वियर, एथनिक… लगता है आज कपड़े पहनने का नहीं, बल्कि पाठ्यक्रम का सिलेबस बन गया है! खैर, वो एक दिन क्या हुआ कि मोहल्ले का एक कुत्ता रामलुभाया जी के सुपुत्र के पीछे पड़ गया। कारण था- उसकी फर जैसी जैकेट।

दरअसल उसकी फर जैसी जैकेट देखकर कुत्ते ने सोचा -अपना खोया हुआ रिश्तेदार आ गया है! इधर कुत्ता भौंका, उधर मोहल्ला हँसा और सुपुत्र ने कहा डैड! देखो, एनिमल्स तक मेरी स्टाइलिश ड्रेस को खूब पहचान रहे हैं। तब रामलुभाया जी ने आह भरते हुए कहा, फैशन का यही नियम है – जितना अजीब दिखो, उतना ही स्टाइलिश कहलाओ। हम तो खादी पहनकर नेता बन जाते थे, तू फटी जींस पहनकर महान बन रहा है।

वैसे, सच तो यह है कि आज का फैशन पुराना नया और नया पुराना की उलझन है। कल तक जिसे गरीबी कहते थे, आज उसे फैशन कहते हैं। कल तक जो शर्मिंदगी थी, आज वही ट्रेंडिंग है। रामलुभाया जी का बेटा तो बेटा, अजी ! रामलुभाया जी की पुत्रवधू तो फैशन की दुनिया में और भी आगे है। हाई हील्स इतनी ऊँची पहनती हैं कि चलते-चलते अगर बिजली के खंभे के पास खड़ी हो जाएं, तो बल्ब बदलने वाले मिस्त्री की नौकरी ही खतरे में पड़ जाए।

नई पीढ़ी का फैशन और पुरानी सोच का टकराव

पुत्रवधू के पास हैंडबैग इतना बड़ा कि उसमें मोबाइल, लिपस्टिक, पाउडर ही नहीं, अजी! पूरा का पूरा मोहल्ला तक शिफ्ट हो सकता है। मेकअप ऐसा कि खुद आईना भी देखकर सोचता होगा, ये वही औरत है या फेसबुक फिल्टर उतर आया धरती पर ? रामलुभाया जी सोचते हैं कि हमारे जमाने में तो औरतें एक ही तेल की शीशी से बाल भी चमका लेती थीं और चमड़ी भी। ये नई पीढ़ी बालों में अलग शैम्पू, जैल, चेहरे पर अलग क्रीम और फोटो खिंचवाने से पहले फिल्टर क्रीम तक मांगती है!

सुनील कुमार महला
सुनील कुमार महला

उस दिन पड़ोस की अम्मा ने कहा-बेटा, हमारी तो साड़ी भी दस-दस सालों तक चल जाती थी। यह बहू तो एक बार शादी-ब्याह या पार्टी में पहनकर अगले दिन कह देती है नो! ये तो आउटडेटेड हो गई! रामलुभाया जी फिर ताना मारते हुए कहा फैशन का यही खेल है, बहनजी ! चोंचलेबाजी है। जहाँ कभी औरतें पल्लू से सब्ज़ी की टोकरी उठाती थीं, आज उसी पल्लू से सेल्फी फिल्टर ठीक करती हैं! अजी कुल मिलाकर सिट्टा यही निकलता है कि आजकल फैशन शरीर से ज़्यादा दिमाग और जेब को निचोड़ता है। मगर करें तो करें क्या? जिसे समझो मूर्खता, वही कहलाता है आज स्टाइल। अजी! यही तो फैशन का है फटका, जिस पर युवा पीढ़ी का दिल है अटका।

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