कथा सुनने से हृदय में प्रवेश करते हैं भगवान : प्रपन्नाचार्यजी महाराज
हैदराबाद, श्रीमद् भागवत कथा श्री कृष्ण का वांग्मय स्वरूप है। जीव को यदि भागवत के दर्शन करना है, तो श्रीमद् भागवत शब्द रूप में कर सकते हैं। कथा के श्रवण से ही भगवान हृदय में आते हैं। जब सुनोगे तब भगवान आयेंगे। बिना सुने नहीं आयेंगे। श्रवण की महिमा महत्वपूर्ण है।
उक्त उद्गार काचीगुड़ा स्थित श्री श्याम मंदिर के शिवदत्तराय प्रह्लादराय सत्संग हॉल में कमला देवी बाहेती, राजगोपाल बाहेती, नारायणदास बाहेती, नवलकिशोर बाहेती विष्णुदास राजगोपाल बाहेती परिवार द्वारा आयोजित श्रीमद् भागवत कथा ज्ञान यज्ञ के प्रथम दिवस कथा व्यास श्रीश्री 1008 राजगुरु स्वामी बद्री प्रपन्नाचार्यजी महाराज ने श्रीमद् भागवत कथा का महात्म्य बताते हुए व्यक्त किए। महाराज ने कहा कि कथा के माध्यम में क्या सत्य, क्या असत्य यह सीख सकते हैं।

जीव को जीवन में क्या ग्रहण करना है और किसका परित्याग करना है, यह कथा ही सिखाती है। जीवन में किस मार्ग पर चलना और किसका परित्याग करना है, यह हमें कथा सिखाती है। कथा पूर्णत जीवन में विवेकमय बुद्धि की संरचना करती है, जिस बुद्धि को प्राप्त कर परमात्मा के पावन स्वरूप को जान सकते हैं। महाराज ने कहा कि कथा के माध्यम से जीवन को प्राप्त करते हैं। कथा ही तो भगवान प्राप्ति का रूप है। कथा को सुनकर ही भागवत की प्राप्ति होगी।
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श्रीमद् भागवत में भगवान के 12 अंगों का शब्द रूप दर्शन
कथा के प्रसंग से ज्ञान का विवेक कर्ण छिद्रों से हृदय तक पहुँचता है। जीवन में इसके अलावा दूसरा कोई साधन नहीं है। कथा को श्रवण कर विवेकमय बुद्धि को हम जीवन में प्राप्त करें, ऐसा ही उद्देश्य रखें। कथा स्वयं ही साक्षात भगवान का रूप है। महाराज ने कहा कि भागवत ही भगवान है। भगवान ने जीवों पर कृपा करने के लिए भागवत स्वरूप में अवतार लिया। द्वापर युग के समाप्त होने और कलयुग के आरंभ पर उद्धवजी महाराज ने भगवान श्रीकृष्ण से प्रार्थना की कि प्रभु आप भक्तों के जीवन के ताप को दूर कर अपने धाम जा रहे हैं, तो आगे भक्तों का क्या होगा।

क्योंकि आगे कलयुग में दुष्टता बढ़ेगी, विचारों के भेद बढेंगे, तो ऐसे समय में जीवों के कल्याण का उपाय क्या होगा। भगवान श्रीकृष्ण ने कहा कि कल्याण का उपाय तो हर युग में भगवान ही हैं। कलयुग में भी भगवान आयेंगे। उद्धवजी ने पूछा तो फिर कलयुग में भगवान कहाँ मिलेंगे। तब भगवान ने कहा कि इसी भागवत के रूप में। महाराज ने कहा कि बाजार में हर प्रकार की मूर्तियाँ हैं, पर वह प्रदर्शन की होती हैं, उनकी पूजा नहीं होती, मूर्ति की मंदिर में किसी ब्राह्मण के द्वारा वेद मंत्रों के अनुसार प्राण-प्रतिष्ठा की जाती है, तब वह पूजनीय बनती है।
श्रीमद् भागवत भी मूर्ति है। यही कलयुग में अवतार है, जो शब्द रूप में है। महाराज ने कहा कि श्रीमद् भागवत में भगवान का एक एक अंग शब्द रूप में है। मंदिर में जाएँ तो भगवान के नख से लेकर शिख तक 12 अंगों के दर्शन करने चाहिए, केवल चेहरा न देखें। भगवतजी की कथा में 12 स्कंध हैं। उनमे एक-एक शब्द में, एक-एक अंग की कल्पना की है। श्रीमद् भागवत प्रभु के वांग्मय स्वरूप का दर्शन करवाती है।
श्रवण रूपी साधन से हृदय में भगवान के प्राण प्रतिष्ठा
रामायण में जितने भी कांड हैं, उनमें भगवान के एक-एक रूप का दर्शन है। महाराज ने कहा कि रामायण इस भाव से न पढ़ें की कोई किताब या पुस्तक पढ़ रहे हैं, बल्कि इस भाव से पढ़ें की भगवान श्रीराम के एक-एक अंग का दर्शन कर रहे हैं। ऐसे ही श्रीमद् भागवत की कथा पढ़ें या सुनें, तो एक-एक स्कंध में भगवान के एक-एक स्वरूप का दर्शन करें। यहाँ तक एक-एक शब्द में भगवान श्रीकृष्ण के दर्शन की अनुभूति करनी चाहिए, क्योंकि यह भगवान का वांग्मय स्वरूप है।

भगवत स्वरूप की परिकल्पना करके चलेंगे, तब हमें भगवान के उस पावन स्वरूप के दर्शन प्राप्त होंगे। इस मूर्ति की रचना महर्षि वेदव्यासजी ने की। संसार के जितने भी शास्त्र है, वह व्यासजी ने ही रचे हैं। श्रीमद् भागवत कथा मूर्ति में प्राण प्रतिष्ठा स्वयं श्रीकृष्ण ने की। उस भगवत स्वरूप के दर्शन करने के लिए हमें इस श्रवण रूपी साधन को जीवन में स्वीकार करना है। भगवान सूक्ष्म रूप से 14 स्थानों पर रहते हैं। उन स्थानों में एक है सुनने वालों के हृदय में। जो कथा सुने उनके हृदय में भगवान आते हैं। जिनके हृदय समुद्र के समान होता है, वहाँ भगवान रहते हैं।
इससे पूर्व श्रीमद् भागवत कथा हेतु भव्य कलश शोभा यात्रा ईसामियाँ बाजार स्थित श्री संतोषी माता मंदिर से निकाली गई, जो विभिन्न मार्गों से होते हुए कथा स्थल श्री श्याम मंदिर काचीगुड़ा पर आकर संपन्न हुई। अवसर पर कमला देवी बाहेती, राजगोपाल बाहेती, नारायणदास बाहेती, नवलकिशोर बाहेती, विष्णुदास राजगोपाल बाहेती परिवार सहित बड़ी संख्या में भक्त उपस्थित थे।
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