हरित आवरण: वनों की गुणवत्ता सुधारने पर होना चाहिए ध्यान

धरती पर रहने वालों के लिए रोटी, कपड़ा और मकान के बाद सबसे महत्वपूर्ण है पर्यावरण। पर्यावरण रहने अनुकूल होना चाहिए और पर्यावरण में सबसे महत्वपूर्ण है, हरित आवरण। यदि हम अपने देश की बात करें तो भारत वन रिपोर्ट यह बताती है कि देश में किस तरह का माहौल है। यह रिपोर्ट वन सर्वेक्षण विभाग द्वारा हर 2 साल में प्रकाशित की जाती है। पिछली रिपोर्ट में 2021 से भारत के वन क्षेत्र में 1,540 वर्ग किलोमीटर की वृद्धि का उल्लेख किया गया है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि ये आँकड़े पर्यावरणीय और विधिगत मुद्दों को छिपाते हैं। बेसिक सवाल यह भी उठ रहा है कि आखिर वन की परिभाषा क्या है!
रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत का वन और वृक्ष आवरण (हरित आवरण) अब उसके भौगोलिक क्षेत्र का 24.62 प्रतिशत है, जो 1988 की राष्ट्रीय वन नीति के तहत निर्धारित 33 प्रतिशत लक्ष्य की ओर अग्रसर है। पूर्वोत्तर राज्य अभी भी सबसे अधिक वन आवरण वाले क्षेत्र हैं, जबकि आंध्रप्रदेश, ओडिशा और तेलंगाना वृक्षारोपण प्रयासों में अग्रणी हैं।
बेशक, कुल मिलाकर आँकड़े आशाजनक दिखते हैं। लेकिन सयाने कह रहे हैं कि ये गंभीर पारिस्थितिक नुकसान को छिपाते हैं। याद रहे कि जैव विविधता और जलवायु नियंत्रण के लिए घने वनों का कोई विकल्प नहीं है। लेकिन हो यह रहा है कि घने वनों को वृक्षारोपण और क्षीण वनों से बदल दिया गया है। उदाहरण के लिए, पूर्वोत्तर राज्यों ने, उच्च वन आवरण होने के बावजूद, वनों की कटाई और बुनियादी ढाँचे के विकास जैसे मानवजनित दबावों के कारण शुद्ध कमी दर्ज की है।
रिपोर्ट के सबसे विवादास्पद पहलुओं में से एक इसकी वन की परिभाषा है। किसी भी भूमि को, जिसमें 10 प्रतिशत से अधिक पेड़ों का घनत्व है, वन के रूप में वर्गीकृत किया गया है – चाहे वह वाणिज्यिक वृक्षारोपण हो, बाग हो, या शहरी हरित क्षेत्र। यह नज़रिया प्राकृतिक वनों और एकल प्रजाति वाले वृक्षारोपण को समान मानता है, जिनमें जैव विविधता और लचीलेपन का अभाव होता है। यह विधिगत अस्पष्टता हरित आवरण की स्थिरता के दावों पर सवाल उठाती है। इस तरह गुणवत्ता के बजाय मात्रा पर जोर देने से तो पर्यावरण की अखंडता ही खतरे में पड़ जाएगी न! वन क्या केवल हरियाली का समूह भर होता है?
वन सर्वेक्षण विभाग की यह रिपोर्ट ऐसे समय में आई है, जब विकास और संरक्षण को संतुलित करने पर तेज बहस चल रही है। बड़े पैमाने पर बुनियादी ढाँचा परियोजनाएँ, खनन और शहरीकरण अभी भी प्राकृतिक वनों को समाप्त कर रहे हैं। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि प्रतिपूरक वनीकरण-वन हानि की भरपाई का एक तंत्र-अ़कसर खराब तरीके से लागू किया जाता है। इस विडंबना से कौन परिचित नहीं कि कटाई की भरपाई के लिए वृक्षारोपण अक्सर पारिस्थितिक रूप से अनुपयुक्त क्षेत्रों में किए जाते हैं और प्राकृतिक वनों की जैव विविधता को पुन: स्थापित नहीं कर पाते।
भारत ने पेरिस समझौते के तहत 2030 तक 2.5 – 3 अरब टन कार्बन डाई ऑक्साइड को अवशोषित करने का वादा किया है। इस लक्ष्य को पूरा करने में वनों की भूमिका अहम है। ऐसे में, रिपोर्ट में पेश की गई कार्बन स्टॉक वृद्धि की आशावादी तस्वीर वनों की कटाई और क्षरण की जमीनी सच्चाई पर हरा पर्दा डालती प्रतीत होती है!
इस रिपोर्ट में जलवायु परिवर्तन से होने वाले खतरों पर भी पर्याप्त ध्यान देने में विफलता की बात कही गयी है। किसी से छिपा नहीं है कि बढ़ते तापमान, अनियमित वर्षा, और बढ़ती जंगल की आग ने वन पारिस्थितिक तंत्र को गंभीर रूप से प्रभावित किया है।
अत, सार्थक प्रगति सुनिश्चित करने के लिए भारत को वनों के प्रबंधन के लिए एक विस्तृत और सचमुच इको फ्रेंडली नज़रिया अपनाना होगा। सबसे पहले, वनों की परिभाषा को संशोधित करना चाहिए, ताकि प्राकृतिक वनों और वृक्षारोपण के बीच अंतर स्पष्ट हो सके। इससे जैव विविधता और पारिस्थितिकी तंत्र के स्वास्थ्य की वास्तविक तस्वीर मिलेगी। दूसरा, ध्यान केवल हरित आवरण बढ़ाने के बजाय वनों की गुणवत्ता सुधारने पर होना चाहिए। पुराने वनों की रक्षा, मिश्रित प्रजाति वाले वृक्षारोपण को बढ़ावा देना और क्षीण भूमि को पुनर्स्थापित करना महत्वपूर्ण कदम हैं। तीसरा, वन शासन में सामुदायिक भागीदारी को मजबूत किया जाना चाहिए।
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