गुरु नानक की पर्वतीय क्षेत्रों की यात्राएं

धर्म, संस्कृति, मानवीय मूल्यों, सिद्धांतों एवं आदर्शों के प्रचार-प्रसार हेतु श्री गुरू नानक देव ने चार बार विश्व-भ्रमण किया था। इसलिए वह भारतीय संस्कृति की सामाजिक एवं धार्मिक विशिष्टताओं के प्रतीक और मर्यादाओं के आदर्श रहे हैं। उन्हें मानवीय दृष्टिकोण से देखने पर यह पूर्णतया स्पष्ट हो जाता है कि उनके कार्यों में सदैव जनचेतना, नि :स्वार्थ सेवा और जनहित की भावना निहित रही है।

इतिहास साक्षी है कि गुरूनानक देव का हिमालय क्षेत्र (तिब्बत, नेपाल, सिक्किम एवं भूटान) के भ्रमण के दौरान विभिन्न मठाधीशों एवं लामाओं से विचार-विमर्श चलता रहा। तिब्बत में वह कोयल नामक स्थान पर पहुंचे तो वहां का राजा घमंडी, क्रोधी एवं नास्तिक प्रवृत्ति का था। वह ईश्वर पर बिल्कुल भी विश्वास नहीं करता था और प्रजा पर जुल्म ढाता था।

गुरू नानक देव जी के चमत्कार और करुणा से बदला एक राजा का हृदय

गुरूजी की मधुर वाणी और सत्य के उपदेश से क्रिुद्ध होकर उसने गुरू जी को जेल में बंद करवा दिया। इस पर भी उसे शांति नहीं मिली तो उसने जलती आग में गुरू नानक को डलवा दिया। किन्तु गुरू जी को बिना कोई नुकसान पहुंचाये जलती अग्नि बर्फ की तरह ठंडी पड़ गई। आखिरकार तंग आकर घमंडी राजा ने गुरू जी को लोहे की जंजीरों से बंधवा कर पत्थर के साथ झील में फेंकवा दिया।

कमल के फूल की भांति गुरू नानक पानी के ऊपर ही तैरते नजर आये। राजा को अपने किये का पश्चाताप होने लगा। वह श्रद्धापूर्वक गुरू जी के आगे नतमस्तक हो गया, क्योंकि अब उसका हृदय पूर्णतया परिवर्तित हो चुका था। उसके बाद वह प्रजा की सुख-सुविधा और सेवा में तत्पर रहने लगा। तिब्बत से विदा होकर विभिन्न स्थानों का भ्रमण करते हुए, गुरूनानक देव सिक्किम के लाचेन स्थान पर पहुंचे। वहाँ गुरू जी लगभग 85 दिन तक रहे।

लाचेन से 6 किलोमीटर की दूरी पर जोड़े पुल नामक एक स्थान है, जहां गुरूजी ने एक गर्म पानी का चश्मा धरती से खोद निकाला था। इसी प्रकार का गर्म पानी का एक और चश्मा लाचुंग के उत्तर-पश्चिम की ओर युमथांग नाम के स्थान पर गुरूजी की कृपा से स्थापित हुआ। वहाँ चुंगचांग में पत्थर की शिला पर गुरू नानक जी के निशान बने हुए हैं। थक्सम में गर्म पानी के कई चश्मे गुरू जी की दिव्य दृष्टि के परिणामस्वरूप स्थापित हुए।

सिक्किम में गुरू नानक देव जी के पवित्र चरण

गुरू नानक जी तिब्बत से छोटेन नईमाला से होते हुए मुंगूथांगा वादी में आए। यहां से 7 किलोमीटर दूर उत्तर में चीदांद/कीदांग में ठहरे। गुरूडांगमार झील का पानी सदैव जमा रहता था। अपनी दिव्य दृष्टि से उस झील के पानी को हमेशा के लिए बहता हुआ कर दिया, जहां से तीस्ता नदी का उद्गम हुआ, जो आज भी यथावत बह रही है। सिक्किम में गुरू नानक तिब्बत से साकियां मठ से होकर आए थे। यहां से भूटान होते हुए सामया मठ की ओर चले गए।

लाचेन के मुख्य लामा के अनुसार वे अपने धार्मिक स्थल गोंफा में गुरू नानक की पूजा करते हैं जिनको उनकी भाषा में गुरू रिम्पोश के नाम से संबोधित किया जाता है। लाचेन के मुख्य धर्मस्थल गोफा में 15 फीट ऊंची समाधि आसन में गुरूनानक देव की एक विशाल मूर्ति स्थापित है। यहाँ गुरूजी का एक प्राचीन वस्त्र भी सुशोभित है, जो भ्रमण के समय सेवकों के आग्रह पर गुरूजी ने यहां दर्शनार्थ छोड़ दिया था।

मूर्ति के पास ही डेढ़ फुट लंबी एक पत्थर शिला स्थापित है जिस पर गुरू जी के पांव के निशान साफ नजर आते हैं, जो वहां के लोगों के लिए वंदना का स्रोत हैं। सिक्किम के कई स्थानों पर भी गुरू नानक जी के पवित्र चरणों एवं हाथों के निशान अंकित हैं, जो वहां के प्राचीन ग्रंथों में उनकी भाषा लिपि में लिखे हुए हैं। चुंगथांग एवं मुनसीथांग में क्रमश: एक पत्थर की शिला पर गुरू जी के चरणों के निशान हैं। मुनसीथांग, कीदांग एवं कालेप में गुरू नानक के हाथों के निशान भी अंकित हैं, जो वहां के लोगों के लिए प्रेरणा और श्रद्धा का आराध्य स्थल हैं।

चेतन चौहान

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