स्वास्थ्य बजट-2026 : मुकम्मल इलाज या महज मरहम-पट्टी?

बजट में स्वास्थ्य के मद में आवंटन का एक लाख करोड़ रुपये से पार जाना अत्यंत सुखद है, साथ ही कई नई घोषणाएं भी उम्मीद जगाने वाली हैं। लेकिन क्या इसके प्रावधान, प्रस्ताव इस साल स्वास्थ्य क्षेत्र पर इतना असर डालेगें कि देश की सेहत सुधरती हुई लगे?

इस ऐलान के साथ कि देश में मजबूत, समावेशी और आधुनिक स्वास्थ्य प्रणाली तैयार करना सरकार की प्राथमिकता है, बजट में हेल्थकेयर इकोसिस्टम को मजबूत करने पर अभूतपूर्व ज़ोर दिया गया है। यह इस बात से भी दिखता है कि स्वास्थ्य बजट इस बार एक लाख करोड़ रुपये के पार पहुंच गया है, जो कि 2014-15 के 35 हजार करोड़ से कई गुना ज्यादा है।

इस बजट में कुछ लक्षित पहलें सराहनीय हैं जैसे एम्स जैसे 3 नए आयुर्वेदिक हॉस्पिटल बनाने की सोच, 10 हजार करोड़ रुपये के बायोफार्मा शक्ति मिशन के ज़रिए घरेलू बायोफार्मा मैन्यूफैक्चरिंग को बढ़ावा देने की बात, डेढ़ लाख नए केयर गिवर तैयार करने का ऐलान, 5 क्षेत्रीय मेडिकल टूरिज्म हब स्थापित करने हेतु राज्यों को सहायता देने का प्रस्ताव, प्राथमिक स्वास्थ्य अवसंरचना विकास, अस्पतालों में इमरजेंसी और ट्रॉमा केयर सेंटरों का 50 फीसदी विस्तार, डिजिटल हेल्थ मिशन अथवा मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने के लिए नए नेशनल लेवल के मेंटल हेल्थ इंस्टिट्यूट स्थापित करने का प्रावधान, ये लक्ष्य बताते हैं कि सरकार स्वास्थ्य क्षेत्र और उसकी सेवाओं के विस्तार हेतु तर्कसंकल्प है।

1 लाख करोड़ स्वास्थ्य बजट की वास्तविक प्रभावशीलता पर सवाल

बेशक हेल्थकेयर इंफ्रास्ट्रक्चर को अपग्रेड करने, कैंसर की दवाओं को सस्ता करने डायबिटीज और ऑटोइम्यून रोगों की दवाओं को देश में ही बनाने तथा आयुर्वेदिक और दूसरी पारंपरिक दवाओं के लिए क्वालिटी-एश्योरेंस इकोसिस्टम को मजबूत करने के साथ इस क्षेत्र में कुशल लोगों की संख्या बढ़ाने की बात उम्मीद जगाने वाली है। स्वास्थ्य मद में एक लाख करोड़ से अधिक वाले इस बजट के बजटीय प्रावधानों, प्रस्तावों उसके आवंटनों को जब हम इस कसौटी पर परखते हैं कि वे इस क्षेत्र में कोई उल्लेखनीय उपलब्धि दर्ज करवा सकेंगे अथवा मात्र सामान्य बदलावों के वाहक बनेंगे तो कई सवाल उभरते हैं, सबसे अहम बात कि क्या यह आवंटन भारत जैसे विशाल जनसंख्या और जटिल तथा बहुस्तरीय स्वास्थ्य चुनौतियों के अनुपात में पर्याप्त है?

प्रावधान समस्या की जड़ों तक पहुंचते हैं अथवा फौरी समाधान भर हैं? बरसों से बीमार स्वास्थ्य तंत्र के दीर्घकालिक मर्ज के लिए ये मात्र मरहमपट्टी साबित होंगे अथवा मुकम्मल इलाज की कोशिश? स्वास्थ्य व्यय का 1 लाख करोड़ रुपये से ऊपर जाना प्रतीकात्मक रूप से महत्वपूर्ण है, पर देखना होगा कि यह वृद्धि मुद्रास्फीति से समायोजन के बाद वास्तविक तौर पर कितनी है और राज्य तथा केंद्र का हिस्सा कुल सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यय में कितना है? सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यय एक दशक बाद जीडीपी के 1.15 से बढ़कर 2 प्रतिशत के आसपास पहुंचना बढ़िया है पर हमने 2017 में ही 2025 तक इसे 2.5 फीसदी पहुंचाने का प्रण किया था, अब तक दो के करीब ही पहुंचे जो वैश्विक मानकों से बहुत कम है।

प्रदूषण व कुपोषण जैसे कारणों पर रोकथाम की चुनौती

विश्व स्वास्थ्य संगठन 5 फीसद के आसपास की अनुशंसा करता है तो अधिकांश विकसित देशों में यह 5 से 8 फीसद है। एक लाख करोड़ का आंकड़ा प्रभावशाली भले दिखे पर संरचनात्मक कमी बरकरार है। सवाल ये भी है कि क्या बजट के प्रावधान आम आदमी के लिये उसका इलाज और दवा सुलभ और सस्ता कर स्वास्थ्य सेवाओं तक उसकी पहुंच बढ़ाने वाले हैं। प्रदूषित हवा, संदूषित पेयजल, मिलावटी खाद्यपदार्थ, कुपोषण, अस्वास्थ्यकर रहन-सहन जैसे रोगों के कारकों के रोकथाम या उन्हें दूर करने के कारण बनेंगे?

क्या ये चिकित्सकों, नर्सों, पैरामेडिकल स्टाफ और अस्पतालों में बिस्तरों की उपलब्धता पर भी कहीं से प्रभाव डालेंगे? स्वास्थ्य बीमा को आसान करेंगे और ओपीडी में मरीजों की जांच, निदान सुविधा को बढाएंगे? सात दुर्लभ बीमारियों के अलावा कैंसर की दवाओं को सस्ता करने का फैसला सकारात्मक कदम है, रोगियों को महंगे उपचार से यह प्रत्यक्ष राहत देगा पर रोकथाम पर निवेश, नियमित स्क्रीनिंग, जीवनशैली परामर्श, पर भी व्यय अधिक दीर्घकालिक और प्रभावी उपाय होता। देश में गैर संचारी रोगों जैसे डायबिटीज और दिल के मरीज भारी संख्या में मरते हैं, दवा बाजार का बड़ा हिस्सा इन्हीं क्रिाँनिक बीमारियों का है। इन्हें भी दवा के दाम में राहत देनी चहिए थी।

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मूल्य नियंत्रण व अस्पताल विस्तार नहीं तो राहत सीमित

बायोफार्मा शक्ति मिशन के तहत 10,000 करोड़ रुपये का निवेश बायोलॉजिक्स और बायोसिमिलर उत्पादन को बढ़ावा देने से स्वदेशी दवा उत्पादन बढ़ेगा, आयात निर्भरता घटेगा, दीर्घकाल में दवा लागत कम होगी पर यदि राष्ट्रीय औषधि मूल्य नियंत्रण सूची का दायरा नहीं बढ़ा, सार्वजनिक अस्पतालों का विस्तार नहीं हुआ तो राहत सीमित रहेगी। स्वास्थ्य बीमा में राहत का पर्याप्त प्रभाव तभी होगा जब सरकारी अस्पतालों में दवाओं की अनुपलब्धता, स्टॉक-आउट और उपकरणों की खराबी का सिलसिला खत्म होगा।

मरीजों का बड़ा हिस्सा दवाओं और डायग्नोस्टिक्स पर खर्च होता है, बीमा अस्पताल में भर्ती पर मदद करता है, न कि ओपीडी या दवा खर्च पर। ओपीडी सेवाएं जिनके 70 प्रतिशत पर निजी क्षेत्र का कब्जा है और जहां-जहां 60-70 फीसद मरीज जाते हैं अब भी व्यापक कवरेज से बाहर हैं। जिला अस्पतालों में ट्रॉमा सेंटरों का 50 प्रतिशत का विस्तार और 1.5 लाख केयरगिवर्स के प्रशिक्षण का लक्ष्य स्वास्थ्य कार्यबल को सुदृढ़ करने की दिशा में बढ़िया प्रयास है इसी तरह मानसिक स्वास्थ्य के लिए नए राष्ट्रीय संस्थान स्थापित करने की घोषणा भी।

भारत में कुल स्वास्थ्य व्यय का लगभग 50 फीसद अब भी आउट ऑफ पॉकेट एक्सपेंडीचर है। 2004 में यह 65 प्रतिशत से अधिक था, जो घटा तो है, पर इस बार के बजटीय प्रावधान ऐसी उम्मीदें नहीं जगाते कि इसमें कोई जबर्दस्त गिरावट आयेगी। बजट जड़ समस्याओं पर सीधा आवंटन नहीं करता, केवल नयी स्कीम जोड़ता है। तीन नए आयुर्वेद एम्स संस्थान और आयुष फार्मेसियों के उन्नयन की घोषणा पारंपरिक चिकित्सा को संस्थागत समर्थन देती तो है पर आयुर्वेद की दीर्घकालिक विश्वसनीयता केवल संस्थान खोलने से नहीं बल्कि इलाज के लिये जड़ी-बूटियों की अनुपलब्धता न हो इसलिये उनका संरक्षण, जनता में इस पद्धति पर जागरूकता और विश्वास बढाने, वैज्ञानिक शोध और गुणवत्ता मानकों से तय होगी।

बेड और डॉक्टरों की कमी से स्वास्थ्य ढांचा कमजोर

जैव-विविधता संरक्षण और औषधीय पौधों की खेती में निवेश अधिक निर्णायक होगा। आयुष बजट को 17 से 7 प्रतिशत बढ़ोत्तरी के सटीक आंकड़े अस्पष्ट हैं। देश में प्रति हजार लोगों पर बेड की उपलब्धता लगभग 1.4 है, जबकि विश्व औसत साढ़े तीन से अधिक है। डॉक्टर-जनसंख्या अनुपात भी आदर्श 1:1000 से कमतर है। नर्सिंग और पैरामेडिकल स्टाफ की कमी व्यापक है। ऐसे में केवल आवंटन वृद्धि से तस्वीर बदलना आसान नहीं।

स्वास्थ्य के मूल में है शुद्ध पेयजल और गैर मिलावटी खाद्य सामग्री, साफ हवा तथा स्वास्थ्यकर रहन सहन।18 प्रतिशत मौतें प्रदूषण से होती हैं लेकिन बजट पर्यावरण-स्वास्थ्य लिंक के बारे में मौन है। दूषित जल और प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों की समस्या पर पर्याप्त निवेश नहीं होता, तो अस्पताल-केंद्रित मॉडल रोगों का मूल कारण नहीं रोक पायेगा। नगरपालिका सेवाएं जैसे सीवेज, वेस्ट मैनेजमेंट, खाद्य सुरक्षा निगरानी, एयर पॉल्यूशन, पेयजल मिशन में निवेश अधिक महत्वपूर्ण है इनको इस बजट में अपेक्षित स्वास्थ्य प्राथमिकता नहीं मिली हैं।

संजय श्रीवास्तव
संजय श्रीवास्तव

हील इन इंडिया और मेडिकल टूरिज्म हब भारत को वैश्विक स्वास्थ्य केंद्र बना सकते हैं, परंतु यह प्रश्न बना रहेगा कि क्या इन निवेशों से ग्रामीण और शहरी गरीबों की प्राथमिक स्वास्थ्य जरूरतें समान प्राथमिकता पायेंगी? सरकार को डिलीवरी-केंद्रित आवंटन और निजी नियमन पर फोकस करना चाहिए अन्यथा, ये प्रावधान कागजी ही साबित होंगे। इस बजट में दिशा है, परंतु पैमाना और संरचनात्मक सुधार अभी अधूरे हैं। निर्णायक बदलाव के लिए अधिक संसाधन, कठोर क्रियान्वयन, सार्वजनिक स्वास्थ्य डिलीवरी सुधार और रोकथाम-आधारित दृष्टिकोण आवश्यक हैं। जब तक मेडिकल कॉलेज, जिला अस्पताल और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों का विस्तार बड़े पैमाने पर नहीं होगा, केवल बजट वृद्धि से तस्वीर नहीं बदलेगी। ये नवीनतम मरहमपट्टी ही साबित होंगे, न कि मुकम्मल इलाज।

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