तिल-गुड़ में छिपा संदेश

माघ मास को तप, दान और स्नान का महीना कहा गया है। तिल को ऊष्ण और पवित्र माना जाता है। ठंड के मौसम में तिल शरीर को ऊर्जा देने के साथ-साथ धार्मिक दृष्टि से भी विशेष फलदायी होता है। तिल गुड़ घ्या, अणि गोड़ गोड़ बोला। यह एक प्रसिद्ध मराठी कहावत है, जिसका अर्थ है- तिल-गुड़ लीजिए और मीठा बोलिए। यह पर्व पुराने मतभेदों को भुलाकर रिश्तों में मिठास घोलने और वाणी में मधुरता लाने का अवसर है।

तिल और गुड़ का मिश्रण हमें भीतर से उज्जवल और शुद्ध रहने का संदेश देता है। तिल बाहर से काला और भीतर से सफेद होता है, जो यह सिखाता है कि हमें अपने भीतर की मासूमियत और शुद्धता को बनाए रखना चाहिए। यह मेल हमें जीवन में मधुरता (गुड़ की तरह) और सूक्ष्मता (तिल की तरह) अपनाने की प्रेरणा देता है।

गुरुदेव श्री श्री रवि शंकर

इस सृष्टि के विशाल परिप्रेक्ष्य में हम एक तिल के समान सूक्ष्म कण हैं। जब हम यह याद रखते हैं कि हम छोटे और मधुर हैं, तब हम वास्तव में बड़े बनते हैं। जिस क्षण व्यक्ति में मद या घमंड आता है कि- मैं कुछ हूँ, वहीं से उसका पतन शुरू हो जाता है। इसलिए तिल के समान हमें एक छोटा अणु व गुड़ के समान मीठा बनकर रहना चाहिए।

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