हिंडोला-दर्शन है फाल्गुन पूर्णिमा की विशेष परंपरा
फाल्गुन पूर्णिमा तिथि से जुड़ी कई परंपराएं हैं। उनमें होलिका की पूजा के साथ ही भगवान विष्णु, श्रीकृष्ण और देवी लक्ष्मी का अभिषेक भी किया जाता है। शिवलिंग का रुद्राभिषेक करते हैं, दान-पुण्य करके नदी-स्नान करने की भी परंपरा है।
इन शुभ कामों के साथ ही फाल्गुन पूर्णिमा पर बाल गोपाल और हिंडोला-दर्शन करने का भी विशेष महत्व है। शास्त्रों में बाल गोपाल और हिंडोला-दर्शन का महत्व काफी अधिक बताया गया है। माना जाता है कि जो लोग फाल्गुन पूर्णिमा पर हिंडोला-दर्शन करते हैं, उनकी सभी इच्छाएं भगवान पूरी करते हैं। शास्त्रों में लिखा है-
फाल्गुनस्य तु राकायां मण्डयेद्दोलमण्डपम् ।
पश्चातसिंहासनं पुष्पैर्नूतनैर्वस्त्रचित्रकैः ।।
अर्थात- फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा की रात सुंदर फूलों से सजे हुए, झूले पर नए वस्त्र पहने हुए भगवान बाल गोपाल को विराजमान किया जाता है। इसके बाद पू-जा-पाठ के साथ होली उत्सव मनाया जाता है। इसे ही हिंडोला-दर्शन कहते हैं। हिंडोला बनाने के लिए एक छोटा-सा झूला बनाएं और उसे सुंदर फूलों से सजाएं। बाल गोपाल को विराजित करने के लिए झूले में आसन बनाएं।
बाल गोपाल का अभिषेक करके नए लाल-पीले चमकीले वस्त्र पहनाएं। इसके बाद भगवान र्वे झूले में बने आसन पर विराजित करें। धूप-दीप जलाकर भगवान की आरती करें। कृं कृष्णाय नमः मंत्र का जप करें। भगवान को फूल-फल आदि अर्पित करें। इस तरह पूजा करने के बाद होली उत्सव मनाएं। एक-दूसरे पर फूल और गुलाल उड़ाएं।
श्राद्ध कर्म
फाल्गुन पूर्णिमा पर पितरों के लिए श्राद्ध-कर्म भी करना चाहिए। माना जाता है कि इस तिथि पर किए गए श्राद्ध, तर्पण, धूप-ध्यान से घर-परिवार के पितर देवता बहुत प्रसन्न होते हैं। इसके लिए दोपहर में करीब 12 बजे गाय के गोबर से बना कंडा जलाएं।
जब कंडे से धुआं निकलना बंद हो जाए, तब कंडे के अंगारों पर गुड़-घी डालें और पितरों का ध्यान करें। हथेली में जल लेकर अंगूठे की ओर से पितरों को अर्पित करें। ये धूप-ध्यान करने की सरल विधि है। इस दिन जरूरतमंद लोगों को धन और अनाज का दान भी करना चाहिए।
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