भारत-चीन निकटता बनाम चीन-पाक समीकरण

दक्षिण एशिया की भू-राजनीति इन दिनों एक दिलचस्प मोड़ पर खड़ी है। भारत और चीन के रिश्तों में सुधार के आसार देखते हुए, यह पूछा जाने लगा है कि चीन और पाकिस्तान के रिश्तों पर उसका क्या असर होगा? क्या दशकों पुरानी बीजिंग-इस्लामाबाद साझेदारी में दरार आ सकती है, या यह गठजोड़ अपनी रणनीतिक मजबूती के कारण अप्रभावित रहेगा?जगज़ाहिर है कि भारत और चीन के बीच 2020 के गलवान संघर्ष के बाद गहरा अविश्वास पैदा हुआ। सीमा पर तनाव, सैनिक तैनाती और कूटनीतिक तल्ख़ी ने रिश्तों को न्यूनतम स्तर पर ला दिया।

फिर भी, हाल के महीनों में सैन्य-कूटनीतिक वार्ताओं और तनाव कम करने के संकेतों ने यह संभावना जगाई है कि दोनों देश प्रतिस्पर्धा के बीच सहअस्तित्व का रास्ता तलाश सकते हैं। आर्थिक स्तर पर भी वास्तविकता यह है कि चीन भारत का एक बड़ा व्यापारिक साझेदार बना हुआ है। व्यापार असंतुलन और सुरक्षा चिंताओं के बावजूद, आपसी आर्थिक रिश्ते पूरी तरह टूटे नहीं हैं।

दूसरी ओर, चीन और पाकिस्तान के रिश्तों का इतिहास केवल तात्कालिक सुविधा पर आधारित नहीं है। 1960 के दशक से दोनों देशों के बीच गहरी सामरिक निकटता रही है। चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (सीपेक) इस साझेदारी की रीढ़ है। इससे पाकिस्तान को बुनियादी ढाँचे में भारी निवेश मिला है, तो चीन को अरब सागर तक रणनीतिक पहुँच मिली है। रक्षा सहयोग, सैन्य तकनीक और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर एक-दूसरे का समर्थन – ये सभी इस रिश्ते को एक ऑल-वेदर साझेदारी का स्वरूप देते हैं।

भारत-चीन स्थिरता का चीन-पाक रिश्तों पर प्रभाव

ऐसे में सवाल उठता है कि यदि भारत और चीन के रिश्तों में स्थिरता आती है, तो क्या बीजिंग इस्लामाबाद से दूरी बना लेगा? यथार्थवादी दृष्टिकोण से देखें तो यह संभावना बहुत कम है। चीन की विदेश नीति भावनात्मक नहीं, बल्कि दीर्घकालिक रणनीतिक हितों से संचालित होती है। पाकिस्तान उसे हिंद महासागर क्षेत्र में रणनीतिक गहराई देता है और दक्षिण एशिया में शक्ति संतुलन बनाए रखने का माध्यम भी है। इसलिए भारत के साथ रिश्ते सुधारना, पाकिस्तान को त्याग देने के समान नहीं होगा।

हाँ, इतना अवश्य संभव है कि यदि भारत-चीन रिश्तों में वास्तविक और स्थायी सुधार होता है – सीमा पर शांति, व्यापार में संतुलन और बहुपक्षीय मंचों पर सहयोग – तो चीन अपने संसाधनों और प्राथमिकताओं का पुनः संतुलन कर सकता है। इसका अर्थ यह नहीं कि चीन-पाकिस्तान रिश्ते टूट जाएँगे, बल्कि यह कि उनका स्वरूप कुछ हद तक व्यावहारिक और कम आक्रामक हो सकता है। उदाहरण के लिए, यदि चीन को भारत के साथ आर्थिक सहयोग से अधिक लाभ दिखाई देता है, तो वह क्षेत्रीय स्थिरता को प्राथमिकता दे सकता है और पाकिस्तान से अपेक्षा कर सकता है कि वह भारत के विरुद्ध उकसावे की नीति को सीमित रखे।

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भारत-चीन मतभेद : सीमा विवाद और वैश्विक प्रतिस्पर्धा

हालाँकि, यह भी ध्यान रखना होगा कि भारत और चीन के बीच मूलभूत मतभेद – सीमा विवाद, हिंद-प्रशांत रणनीति और वैश्विक शक्ति प्रतिस्पर्धा – अब भी मौजूद हैं। जब तक इन प्रश्नों का स्थायी समाधान नहीं होता, तब तक चीन के लिए पाकिस्तान एक उपयोगी सामरिक संतुलनकारी बना रहेगा। याद रहे कि दक्षिण एशिया की कूटनीति कोई शून्य-योग खेल नहीं है। एक देश के साथ सुधार का अर्थ दूसरे के साथ विच्छेद नहीं होता।

भारत-चीन रिश्तों में संभावित सुधार चीन-पाकिस्तान रिश्तों को कमजोर करने के बजाय उन्हें नए संदर्भ में ढाल सकता है। बीजिंग शायद संतुलन की नीति अपनाएगा। यानी भारत के साथ टकराव कम करते हुए, पाकिस्तान के साथ अपनी रणनीतिक साझेदारी बनाए रखेगा। अंततः, भारत के लिए इस परिदृश्य का संदेश स्पष्ट है। हमें चीन के साथ संवाद और प्रतिस्पर्धा दोनों को संतुलित रखते हुए अपनी सामरिक, आर्थिक और कूटनीतिक शक्ति को सुदृढ़ करना होगा। क्योंकि अंततः स्थिरता का आधार बाहरी समीकरण नहीं, बल्कि अपनी राष्ट्रीय क्षमता और दूरदर्शी नीति ही होती है।

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