भारत-अमेरिका ट्रेड डील : हम फायदे में रहे या समर्पण किया ?

इसमें कोई दो राय नहीं है कि अमेरिकी निवेश से भारत में हाई वैल्यू जॉब्स आएंगी। टेक, डिफेंस और एनर्जी सेक्टर में एफडीआई बढ़ेगा। एमएसएमई को वैश्विक सप्लायी चेन में प्रवेश मिलेगा, तो अगर हम ये फायदा चाहते हैं तो हमें भी अमेरिका को कुछ फायदा तो देने ही होंगे। निश्चित रूप से भारत और अमेरिका के बीच जो बहुस्तरीय ट्रेड डील होगी, उसमें दोनों को अपने-अपने तरह से फायदा होगा। लेकिन यह कहना भी गलत होगा कि हमारी एकतरफा जीत हुई है या हमें एकतरफा समर्थन करना पड़ रहा है। वैसे भी इस ट्रेड डील का असली मूल्याकंन 5-7 सालों के लगातार व्यापार को देखकर ही तय किया जा सकता है। इसलिए महज राजनीतिक अग्रता हासिल करने के लिए न तो यह कहने की होड़ में शामिल होना चाहिए और न ही इस तरह के सरलीकरण का माहौल बनाना चाहिए कि डील में भारत का अपर हैंड रहा है।

यह सवाल पूछने और सुनने में जितना आसान है, इसका जवाब सचमुच में उतना ही राजनीति और कूटनीति के कॉकटेल से निर्मित होने के कारण जटिल है। पिछले दिनों जब से भारत और अमेरिका के बीच अंतत कई महीनों बल्कि कहना चाहिए कई सालों से लटकी ट्रेड डील वास्तव में सम्पन्न हो गई, तो केंद्र सरकार और विशेष करके हमारे वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने कहा कि सरकार ने संवेदनशील कृषि और डेयरी उत्पादों में भारतीय किसानों की पूरी तरह से रक्षा की है।

जबकि कांग्रेस के प्रवक्ता पवन खेड़ा का कहना है, अमेरिका ने 3 फीसदी के टैरिफ को बढ़ाकर 50 फीसदी कर दिया और अब घटाकर उसे 18 फीसदी किया, तो मोदी सरकार खुश हो रही है, जबकि उसने हमारे द्वारा रूस से तेल खरीदने पर पांबदी लगा दी है अगर हमने इस पाबंदी के बावजूद तेल खरीदा तो यह भी कहा है कि दोबारा से टैरिफ लागू कर दिया जायेगा। यही नहीं विपक्ष का यह भी कहना है कि अगले पांच सालों में हमें अमेरिका से 500 अरब डॉलर का आयात करना है यानी भारत को अपना आयात तीन गुना बढ़ाना पड़ेगा।

सरकार ने कृषि व डेयरी उत्पादों की पूरी तरह से रक्षा की

इसके लिए हमें हर साल अमेरिका से 40 से 42 अरब डॉलर के आयात को बढ़ाकर 100 अरब डॉलर करना पड़ेगा। लेकिन सरकार के पास अभी इस बात की स्पष्टता नहीं है कि हर साल जो 58 से 60 अरब डॉलर का अतिरिक्त आयात होगा, वह आखिर क्या होगा?

चूंकि अमेरिका का कहना है कि भारत के साथ व्यापार में उसे करीब 60 अरब डॉलर का नुकसान हो रहा है। इसलिए भारत को आयात बढ़ाना जरूरी है ताकि अमेरिका का व्यापार घाटा पूरा हो सके। दूसरी तरफ शिवराज सिंह चौहान और पीयूष गोयल ने एक्स पर जारी अपने बयानों में स्पष्ट किया है कि सरकार ने कृषि और डेयरी क्षेत्र की पूरी तरह से रक्षा की है। पीयूष गोयल के मुताबिक मक्का, गेहूं, चावल, सोया, मुर्गी पालन, दूध, पनीर, एथेनॉल (ईंधन), तंबाकू, कुछ सब्जियां और मांस जैसी संवेदनशील कृषि व डेयरी उत्पादों की पूरी तरह से रक्षा की है।

प्रमुख फसलों और डेयरी उत्पादों पर अमेरिका के लिए कोई छूट नहीं

इसी तरह शिवराज सिंह चौहान के मुताबिक सरकार ने सोयाबीन, चीनी, अनाज, केला, स्ट्रॉबेरी, चिप्स, खट्टे फल, हरी मटर, काबूली चना, मूंग, जैसे उत्पादों पर कोई टैरिफ छूट नहीं दी है यानी सरकार का कहना है कि हमारी मुख्य फसलों और डेयरी उत्पादनों के लिए, अमेरिका के लिए कोई द्वार नहीं खोला गया। यही नहीं भारत से कई कृषि उत्पाद अमेरिका को जीरो ड्यूटी पर दिए जाएंगे, जिनमें चाय, कॉफी, नारियल, सुपारी, काजू, एवोकाडो, केला, आम, कीवी, पपीता और अनानास शामिल हैं। लेकिन सरकार यह स्पष्ट नहीं कर रही कि भारत पर हर साल जो 58 से 60 अरब डॉलर आयात बढ़ाने का प्रेशर है, उसके लिए सरकार आखिर क्या खरीदेगी?

दूसरी तरफ विपक्ष भी स्पष्ट रूप से उन उत्पादों को नहीं बता रहा, जिस पर सरकार ने पूरी तरह से सरेंडर कर दिया है। लेकिन न तो सरकार के कुछ कहने का विपक्ष के लिए कोई वजन है और न ही विपक्ष के किसी आरोप से सरकार भी किसी तरह से चिंतित दिख रही। ऐसे में सवाल है आम आदमी इस डील को किस तरह समझे? क्योंकि सरकार ताल ठोककर यह कह रही है कि यह पूरी तरह से हमारे पक्ष की डील है, तो दूसरी तरफ विपक्ष जोरदार ढंग से यह कह रहा है कि सरकार ने आत्म समर्पण कर दिया है। लेकिन आम आदमी इन दोनों बातों को कैसे समझे? ऐसा तो नहीं है कि विपक्ष अपना राग गाकर और सरकार उसे किसी तरह से न सुनकर राजनीतिक आरोपों-प्रत्यारोपों को बेमतलब तो नहीं बना रहे?

आम मतदाता अपराधीकरण को समझने में असमर्थ

जैसे दशकों तक पक्ष-विपक्ष एक-दूसरे पर राजनीति में अपराधीकरण को बढ़ावा देने का आरोप लगाते रहे और आम मतदाता यह समझ ही नहीं पाया कि कौन वास्तव में राजनीति में अपराधीकरण का सचमुच में दोषी है। अंत में आम मतदाता इस आरोप-प्रत्यारोप से इस कदर उदासीन हो गया कि अब उसे कोई फर्क ही नहीं पड़ता कि कौन सच बोल रहा है और कौन झूठ? मतदाता मान चुका है कि राजनीति बिना अपराध के हो ही नहीं सकती और इस तरह राजनीति के अपराधीकरण की स्वीकृति हो गई है।

कहीं यही हाल विपक्ष के आरोपों पर सरकार के कान न देने और सरकार के तथ्यों को विपक्ष द्वारा बार-बार झुठलाया जाना, उसी दिशा में तो कदम नहीं बढ़ रहे कि आम लोग मान लें कि व्यापार का मतलब ही शोषण है और शोषण की स्वस्वीकृति हो जाए। वैसे अगर गौर से देखें तो विपक्ष भारत द्वारा डब्ल्यूटीओ (वर्ल्ड ट्रेड ऑर्गनाइजेशन) पर हस्ताक्षर करने के समय से कृषि और डेयरी क्षेत्र के लिए लकड़बग्घा आया, लकड़बग्घा आया की रट लगाए है और अभी तक ऐसा कुछ नहीं हुआ कि घबराया जाए। दूसरी तरफ सैद्धांतिक तौरपर हमें यह बात भी स्वीकारनी पड़ेगी कि हम जिस सिद्धांत का हवाला देकर यानी मुक्त वैश्विक कारोबार के जरिये खुद अपनी अर्थव्यवस्था को लगातार ऊंचाई पर ले जाना चाहते हैं, तो फिर हम उन्हीं बातों के लिए विदेशों को भला किस नैतिकता के आधार पर बुराई कर सकते हैं।

LIC के वैश्विक कारोबार पर विपक्ष के सवाल

यह कुछ वैसे ही हुआ, जैसे पिछली सदी के आखिरी दशक में सरकार बीमा क्षेत्र, विदेशी कंपनियों के लिए खोलना चाहती थी और तत्कालीन विपक्ष इसकी जोर-शोर से आलोचना कर रहा था। लेकिन ठीक उसी समय विपक्ष का यह भी आरोप था कि एलआईसी (लाइफ इंश्योरेंस कॉरपोरेशन) अपना कारोबार दुनिया में क्यों नहीं बढ़ा पा रहा? इसी तरह उसी समय स्टेट बैंक ऑफ इंडिया दुनिया के चार दर्जन से ज्यादा देशों में बैंकिंग कारोबार कर रही थी और विपक्ष का आरोप यह था कि भारत में विदेशी बैंकों को अपनी शाखाएं खोलने का या कारोबार करने का मौका क्यों दिया जा रहा है?

यह वास्तव में एक ही समय दो विरोधाभासी स्थितियां हैं। अगर हम तेजी से दुनिया के बाजार में अपनी मौजूदगी बढ़ाकर भारत की अर्थव्यवस्था को अगले कुछ सालों में दुनिया की तीसरी अर्थव्यवस्था बनाना चाहते हैं, तो भला हम किस आधार पर विदेशी कंपनियों के कारोबार या विदेशों के साथ देश के कारोबार को कैसे रोक सकते हैं? भारत और अमेरिका के बीच 2023-24 में 190 बिलियन डॉलर का कारोबार हुआ, जिसमें भारत और अमेरिका के बीच 65:35 का अनुपात था।

हम सिर्फ अपने फायदे की बात कहकर सैद्धांतिक रूप से सच नहीं रह सकते। भारत और अमेरिका के बीच अगर 2030 तक कारोबार को बढ़ाकर 500 बिलियन तक ले जाना है, तो जाहिर इस बढ़े कारोबार से दोनों देशों को फायदा होगा। क्योंकि इस कारोबार में अभी तक जो तीन बड़ी बाधाएं थी जिनमें- टैरिफ, मार्केट एक्सेस और टेक्नोलॉजी व डेटा से जुड़े नियम थे, इन्हें ढील तो देनी ही पड़ेगी अगर कारोबार को बढ़ाना है। ऐसा नहीं हो सकता कि हम अपने बाजार में तो अमेरिका को घुसने से रोके और खुद अमेरिका के समृद्ध बाजार का ज्यादा से ज्यादा फायदा उठाना चाहें।

सेमीकंडक्टर सप्लायी चेन और डिफेंस में साझेदारी बढ़ाएँ

अगर अमेरिका चाहता है और दबाव बनाता है कि भारत अपने उन क्षेत्रों को भी उसके लिए खोले, जिसे आजतक हमने बंद कर रखा है, तो हमें भी चाहिए कि हम अमेरिका पर इस तरह का प्रेशर बनाएं कि सेमीकंडक्टर सप्लायी चेन से लेकर डिफेंस प्रोडक्शन तक में वो हमें अपना रणनीतिक और तकनीकी साझेदार बनाए, जिससे हम जो अंधाधुंध पैसा इन क्षेत्रों पर खर्च कर रहे हैं, इसमें काफी बचत हो।

इसमें कोई दो राय नहीं है कि अमेरिकी निवेश से भारत में हाई वैल्यू जॉब्स आएंगी। टेक, डिफेंस और एनर्जी सेक्टर में एफडीआई बढ़ेगा। एमएसएमई को वैश्विक सप्लायी चेन में प्रवेश मिलेगा, तो अगर हम ये फायदा चाहते हैं तो हमें भी अमेरिका को कुछ फायदा तो देने ही होंगे। निश्चित रूप से भारत और अमेरिका के बीच जो बहुस्तरीय ट्रेड डील होगी, उसमें दोनों को अपने-अपने तरह से फायदा होगा। लेकिन यह कहना भी गलत होगा कि हमारी एकतरफा जीत हुई है या हमें एकतरफा समर्थन करना पड़ रहा है।

-लोकमित्र गौतम
-लोकमित्र गौतम

वैसे भी इस ट्रेड डील का असली मूल्याकंन 5-7 सालों के लगातार व्यापार को देखकर ही तय किया जा सकता है। इसलिए महज राजनीतिक अग्रता हासिल करने के लिए न तो यह कहने की होड़ में शामिल होना चाहिए और न ही इस तरह के सरलीकरण का माहौल बनाना चाहिए कि डील में भारत का अपर हैंड रहा है। व्यापार के जोखिमों को अवसरों में बदलने का यह एक नट संतुलन साधने जैसा प्रयास है और विश्व व्यापार हमेशा इसी तरह से होते रहें। इसलिए न पक्ष को और न ही विपक्ष को किसी को भी इस ट्रेड डील को एकतरफा बताना चाहिए।

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