धर्म को केवल परम्पराओं में बांधने के बजाय प्रैक्टिकल स्वरूप में जीने की कोशिश करें : ललितप्रभजी
हैदराबाद, सहज-सरल धर्म का मार्ग जीने के लिए अहिंसा, अचौर्य सत्य, शील और अपरिग्रह को जीवन में जीने की कोशिश कीजिए। कभी किसी का दिल न दुखाएँ। पराई वस्तु और धन को अपना बनाने की कोशिश न करें। सत्यवादी बनते हुए कभी झूठ न बोलें और जीवन में निर्मलता और पवित्रता को जीते हुए शीलव्रत का पालन करें। अपनी आवश्यकता से ज्यादा धन अपने पास हो, तो जरूरतमंदों को समर्पण कर दें।
उक्त उद्गार नुमाइश मैदान में लोक कल्याणकारी चातुर्मास समिति, त्रयनगर, हैदराबाद द्वारा आयोजित 53 दिवसीय प्रवचनमाला के तहत पाँच संकल्प जो बदल देंगे जीवन विषय पर प्रवचन देते हुए राष्ट्र संत ललितप्रभसागरजी म.सा. ने व्यक्त किये। आज समिति के अध्यक्ष प्रदीप सुराणा द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, म.सा. ने कहा कि धर्म हमें आचरण को श्रेष्ठ और धर्ममय बनाने की प्रेरणा देता है।
धर्म का आचरण: जीवन को मंदिर बनाने की प्रेरणा
धर्म को केवल परम्पराओं में बांधने की बजाय प्रेक्टिकल स्वरूप में जीने की कोशिश कीजिए। धर्म की हमें सिखावन है- अपने कर्तव्यों का पालन कीजिए, इंसान होकर इंसान के काम आइए, मनोविकारों पर विजय प्राप्त कीजिए और सब धर्मों का सम्मान कीजिए। उन्होंने कहा कि अंतरमन में त्याग, वैराग्य और संयम के प्रति श्रद्धा रखिए। अपने कषाय और मनोविकारों पर विजय प्राप्त कीजिए। अगर हम निर्मल कर्म और विचारों के मालिक बनते हैं, तो हमारा स्वरूप चलते-फिरते मंदिर जैसा ही होगा।
पूज्यश्री ने कहा कि आप जिस धर्म के अनुयायी हैं, उसका आचरण कीजिए, पर अन्य धर्मों के प्रति भी प्रेम रखिए। इस दुनिया में प्रेम के मंदिर हों, प्यार के गिरजे हों और मोहब्बत की मस्जिदें बनें, तो धरती को स्वर्ग बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा हो जाएगी। अगर हम धर्म का ऐसा स्वरूप बनाते हैं, तो पूरी दुनिया धर्म का आचरण करने के प्रति स्वत ही समर्पित हो जाएगी और यह धरती किसी भगवान का मंदिर और तीर्थ बन जाएगी।
जिसके पास धन है, वह भाग्यशाली, जिसके पास धन व स्वास्थ्य है, वह महाभाग्यशाली, पर जिसके पास धन और स्वास्थ्य के साथ धर्म भी है, वह है सौभाग्यशाली। संतप्रवर ने कहा कि हमें जीवन का हर कार्य धर्मपूर्वक करना चाहिए। खाना-पीना, उठना-बैठना, चलना-फिरना सारे काम विवेकपूर्वक किया जाएँ, तो धर्म का आचरण होगा। उन्होंने कहा कि हमें सत्यनिष्ठा के प्रति सावधान रहना चाहिए।
सत्य, संयम और प्रार्थना का संदेशमय आयोजन
झूठ का जायका जबरदस्त होता है, आदमी खुद बोले तो बड़ा मीठा लगता है, पर दूसरा बोले तो कड़वा लगता है। उन्होंने कहा कि जीते जी वे लोग पूजे गए, जो सुन्दर, समृद्ध और सत्ता में थे। पर मरने के बाद वे लोग पूजे गए, जो त्यागी, तपस्वी और धर्मात्मा थे। संतप्रवर ने कहा कि इंसान का दूसरा धर्म है भीतर पलने वाले विकारों पर विजय पाना। इंसान आकृति से ही नहीं, प्रकृति से भी इंसान बने। कमजोर और काले मन वाले कभी सच्चे धार्मिक नहीं बनते।
डॉ. मुनि शांतिप्रिय सागरजी म.सा. ने नवकार महामंत्र की सामूहिक प्रार्थना करवाई। कार्यक्रम में मोक्ष बरलोटा द्वारा गुरु भक्ति पर भजन की प्रस्तुति दी गई। समारोह का शुभारंभ डॉ. सुरेश जाजू, दयाशंकर रांधड़, विद्यासागर मोदानी (निजामाबाद), पंकज कुमार चोरड़िया, रेखा चोरड़िया (बेंगलुरू), महावीरचंद भलगट, ओमप्रकाश, संतोषचंद कटारिया, स्मिता गडवानी द्वारा भगवान महावीर की मूर्ति के समक्ष दीप प्रज्ज्वलित कर किया गया।
सभी का स्वागत विमल कुमार नाहर, मोतीलाल भलगट, उमेश बागरेचा, प्रदीप सुराणा, अमित मुणोत, पवन कुमार पांड्या, नवरतनमल गुंदेचा, अशोक कुमार नाहर, माणकचंद पोकरणा, विमल कुमार मुथा, प्रवीण कुमार सुराणा, चन्द्रप्रकाश लोढ़ा, शोभा देवी नाहर, शोभा रानी भलगट, आरती सुराणा, लाड़ कंवर नाहर, सूरज देवी गुंदेचा, सविता मुथा, ललिता पोकरणा ने किया। मंच संचालन करते हुए महामंत्री अशोक कुमार नाहर ने बताया कि शुक्रवार, 8 अगस्त को प्रभु तक कैसे पहुँचाएं अपनी प्रार्थना विषय पर प्रवचन होगा।
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