ईरान विरोध प्रदर्शन : सड़कों पर गुस्सा, सत्ता पर दबाव और भविष्य पर सवाल

ईरान की सड़कों पर आज सिर्फ नारे नहीं गूंज रहे, बल्कि एक सवाल भी गूंज रहा है-क्या हमारी ज़िंदगी की कीमत सत्ता से कम है। 217 मौतें, इंटरनेट बंद, गोलियों की धमकी और आर्थिक बदहाली: इन सबने जनता और सरकार के बीच की खाई और चौड़ी कर दी है। इतिहास गवाह है कि जब आम लोग डर से ऊपर उठ जाते हैं, तो सत्ता के सबसे मजबूत किले भी हिलने लगते हैं। ईरान आज उसी मोड़ पर खड़ा है। या तो वह अपने लोगों की आवाज़ सुनेगा या फिर आवाज़ को दबाकर एक और तूफान की नींव रखेगा। फिलहाल, ईरान की सड़कों पर बहता खून सिर्फ विरोध नहीं, बल्कि भविष्य की चेतावनी है।

ईरान इस समय अपने इतिहास के सबसे संवेदनशील दौर से गुजर रहा है। राजधानी तेहरान से लेकर दूर-दराज़ के कुर्द इलाकों तक, सड़कों पर उतर आए लोगों का गुस्सा अब केवल नारेबाज़ी तक सीमित नहीं है। गोलीबारी, आगज़नी, मौतें और सख्त चेतावनियां…हर दिन हालात और गंभीर होते जा रहे हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक सिर्फ तेहरान के छह अस्पतालों में 217 प्रदर्शनकारियों की मौत दर्ज की गई है। इनमें से ज़्यादातर की मौत गोलियों से हुई है। सरकार का संदेश भी उतना ही कठोर है।

रिवोल्यूशनरी गार्ड्स के एक अधिकारी का बयान-अपने बच्चों को प्रदर्शन से दूर रखें, वरना गोली लगे तो शिकायत मत करना-साफ बताता है कि सत्ता अब नरमी के मूड में नहीं है। यह सिर्फ चेतावनी नहीं, बल्कि डर पैदा करने की रणनीति है। लेकिन सवाल यह है कि क्या डर अब भी काम करेगा या ईरान एक ऐसे मोड़ पर पहुंच चुका है, जहां लोगों के पास खोने को कुछ नहीं बचा।

वैसे देखा जाए तो ईरान में गुस्से की जड़ें नई नहीं हैं। सालों से आर्थिक संकट, अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध, बेरोज़गारी, महंगाई और सामाजिक पाबंदियां लोगों को भीतर ही भीतर उबाल रही थीं। अब वह उबाल सड़कों पर फूट पड़ा है। दिसंबर 2025 में ईरानी मुद्रा रियाल गिरकर, इतिहास के सबसे निचले स्तर, 1.45 मिलियन प्रति डॉलर तक पहुंच गई है। सिर्फ एक साल में रियाल की कीमत लगभग आधी हो गई।

बेरोज़गारी और पाबंदियों से जेन‑जी में बढ़ता गुस्सा

महंगाई ने आम आदमी की कमर तोड़ दी है। खाने-पीने की चीज़ें जहां 72 तो दवाइयां 50 प्रतिशत तक महंगी हो गई है। ऊपर से 2026 के बजट में 62 प्रतिशत टैक्स बढ़ाने का प्रस्ताव। यानी आम ईरानी के लिए ज़िंदगी अब सिर्फ गुज़ारा करने की जद्दोजहद बन गई है। युवाओं, खासकर जेन-जी के लिए हालात और भी घुटन भरे हैं। पढ़ाई के बाद नौकरी नहीं, नौकरी के बाद ठीक-ठाक कमाई नहीं और सामाजिक आज़ादी पर सख्त पहरा। ऐसे में विरोध स्वाभाविक था।

शुरुआती दिनों में सरकार असमंजस में दिखी। खुद एंटी-राइट्स पुलिस के एक अधिकारी ने कहा कि सुरक्षा बल भ्रम में हैं। किसी को नहीं पता कि आगे क्या होगा। लेकिन जैसे ही प्रदर्शन मध्यमवर्गीय इलाकों तक पहुंचा, सरकार का रुख बदल गया। इंटरनेट और फोन सेवाएं लगभग बंद, सड़कों पर भारी सुरक्षाबल, रात में गोलीबारी, मस्जिदों और सरकारी इमारतों पर कार्रवाई हुई है। तेहरान की अल रसूल मस्जिद में आग लगने की घटना ने सरकार को और सख्त बना दिया। अब संदेश साफ है-कोई नरमी नहीं, सिर्फ ताकत दिखाएंगे।

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प ने खुली चेतावनी दी कि अगर ईरानी सुरक्षा बल प्रदर्शनकारियों को मारते हैं, तो ईरान को भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। यहां तक कहा गया कि अमेरिका हमला भी कर सकता है। इस बयान के कुछ ही समय बाद सुप्रीम लीडर अली खामेनेई राष्ट्र के नाम संबोधन लेकर आए। उनका लहजा चुनौती भरा था। इस्लामिक रिपब्लिक सैकड़ों हजारों लोगों के खून से बनी है। जो हमें नष्ट करना चाहते हैं, उनके सामने हम कभी नहीं झुकेंगे। खामेनेई का यह बयान सिर्फ अमेरिका के लिए नहीं, बल्कि अपने ही लोगों के लिए भी एक सख्त संदेश था-सत्ता आसानी से नहीं बदलेगी।

ईरान में विरोध सिर्फ विदेश नीति नहीं, रोज़मर्रा की जिंदगी से जुड़ा

दिलचस्प बात यह है कि सरकार के भीतर भी एक राय नहीं है। राष्ट्रपति मसूद पजशकियान सार्वजनिक तौर पर नरम भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं, लेकिन कई मंत्री और सुरक्षा एजेंसियां सख्त कार्रवाई के पक्ष में हैं। सरकार का आरोप है कि अमेरिका और इज़राइल इन प्रदर्शनों को हवा दे रहे हैं। यह तर्क नया नहीं है। ईरान में हर बड़े आंदोलन के पीछे विदेशी साज़िश का कार्ड खेला जाता रहा है। लेकिन सड़कों पर उतरे युवाओं का गुस्सा सिर्फ विदेश नीति से नहीं, रोज़मर्रा की ज़िंदगी से जुड़ा है।

इसी माहौल में एक पुराना नाम फिर से चर्चा में है-क्राउन प्रिंस रजा पहलवी। 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद शाह का परिवार सत्ता से बाहर हुआ और पहलवी अमेरिका में निर्वासन में चले गए। अब, करीब 50 साल बाद, उन्होंने देश लौटने की तैयारी का ऐलान किया है। उनका संदेश भावनात्मक है- मैं अपनी राष्ट्रीय क्रांति की जीत के समय ईरान की महान जनता के बीच खड़ा रहूंगा।

ईरान के कई प्रदर्शनकारी उन्हें एक धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक विकल्प के रूप में देख रहे हैं। युवाओं को लगता है कि पहलवी की वापसी से आर्थिक स्थिरता आएगी, दुनिया में ईरान की स्वीकार्यता बढ़ेगी और व्यक्तिगत आज़ादी मिलेगी हालांकि, यह भी सच है कि शाह के दौर की यादें सभी के लिए सुखद नहीं थीं। फिर भी मौजूदा हालात में कोई भी बदलाव बेहतर है, वाली सोच मज़बूत हो रही है।

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ईरान की अर्थव्यवस्था तेल निर्यात पर निर्भर, घाटा बढ़ा

ईरान के कुर्द बहुल क्षेत्रों में प्रदर्शन और तीखे हैं। वहां के लोग पहले से ही खुद को हाशिये पर महसूस करते हैं। अब जब आर्थिक संकट और सख्त सुरक्षा कार्रवाई जुड़ गई है, तो असंतोष और गहरा गया है। कई प्रदर्शनकारी खुले तौर पर कह रहे हैं-अब हमारे पास खोने को कुछ नहीं बचा और यह वाक्य किसी भी सरकार के लिए सबसे बड़ा खतरे का संकेत होता है।
ईरान की अर्थव्यवस्था काफी हद तक तेल निर्यात पर टिकी है।

2024 में कुल निर्यात 22.18 बिलियन डॉलर, आयात 34.65 और घाटा 12.47 बिलियन डॉलर रहा। 2025 में हालात और बिगड़े। तेल निर्यात में कमी और प्रतिबंधों के कारण घाटा 15 बिलियन डॉलर तक पहुंच गया। ईरान अपने 90 प्रतिशत तेल निर्यात चीन को करता है। तुर्की, यूएई और इराक बाकी बड़े साझेदार हैं। सरकार ने उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे यानी आईएनएसटीसी कॉरिडोर और यूरेशियन इकोनॉमिक यूनियन के साथ व्यापार बढ़ाने की कोशिश की, लेकिन 2025 में जीडीपी ग्रोथ सिर्फ 0.3% रहने का अनुमान है। मतलब साफ है-बिना प्रतिबंध हटे और परमाणु समझौते के बिना ईरान की अर्थव्यवस्था को स्थिर करना मुश्किल है।

217 मौतों का आंकड़ा सिर्फ संख्या नहीं है। यह उन परिवारों की कहानियां हैं, जिनके घर उजड़ गए। गोलियों से मारे गए ज़्यादातर युवा थे-छात्र, नौकरी तलाशने वाले आम नागरिक। सरकार की भाषा अब मानवीय नहीं, सैन्य हो चुकी है-गोली लगे तो शिकायत मत करना-यह वाक्य किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में अस्वीकार्य होता। लेकिन ईरान में लोकतंत्र की परिभाषा अलग है। यहां सत्ता धार्मिक और सैन्य ताकत के संतुलन पर टिकी है, न कि जनमत पर।

ईरान में तीन संभावित रास्ते : दमन, सुधार या राजनीतिक बदलाव

ईरान की मौजूदा स्थिति की तुलना अक्सर 1979 की इस्लामिक क्रांति से की जा रही है। तब भी महंगाई थी, बेरोज़गारी थी, सत्ता से नाराज़गी थी और शाह के खिलाफ आंदोलन था। आज भी हालात कुछ ऐसे ही हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार सत्ता पर काबिज़ लोग खुद क्रांति से निकले थे। अब सवाल यह है कि क्या वही क्रांति अपने ही ढांचे को तोड़ देगी?
ऐसे में भविष्य के तीन संभावित रास्ते दिखाई देते हैं जो इस प्रकार है –

कठोर दमन और अस्थायी शांति : सरकार पूरी ताकत से आंदोलन कुचल देती है। कुछ समय के लिए शांति लौटती है, लेकिन असंतोष भीतर ही भीतर सुलगता रहता है। संवाद और सीमित सुधार : सरकार कुछ आर्थिक राहत, टैक्स में कटौती और सामाजिक ढील देती है। हालात थोड़े संभलते हैं, लेकिन सत्ता संरचना जस की तस रहती है। बड़ा राजनीतिक बदलाव: अगर प्रदर्शन और तेज होते हैं और सत्ता के भीतर दरारें बढ़ती हैं, तो ईरान एक बड़े राजनीतिक मोड़ की ओर जा सकता है। फिलहाल पहला रास्ता सबसे ज्यादा संभव दिख रहा है, क्योंकि सत्ता की भाषा संवाद नहीं, शक्ति है।

-राजेश जैन
-राजेश जैन

ईरान की सड़कों पर आज सिर्फ नारे नहीं गूंज रहे, बल्कि एक सवाल भी गूंज रहा है-क्या हमारी ज़िंदगी की कीमत सत्ता से कम है। 217 मौतें, इंटरनेट बंद, गोलियों की धमकी और आर्थिक बदहाली: इन सबने जनता और सरकार के बीच की खाई और चौड़ी कर दी है। इतिहास गवाह है कि जब आम लोग डर से ऊपर उठ जाते हैं, तो सत्ता के सबसे मजबूत किले भी हिलने लगते हैं। ईरान आज उसी मोड़ पर खड़ा है। या तो वह अपने लोगों की आवाज़ सुनेगा या फिर आवाज़ को दबाकर एक और तूफान की नींव रखेगा। फिलहाल, ईरान की सड़कों पर बहता खून सिर्फ विरोध नहीं, बल्कि भविष्य की चेतावनी है।

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