ईरान द्वारा भारत के लिए होर्मुज स्ट्रेट खोलना, विरोधियों के मुँह पर तमाचा
ईरान द्वारा भारत के लिए होर्मुज स्ट्रेट को खुला रखना केवल एक सामरिक निर्णय नहीं है, बल्कि यह भारत की बढ़ती वैश्विक प्रतिष्ठा और प्रभावी कूटनीति का प्रतीक भी है। यह कदम उन सभी तत्वों के लिए स्पष्ट संदेश है, जो भारत के खिलाफ भ्रम और दुष्प्रचार की राजनीति करते हैं। ईरान का यह निर्णय वास्तव में उन भारत विरोधी कट्टरवादियों के मुंह पर करारा तमाचा है, जो भारत की वैश्विक प्रतिष्ठा को कम करके आंकने की भूल करते हैं।
अंतरराष्ट्रीय राजनीति में समुद्री मार्गों का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान होता है। फारस की खाड़ी और अरब सागर को जोड़ने वाला होर्मुज जो कि डमरू के आकार का एक समुद्री रास्ता है जिसे जल डमरू मार्ग भी कहते हैं। जलडमरूमध्य विश्व के सबसे संवेदनशील और रणनीतिक समुद्री मार्गों में गिना जाता है। विश्व के कुल कच्चे तेल के व्यापार का लगभग एक-तिहाई हिस्सा इसी मार्ग से होकर गुजरता है। ऐसे में किसी देश के लिए इस मार्ग को सुरक्षित और खुला रखना केवल आर्थिक ही नहीं, बल्कि गहरे कूटनीतिक विश्वास का भी संकेत होता है।
इजराइल – अमेरिका का ईरान के साथ युद्ध अनुमान से अधिक लंबा होता जा रहा है, जिस कारण तेल का निर्यात बाधित होना तय ही था किंतु इस वैश्विक संकट की घड़ी में भारत में सभी दलों को एक साथ मिलकर जहां जनता का विश्वास बहाल करके रखना चाहिए था इसके विपरीत तेल व गैस को लेकर ऐसा वातावरण तैयार किया गया कि लोगों की रसोई दो-चार दिन में बंद होने वाली है, गैस न मिलने के कारण भयानक संकट आने वाला है।
ऐसी स्थिति में जमाखोर भी रंग दिखाने लगे और गैस एजेंसियों ने भी सरकार को धता बताते हुये ऑनलाइन सिलेंडर बुक करने बंद कर दिये जिससे स्थिति और अधिक पैनिक होती गई। ऐसे में मोदी है तो मुमकिन है वाला विश्वास एक बार फिर आम जनता के लिए विश्वास का जहाज बनकर आया। आज भारत एक नहीं दस से भी अधिक देशों से गैस व कच्चा तेल खरीद रहा है और देश के गैस व तेल भंडार पहले की तरह लबालब है। विरोधियों को काटो तो खून नहीं, वे बगले झांकते नजर आ रहे हैं ।
युद्ध के बीच भी ईरान से भारत का मजबूत संवाद
राजनीति के चाणक्य मोदी यदि इजराइल के साथ सैर-सपाटा कर दुनिया को चौंका सकते हैं तो युद्ध के दौरान ईरान के साथ लगातार संवाद बनाये रखना व देश हित में अपनी बात मनवाना यह मोदी की कूटनीति की पराकाष्ठा है। हाल ही में ईरान द्वारा भारत के लिए होर्मुज स्ट्रेट को खुला रखने की घोषणा ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की स्थिति कितनी मजबूत और विश्वसनीय है।
यह कदम उन भारत विरोधी कट्टरपंथी तत्वों के लिए एक करारा जवाब है, जो समय-समय पर यह दुष्प्रचार करते रहे हैं कि भारत अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग पड़ रहा है या इस्लामी देशों से उसके संबंध बिगड़ रहे हैं। भारत और ईरान के संबंध कोई नए नहीं हैं। दोनों देशों के बीच हजारों वर्षों से सांस्कृतिक, धार्मिक और व्यापारिक संबंध रहे हैं। प्राचीनकाल में भारतीय व्यापारी और विद्वान फारस तक आते-जाते रहे और दोनों सभ्यताओं के बीच गहरा आदान-प्रदान हुआ। आज भी यह संबंध आधुनिक कूटनीति और आर्थिक सहयोग के रूप में विकसित हो रहे हैं।
चाबहार बंदरगाह परियोजना इसका एक महत्वपूर्ण उदाहरण है, जिसके माध्यम से भारत अफगानिस्तान और मध्य एशिया के देशों तक अपनी पहुंच को सुदृढ़ बना रहा है। ईरान का यह निर्णय भारत की ऊर्जा सुरक्षा के दृष्टिकोण से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। भारत दुनिया के सबसे बड़े ऊर्जा उपभोक्ताओं में से एक है और उसकी तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा खाड़ी क्षेत्र से आता है। ऐसे में होर्मुज जलडमरूमध्य का खुला रहना भारत की आर्थिक स्थिरता और विकास के लिए आवश्यक है।
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भारत की संतुलित और बहुपक्षीय विदेश नीति
यह घटना यह भी दर्शाती है कि भारत की विदेश नीति संतुलित, व्यावहारिक और बहुपक्षीय है। भारत ने एक ओर अमेरिका और यूरोपीय देशों के साथ रणनीतिक संबंध बनाए हैं, तो दूसरी ओर रूस, ईरान और मध्य एशिया के देशों के साथ भी मजबूत साझेदारी कायम रखी है। यही संतुलन भारत की कूटनीति की सबसे बड़ी शक्ति है। भारत विरोधी कट्टरपंथी अक्सर यह प्रचार करने का प्रयास करते हैं कि भारत की नीतियाँ मुस्लिम देशों के विरुद्ध हैं, किंतु वास्तविकता इसके विपरीत है।
आज संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, कतर, ओमान और ईरान जैसे अनेक इस्लामी देशों के साथ भारत के संबंध पहले से कहीं अधिक मजबूत हुए हैं। इन देशों द्वारा भारत के साथ बढ़ता सहयोग यह स्पष्ट करता है कि वे भारत को एक विश्वसनीय और सम्मानित साझेदार के रूप में देखते हैं। ईरान द्वारा भारत के लिए होर्मुज स्ट्रेट को खुला रखना केवल एक सामरिक निर्णय नहीं है, बल्कि यह भारत की बढ़ती वैश्विक प्रतिष्ठा और प्रभावी कूटनीति का प्रतीक भी है। यह कदम उन सभी तत्वों के लिए स्पष्ट संदेश है, जो भारत के खिलाफ भ्रम और दुष्प्रचार की राजनीति करते हैं।
यह भारत ही था जो रूस व यूक्रेन युद्ध में एक और यूक्रेन के राष्ट्रपति से भी सहयोग की बात कर रहा था तो दूसरी ओर रूस को भी युद्ध के स्थान पर संवाद के माध्यम से रास्ता निकालने का सुझाव दे रहा था। आज भी रूस सर्वाधिक भरोसा यदि किसी पर करता है तो वह भारत ही है । वेनिजुएला के राष्ट्रपति को अमेरिका द्वारा रात में अपहरण कर लेने पर भारत ने ही इसकी स्पष्ट निंदा की थी। आज भी ईरान युद्ध पर शांति का मार्ग संवाद के माध्यम से ढूंढने के लिए भारत ही सुझाव दे रहा है।
वैश्विक मंच पर भारत की बढ़ती भूमिका और नेतृत्व
वह दिन दूर नहीं है जब भारत ही विश्व का प्रतिनिधित्व करेगा। भारत ने न ही कभी ट्रंप की तरह थानेदार बनने की कोशिश की है और ना ही कभी भारत की सुरक्षा के साथ समझौता किया है। चाहे पहलगाम में पाकिस्तान की भूमिका हो या गलवान में चीन की। दोनों ही स्थिति में दुश्मन को मुंह तोड़ जवाब दिया है। निसंदेह भारत के ही कुछ छुटभैये नेता विदेशों में जाकर भारत के आत्म विश्वास, अध्यात्म व विकास को जान-बूझकर अनदेखा कर भारत को अपमानित करने का षड्यंत्र करते रहते हैं किंतु विश्व जानता है भारत में एक मजबूत, राष्ट्रवादी सरकार व उसका सर्वगुणसंपन्न मुखिया सिंहासन पर विराजमान है जो भारत की ओर उठाई जाने वाली किसी भी आंख को बंद करने का साहस रखता है।

भारत की इसी मजबूती के साथ ही उसकी अकाट्य कूटनीति के चलते ही युद्ध संकट काल में भी ईरान ने निसंदेह सबके लिए अपने होर्मुज स्ट्रेट को बंद रखा किंतु भारत के लिए होर्मुज स्ट्रेट खोलना भारत की कूटनीतिक जीत है। अतः कहा जा सकता है कि यह घटना भारत की कूटनीतिक सफलता का प्रमाण है। यह दिखाती है कि अंतरराष्ट्रीय संबंध न तो कट्टरता से चलते हैं और न ही दुष्प्रचार से, बल्कि वे विश्वास, सहयोग और परस्पर सम्मान पर आधारित होते हैं। ईरान का यह निर्णय वास्तव में उन भारत विरोधी कट्टरवादियों के मुंह पर करारा तमाचा है, जो भारत की वैश्विक प्रतिष्ठा को कम करके आंकने की भूल करते हैं।
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