संयमित और नियमबद्ध होता है साधु गुरु भगवंतों का विहार
जैन धर्म की परंपरा में चातुर्मास का विशेष आध्यात्मिक महत्व है। वर्षा ऋतु के चार महीनों में साधु-साध्वियाँ एक ही स्थान पर विराजमान रहते हैं। इसका प्रमुख कारण अहिंसा का पालन है, क्योंकि वर्षा काल में सूक्ष्म जीवों की संख्या अधिक होती है और विहार करने से उनके हिंसा की संभावना बढ़ जाती है।
चातुर्मास के दौरान धर्मसभा, प्रवचन, स्वाध्याय, तप, ध्यान, प्रपामण और विविध आराधनाओं के माध्यम से श्रावक-श्राविकाओं को धर्मलाभ प्राप्त होता है तथा आत्मशुद्धि का उत्तम अवसर मिलता है। कार्तिक मास में चातुर्मास की विधिवत समाप्ति हो जाती है, तब साधु गुरुभगवंत पुन विहार के लिए उद्यत होते हैं। यह समय अत्यंत भावपूर्ण होता है। श्रावक-श्राविकाएँ गुरुदेव के चरणों में कृतज्ञता प्रकट करते हैं।
उनकी विदाई के समय नेत्र सजल हो जाते हैं, परंतु मन में आनंद भी होता है, क्योंकि गुरुभगवंत अब अन्य स्थानों पर जाकर अनेक जीवों को धर्म का मार्ग दिखाएँगे। विहार जैन साधु जीवन का अनिवार्य अंग है, जिसके माध्यम से वे जन-जन तक अहिंसा, संयम, तप और आत्म-कल्याण का संदेश पहुँचाते हैं।
विहार: साधना से समाज तक धर्म की यात्रा
साधु गुरुभगवंतों का विहार अत्यंत संयमित और नियमबद्ध होता है। वे प्रातकाल गवेषणा कर, सीमित दूरी तक पैदल चलते हुए हुए, नगर-नगर, ग्राम-ग्राम धर्म-प्रचार करते हैं। उनके विहार से वातावरण पवित्र हो जाता है। जहाँ-जहाँ वे पधारते हैं, वहाँ धर्म जागरण होता है, लोगों में सदाचार, करुणा और आत्म-संयम की भावना प्रबल होती है। साधु भगवंत अपने आचरण से ही उपदेश देते हैं- अपरिग्रह, क्षमा, सरलता और तपस्या का सजीव उदाहरण बनकर।
चातुर्मास के बाद का विहार श्रावक समाज के लिए भी प्रेरणादायक होता है। यह स्मरण कराता है कि जीवन स्थिर नहीं, बल्कि निरंतर साधना और प्रगति की यात्रा है। जैसे साधु गुरुभगवंत एक स्थान पर रुककर पुन आगे बढ़ते हैं, वैसे ही गृहस्थों को भी आत्मिक विकास के पथ पर निरंतर आगे बढ़ते रहना चाहिए। गुरुदेव का विहार हमें त्याग, सहनशीलता और लोककल्याण की भावना सिखाता है।
अंतत कहा जा सकता है कि चातुर्मास की समाप्ति और साधु गुरुभगवंतों का विहार जैन धर्म की जीवंत परंपरा का प्रतीक है। यह केवल स्थान परिवर्तन नहीं, बल्कि धर्म की यात्रा है, जहाँ कदम-कदम पर अहिंसा का संदेश, हर वचन में करुणा और हर दृष्टि में आत्म-कल्याण की प्रेरणा निहित होती है। ऐसे पुण्य अवसर पर साधु गुरुभगवंतों के चरणों में कोटी-कोटी वंदन करते हुए, उनके मंगल विहार की भावना करना ही प्रत्येक श्रावक का परम कर्तव्य है।
जिनेन्द्र कुमार बाफना
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