फ़ालतू बात ही बात है बाकी बात बेकार …
बहुत समय पहले की बात है जब यहां सिर्फ़ काम की बात की जाती थी। फिर पश्चिम दिशा से एक लुटेरा आया। उसकी विशाल सेना थी लेकिन उसके पास तलवार, भाला, बंदूक और तोप जैसे हथियार नहीं थे। वह अपने साथ फ़ालतू बातें लेकर आया था। उसने सबको फ़ालतू बातों में लगा दिया। लोग फ़ालतू बातें करते रहे और वह उन्हें लूटता रहा।
लुटेरे तो चले गये पर फ़ालतू बात यहीं छोड़ गये। फालतू बातें रह गई लुटेरे बदलते रहे। पहले काम की बात और फ़ालतू बात दोनों हुआ करती थी। पर अब धीरे-धीरे फ़ालतू बातों ने काम की बातों को चलन से बाहर कर दिया और फ़ालतू बात ही काम की बात मानी जाने लगी। फिर ऐसा भी समय आया कि कोई काम की बात करता तो उसे कहा जाता – फ़ालतू बात मत कर। अब अनपढ़ और पढ़े-लिखे आदमी में अंतर इस प्रकार दिखाई देता है कि अनपढ़ आदमी काम की बात करता है तो वह फ़ालतू बात लगती है और पढ़ा-लिखा आदमी फ़ालतू बात करता है तो वह काम की बात लगती है।
इससे अधिक दुख की बात यह है कि वही आदमी, वही बात, वही आदमी को हिंदी में बोले तो वही बात फ़ालतू बात लगती है लेकिन वही आदमी, वही बात, वही आदमी को अंग्रेज़ी में बोले तो वही बात वही आदमी को काम की बात लगती है। महत्व इस बात का नहीं है कि क्या बोला जा रहा है, महत्व तो इस बात का है कि किस तरह बोला जा रहा है। अच्छा आदमी अच्छी बात इतने अच्छे से नहीं बोलता जितने अच्छे से फ़ालतू आदमी फ़ालतू बात बोलता है। सजावटी समाज में प्रस्तुतिकरण मायने रखता है। विषय और विचार के साथ रखी गई बात कोई नहीं सुनता, सब सिर्फ बोलना ही सुनते हैं।
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हर गांव-नगर में फैलती फ़ालतू बातों की संस्कृति
लोग घर में कुत्ता, बिल्ली, तोता क्यों पालते हैं? दरअसल, आदमी के पास बोलना असीमित है। बहुत बोलने के बाद भी, बहुत सारा बोलना तो बचा ही रह जाता है तब वह अपने पालतू से फ़ालतू बातें करता रहता है। बम से ज़्यादा विनाश फ़ालतू बातों से ही तो होता है। बम से एक नगर और उसके नागरिक बर्बाद होते हैं लेकिन फ़ालतू बातों से पूरी नस्ल बर्बाद हो रही है और आजकल तो फ़ालतू बात हर नगर, हर गांव में चल रही है।
बोलने की दुनियां में भयंकर तेज़ी आई है। बातों का दरिया उफ़ान पर है। बोलने के जितने भी माध्यम है सिनेमा, धारावाहिक, भाषण, व्याख्यान, माईक, फ़ोन सब पर ज्यादातर फ़ालतू बातें ही तो हो रही है। फ़ालतू बातें बोली ही नहीं जा रही हैं, लिखी भी जा रही है, सुनी ही नहीं जा रही हैं पढ़ी भी जा रही है। आजकल तो अधिकतर बेस्ट सेलर मानी जाने वाली किताब फ़ालतू बातों का संग्रह ही हुआ करती है। फ़ालतू बातों ने आदमी को शरीर तक सीमित कर दिया है, अब वह बुद्धि तक तो पहुंचता ही नहीं है।

बहुत दिनों बाद भी कोई मिलता है तो फ़ालतू बात शुरू कर देता है। लंबे अरसे बाद किसी मित्र को फ़ोन करो तो हेलो बोलते ही बोलता है – यार तेरी लंबी उम्र है कल ही तेरी बात हो रही थी। मैं तेरे को फ़ोन करने की सोच ही रहा था और तेरा फ़ोन आ गया यानि दोनों तरफ है आग बराबर लगी हुई है। आखिर चारों तरफ फ़ालतू बातें क्यों हो रही हैं? इसके जवाब में बताया गया कि यह प्रकृति का नियम है कि जो दोगे वही तो लौट कर आता है। हमने फ़ालतू बातें दी तो अब फ़ालतू बातें ही हमारे पास लौट कर आ रही है।
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