श्रीकृष्ण से सीखें व्यवहार कुशलताल
श्री कृष्ण का अवतरण ब्रह्मांडीय चेतना का जनकल्याण के लिए धरती पर हुआ। समाज निराकार शुद्ध चेतना में जब कष्टदायक भावनाएं भेजता है या गुहार लगाता है तब परमात्मा अपना एक अंश, एक रूप या आकार धारण करके हमारे स्तर पर हमारी रक्षा करने के लिए प्रकट होते हैं और केवल बाहरी राक्षसों से हमारी रक्षा नहीं करते हैं, बल्कि हमारे भीतर के असुर अर्थात अहंकार, क्रोध , ईर्ष्या एवं द्वेष आदि का भी यह नाश करते हैं।
इसीलिए न केवल भगवान राम और कृष्णा अवतार हैं, बल्कि भगवान महावीर, बुद्ध, नानक आदि भी अवतार की श्रेणी में आते हैं। हालांकि इन्होंने कभी कोई अस्त्र नहीं उठाया। गुरु भी एक अवतार है, वह भी हमारे अज्ञान के असुर से मुक्ति दिलाता है। हम जिस किसी से भी किसी प्रकार का जुड़ाव या अपनापन महसूस करते हैं, उसी का जन्मदिन मनाते हैं। जाने-अनजाने में हम जरूर चेतना से जुड़े रहते हैं, इसीलिए हम अवतारों, गुरुओं, सगे-संबंधियों और मित्रों का जन्मदिन मनाते हैं।
जब परम तत्व प्रकट होता है तब प्रकृति भी अपने पांचों तत्वों के साथ झूम उठती है और उत्सव मनाती है। श्रीकृष्ण जन्म के समय धरती सुगंधित हो उठी, आकाश में बिजली चमकने लगी, भयंकर हवा चलने लगी और जल बरसाकर अपना उत्साह प्रकट करने लगी। पूरा वातावरण इतना मदमस्त हो गया कि कारागार के बाहर खड़े सिपाहियों को निद्रा नहीं आई बल्कि सभी समाधिस्थ हो गए। यह गूढ़ रहस्य है।
श्रीकृष्ण की व्यवहार कुशलता का संदेश
इसे हम भी अपने जीवन में अनुभव करते हैं जब भी हम किसी सद्गुरु या संत के सामने जाते हैं तो उनकी दिव्यता के वशीभूत होकर हमारा दिमाग काम करना बंद कर देता है। हम मंत्रमुग्ध हो आनंद की अनुभूति में डूबे जाते हैं। भगवान श्रीकृष्ण बहुत व्यवहार कुशल थे। भगवान होते हुए भी वे मां के साथ एक पुत्र जैसी अठखेलियां करते थे, ग्वाल बालों के मित्र बन गये, गोपियों के साथ सच्चे प्रेमी, रुक्मणी के साथ परमपति, भक्तों के लिए भगवान, प्रजा के लिए द्वारकाधीश, दुश्मन के लिए दुश्मन और सखा के लिए सखा बन गए।
उनकी व्यवहार कुशलता से हमें यह सीख मिलती है कि हमें अपने धन-दौलत, पद-सम्मान, अनुभव, ज्ञान, भक्ति-शक्ति, किसी का भी अभिमान करे बिना सहज व्यवहार करना चाहिए। कृष्णा अवतार से यह भी स्पष्ट हो जाता है कि स्त्रा रूप में गोपियों को केवल प्रेम-भावना की प्रधानता के कारण मोक्ष प्राप्त हुआ। गोपियों ने जीवन में कभी कोई साधना नहीं की, लेकिन उनके हृदय में प्रेम भाव की प्रधानता थी।
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इससे सिद्ध होता है कि कोरे ज्ञान से नहीं बल्कि पूर्ण भक्ति-भाव से मनुष्य तर सकता है। भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं गीता में कहा कि मुझे पाने के लिए केवल भावना की ही आवश्यकता है। कंस भय, पूतना दुश्मनी, गोपियां प्रेम, यशोदा मातृत्व, अर्जुन-सुदामा सखा, पांडव दास भाव से परम चेतना रूपी कृष्णा लीन हुए।
हम जिसके साथ व्यवहार करते हैं, उसके स्तर पर उतरकर अपनी अकड़ और पकड़ छोड़कर व्यवहार करना चाहिए, यही व्यवहार कुशलता है। सभी में ब्रह्म का भाव रखने से हम सभी पर भगवान कृष्णा की चेतना की कृपा बनी रहेगी।

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