जीवन को दिमाग से नहीं दिल से जिएँ : सद्गुरु रमेशजी
हैदराबाद, दिल से दिमाग की यात्रा दुख से सुख तथा बंधन से मोक्ष की है। जीवन दिमाग से चलता है, लेकिन दिल से खिलता है। जब तक हम दिल से खिलना नहीं सीखेंगे, तब तक सच्चिदानंद का आनंद प्राप्त नहीं हो पाएगा। उक्त उद्गार बंजारा हिल्स स्थित अवर पैलेस में आयोजित सत्संग में रमेशजी ने व्यक्त किए। रमेशजी ने कहा कि जीवन के चलने और खिलने में बहुत अंतर है। यह अंतर समझकर जीवन को प्रसन्नचित बनाया जा सकता है। इसका कारण है कि जीवन का असली अर्थ ही खिलना है। हम केवल जीवन चलाने के लिए नहीं पैदा नहीं हुए।
अगर हम केवल जीवन चलाने की ओर प्रवृत रहेंगे, तो निश्चित रूप से अगला जीवन चौरासी लाख योनियों में कोई न कोई यानि मिलेगी। दिल केवल और केवल मनुष्य को मिला है। जीवन को दिशा और दशा देने का कार्य दिल कर सकता है, दिमाग नहीं। इसलिए दिल और दिमाग के प्रयोग को लेकर सजग रहना चाहिए। दिमाग हमको ज्ञान समझाता है, लेकिन दिन ज्ञान को जगाता है और जीवन का सारा का सारा खेल जागने या जागृत होने पर ही टिका है।
रमेशजी ने कहा कि दिमाग निर्णय करता है और दिल समर्पण। दिल से ही सबके प्रति निस्वार्थ प्रेम, क्षमा, करुणा जैसे भाव प्रवाहित होते हैं। दिमाग पर सदैव मैं हावी रहता है, जिसके कारण व्यक्ति इसके जाल में फँसकर कल्याण के मार्ग से भटक जाता है। जीवन में किसी भी प्रकार के कल्याण के लिए दिल ही एकमात्र साधन है। कई लोग दिल को दिमाग के अनुसार चलाने की कोशिश करते हैं, लेकिन यह समझना आवश्यक है कि यह दोनों अलग हैं।
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दिल की अनसुनी से जीवन में बढ़ते संघर्ष
भीष्म पितामाह का उदाहरण देते हुए रमेशजी ने कहा कि द्रौपदी चीरहरण के समय उनके दिल ने इसे रोकने का संदेश दिया था, लेकिन उन्होंने दिल की नहीं सुनी। अगर दिल की सुन लेते, तो शायद महाभारत नहीं होती। इसी प्रकार हमारे जीवन में जो युद्ध होता है, उसका कारण दिल के भावों को दरकिनार करते हुए दिमाग का सुनना होता है। जीवन को खिलकर जीने के लिए दिल की सुनते हुए इसके उद्देश्य को साकार करना चाहिए। दिल को सीईओ तथा दिमाग को जीएम की भूमिका में होना चाहिए।
गुरु माँ ने कहा कि दिल और दिमाग बहुत पास हैं, लेकिन इनकी दूरी को तय करने में जन्म-जन्मांतर लग जाते हैं। हर समय हम दिमाग से ही काम करते हैं और दिल तक नहीं पहुँचते। इसके चलते हमारे कर्म कटते नहीं हैं और नए कर्म बनते जाते हैं। दिमाग में अहंकार होता है, जो झुकने नहीं देता है, जबकि दिल या हृदय में करुणा होती है। दिमाग सदैव स्वयं को सही साबित करने में जुटा रहता है। वहीं दिल इस प्रकार भावों से परे रहता है। आत्मकल्याण के लिए दिमाग को अपने ऊपर हावी नहीं होने देना चाहिए। दिल की सुनने का प्रयास करना चाहिए, यह हमें गुमराह नहीं होने देता है।
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