ऑनलाइन गेम्स की भेंट चढ़ती जिंदगियां!

पिछले एक वर्ष के दौरान अनेक देशों ने इस संदर्भ में बहस को एक किनारे करते हुए ठोस निर्णय लिए हैं। सबसे पहले पिछले साल दिसम्बर में ऑस्ट्रेलिया ने प्रतिबंध लगाया कि 16 बरस से कम के बच्चे सोशल मीडिया का इस्तेमाल नहीं कर सकते और लाखों नाबालिग़ बच्चों के एकाउंट्स टिकटाक, इंस्टाग्राम, फेसबुक, स्नैपचैट, यू-टयूब व अन्य प्लेटफॉर्म्स से हटा दिये गये। अब फ्रांस की नेशनल असेंबली ने 15 साल से कम के बच्चों के लिए सोशल मीडिया प्रतिबंधित किया है और यह विधेयक अब सीनेट में है। अन्य यूरोपीय देश जैसे डेनमार्क, स्पेन, जर्मनी आदि भी इसी दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं। मलेशिया ने घोषणा की है, वह 2027 में 16 साल से कम के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगा देगा, जबकि मिस्र इसे डिजिटल अव्यवस्था कहते हुए इस पर प्रतिबंध लगाने की योजना बना रहा है। यह सांस्कृतिक सेंसरशिप नहीं है। यह वक्त की ज़रूरत है। इसलिए भारत को भी चाहिए कि 16 साल से कम के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर तुरंत प्रभाव से प्रतिबंध लगा दे और इसका समर्थन करने के लिए आयु-पुष्टि का ठोस तरीका लागू करे।

गाज़ियाबाद ज़िले के व्यस्त सैटेलाइट टाउन साहिबाबाद की भारत सिटी की नवीं मंज़िल के अपने अपार्टमेंट में फोरेक्स ट्रेडर चेतन कुमार अपनी दो पत्नियों (दोनों बहनें) व पांच बच्चों के साथ रहते थे, जिनमें चार लड़कियां व एक लड़का था। बुधवार (4 फरवरी 2026) की रात को चेतन कुमार, दोनों पत्नियां और एक छोटा लड़का व एक छोटी लड़की एक कमरे में सो रहे थे, जबकि शेष तीन लड़कियां दूसरे कमरे में थीं।

तीनों बहनें, जिनमें से छोटी मात्र 12 साल की थी, को ऑनलाइन कोरियाई लव गेम खेलने की लत थी, जिसमें टास्क करने की एक श्रृंखला को मुकम्मल करना होता है। सुबह लगभग 2:15 बजे तीनों बहनों ने एक साथ अपने अपार्टमेंट की बालकनी से नीचे छलांग लगा दी। चेतन कुमार के एक पड़ोसी ने उन्हें नीचे गिरते हुए देखा। उन्हें एम्बुलेंस से पास में ही लोनी के एक अस्पताल में ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उन्हें आगमन पर मृत लाया गया घोषित किया। इस हादसे ने देश के पूरे मध्यवर्ग को झकझोर कर रख दिया है और ऑनलाइन लत के कुप्रभावों को एक बार फिर बहस के केंद्र में ला दिया है कि युवा दिमागों पर उसका बहुत बुरा असर पड़ रहा है।

तीनों बहनों ने अपने पीछे डरावना नोट और डायरी छोड़ी

निशिका-16, प्राची-14, व पाखी-12, ने अपने पीछे एक रौंगटे खड़ा करने वाला नोट छोड़ा है, पढ़ो हर बात जो इस डायरी में लिखी है, सब कुछ इसमें है। इस नोट पर रोता हुआ एक ईमोजी है और हस्तलिखित संदेश भी, सॉरी पापा, आई एम रियली सॉरी। डायरी लड़कियों के सामान से मिली है। तीनों बहनें स्कूल नहीं जाती थीं और पिछले दो साल से घर पर ही थीं। लड़कियों की शिक्षा अनियमित थी और उनका अकादमिक प्रदर्शन भी औसत से नीचे था। उनके पैरेंट्स ने पिछले कुछ दिनों से उनके द्वारा मोबाइल फ़ोन के इस्तेमाल को सीमित कर दिया था, जिससे वह परेशान व बेचैन थीं।

शायद इसी वजह से उन्होंने यह भयावह कदम उठाया। इन बहनों को कोविड-19 महामारी के दौरान ऑनलाइन गेमिंग की लत पड़ गई थी, जिसे वह लगभग बिना ब्रेक के खेलती थीं। उन्हें विशेषरूप से कोरियाई लव गेम की लत थी। कोरियाई लव गेम जैसे मोबाइल गेम्स में बच्चे अजनबियों से बातें करते हैं। दोस्ती और प्यार की बातों से शुरू होने वाला गेम गेम मास्टर के खौफनाक खेल में बदल जाता है। बच्चों को अलग-अलग टास्क दिये जाते है। एक रिपोर्ट के मुताबिक आखिर में 50वें दिन होता है ख़ुदकुशी का चैलेंज। इस दौरान बच्चों को धमकाया भी जाता है।

यह भी पढ़ें… राष्ट्रीय सुरक्षा और राहुल गांधी की राजनीतिक अपरिपक्वता

गूगल या ऐप स्टोर पर ऐसे समर्पित गेम्स नहीं मिलते

कोरियाई लव गेम कहां खेला जाता है? इसका कोई सटीक जवाब नहीं है। पुलिस का कहना है कि इस तरह के गेम या तो सोशल मीडिया या फिर कुछ खास मोबाइल एप्स में खेले जाते हैं। गूगल प्ले स्टोर या एप्पल एप स्टोर पर ऐसा कोई समर्पित गेम इस लेखक को सर्च करने पर नहीं मिला। अनुमान यह है कि ऐसे खेलों का संबंध डार्क वेब से है। इन गेम्स में गेम मास्टर वही अजनबी होता है जो खुद को कोरियाई या विदेशी नागरिक बताता है और बच्चों के साथ संपर्क में रहता है।

पहले वह बच्चों से नरमी से पेश आता है और उनका भरोसा जीतने के बाद फिर उन पर सख्ती दिखाने लगता है, जब बच्चे गेम के आदी हो जाते हैं, तो वह उन पर हुक्म चलाने लगता और चैलेंज निरंतर कठिन करता रहता है। पचासवें दिन ख़ुदकुशी का चैलेंज होता है।

गौरतलब है कि कुछ वर्ष पहले ब्लू व्हेल चैलेंज गेम वायरल हुआ था, जब इसकी वजह से दुनियाभर से आत्महत्याओं की खबरे आने लगीं, तो इस पर अनेक देशों में प्रतिबंध लगा दिया गया। लेकिन एक बार फिर खतरनाक ऑनलाइन टास्क गेम्स वापस आ रहे हैं, जिससे पैरेंट्स के दिल दहल रहे हैं? कोरियाई लव गेम, ब्लू व्हेल, ब्लैकआउट चैलेंज और साल्ट एंड आइस चैलेंज ऑनलाइन प्रकट हो रहे हैं, इसलिए नहीं कि वह ट्रेंड में हैं बल्कि उनका संबंध वास्तव में चिंताजनक नतीजों से जोड़ा जा रहा है, जैसा कि तीन बहनों की ख़ुदकुशी से। अत यह असहज प्रश्न फिर से प्रासंगिक हो गया है कि बच्चों के लिए इंटरनेट वास्तव में कितना सुरक्षित है?

समाधान केवल गेम्स पर प्रतिबंध नहीं, इंटरनेट तक नियंत्रण जरूरी

दरअसल, इस चिंताजनक समस्या का समाधान यह नहीं है कि कुछ खतरनाक ऑनलाइन गेम्स पर प्रतिबंध लगा दिया जाये बल्कि यह है कि बच्चों व किशोरों की इंटरनेट तक पहुंच पर विराम लगा दिया जाये। दुनिया बच्चों के लिए सोशल मीडिया की सीमा निर्धारित कर रही है। अब समय आ गया है कि भारत भी ऐसा ही करे। हम एक उम्र का होने पर ही किसी को ड्राइविंग लाइसेंस हासिल करने की अनुमति देते हैं और इस प्रकार की समय सीमा अन्य चीज़ों पर भी है, जैसे शराब पीना या विवाह करना।

यह आयु सीमाएं किसी मनमानी परम्परा की वजह से नहीं हैं बल्कि विज्ञान आधारित, विशेषकर मानव दिमाग की संरचना से संबंधित हैं। प्री-फ्रंटल कोर्टेक्स दिमाग का वह हिस्सा है जो निर्णय, योजना, आवेग नियंत्रण व दीर्घकालीन नतीजों की समीक्षा के लिए ज़िम्मेदार है। यह हिस्सा बचपन या किशोरावस्था में पूर्णत विकसित नहीं हो पाता है। न्यूरो वैज्ञानिक शोध से मालूम होता है कि प्री-फ्रंटल कोर्टेक्स 25 साल की आयु तक पूर्णत विकसित नहीं हो पाता है और उसकी नोक-पलक का दुरुस्त होना 30 वर्ष की आयु तक जारी रहता है। विकास की इस समय-सारणी से स्पष्ट हो जाता है कि किशोर आवेग व्यवहार, भावनात्मक अस्थिरता और साथियों के प्रभाव का अधिक शिकार क्यों होते हैं?

इसके बावजूद आज 8-10 साल के बच्चों के हाथ में मोबाइल फ़ोन है और वह बिना रोक-टोक सोशल मीडिया को एक्सेस कर रहे हैं। यह डिजिटल लैंडस्केप इस तरह से डिज़ाइन किये गये हैं कि ध्यान आकर्षित करें, भावनात्मक कमज़ोरियों का शोषण करें, अस्पष्ट एल्गोरिद्म के माध्यम से। अब दुनियाभर की समझ में आ रहा है कि बच्चों के लिए अप्रतिबंधित सोशल मीडिया एक्सेस गंभीर स्वास्थ्य समस्या है, जिसके गहरे मानसिक व सामाजिक परिणाम हैं।

फ्रांस, डेनमार्क, स्पेन और जर्मनी भी इसी दिशा में कदम

इसलिए पिछले एक वर्ष के दौरान अनेक देशों ने इस संदर्भ में बहस को एक किनारे करते हुए ठोस निर्णय लिए हैं। सबसे पहले पिछले साल दिसम्बर में ऑस्ट्रेलिया ने प्रतिबंध लगाया कि 16 बरस से कम के बच्चे सोशल मीडिया का इस्तेमाल नहीं कर सकते और लाखों नाबालिग़ बच्चों के एकाउंट्स टिकटाक, इंस्टाग्राम, फेसबुक, स्नैपचैट, यू-टयूब व अन्य प्लेटफॉर्म्स से हटा दिये गये। अब फ्रांस की नेशनल असेंबली ने 15 साल से कम के बच्चों के लिए सोशल मीडिया प्रतिबंधित किया है और यह विधेयक अब सीनेट में है। अन्य यूरोपीय देश जैसे डेनमार्क, स्पेन, जर्मनी आदि भी इसी दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं।

नरेंद्र शर्मा
नरेंद्र शर्मा

मलेशिया ने घोषणा की है, वह 2027 में 16 साल से कम के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगा देगा, जबकि मिस्र इसे डिजिटल अव्यवस्था कहते हुए इस पर प्रतिबंध लगाने की योजना बना रहा है। यह सांस्कृतिक सेंसरशिप नहीं है। यह वक्त की ज़रूरत है। इसलिए भारत को भी चाहिए कि 16 साल से कम के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर तुरंत प्रभाव से प्रतिबंध लगा दे और इसका समर्थन करने के लिए आयु-पुष्टि का ठोस तरीका लागू करे। भारत नाज़ुक दो-राहे पर खड़ा है; क्योंकि 700 मिलियन से अधिक इंटरनेट यूजर 25 साल से कम के है। अगर गाज़ियाबाद जैसी दुखद घटना को पुन होने से रोकना है, तो वैश्विक ट्रेंड के संग चलना ही होगा।

अब आपके लिए डेली हिंदी मिलाप द्वारा हर दिन ताज़ा समाचार और सूचनाओं की जानकारी के लिए हमारे सोशल मीडिया हैंडल की सेवाएं प्रस्तुत हैं। हमें फॉलो करने के लिए लिए Facebook , Instagram और Twitter पर क्लिक करें।

Related Articles

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

Back to top button