भगवान महावीर का कहना था किसी भी तरह के जीवों की हिंसा यानी एक इंद्रिय, दो इंद्रिय, तीन इंद्रिय , चार इंद्रिय, पांच इंद्रिय वाले किसी भी जीव की हिंसा हमें नहीं करनी चाहिए। हमें अपने मन में सबके प्रति दया भाव रखना चाहिए। मारना तो दूर की बात है किसी के प्रति मन में हिंसा का विचार भी नहीं लाना चाहिए। आज जब विश्व बारूद के ढेर पर खड़ा है ऐसे में भगवान महावीर के सिद्धांत अहिंसा, अपरिग्रह और अनेकांत को अपनाकर आपसी वार्ता से ही विश्व में शांति लाई जा सकती है और मानवता को बचाया जा सकता है।
आज समस्त विश्व में युद्धोन्माद दिखाई दे रहा है। पूरी दुनिया युद्ध की चपेट में है और सभी लोग इससे प्रभावित हो रहे हैं। हर कहीं रक्तपात हो रहा है ऐसे में शांति की आवश्यकता है पर कोई इस बात पर ध्यान ही नहीं दे रहा। रूस-पोन युद्ध के बाद अब इजराइल-अमेरिका और ईरान का युद्ध संसार को परमाणु और विश्व युद्ध की ओर ले जा रहा है। ऐसे में भगवान महावीर और उनके उपदेशों अहिंसा एवं स्वयं जियो और जीने दो सबको की प्रासंगिकता और बढ़ जाती है। भगवान महावीर जैन धर्म के 24 वें और अंतिम तीर्थंकर थे। कुछ लोग अज्ञानवश जैन धर्म का प्रारंभ भगवान महावीर से मानते हैं, जैन धर्म का प्रारंभ प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ से हुआ था। जिन्हें ऋषभदेव के नाम से भी जाना जाता है।
तत्कालीन समाज को दिलाई अंधविश्वास और कर्मकांड से मुक्ति
भगवान महावीर का जन्म ईसा से 599 वर्ष पूर्व चैत्र शुक्ल त्रयोदशी के दिन बिहार प्रांत कुंडलपुर में हुआ था । आपके पिता महाराजा सिद्धार्थ और माता महारानी त्रिशला देवी थी। इनका बाल अवस्था का नाम वर्धमान था । इन्हें वीर, अतिवीर, सन्मतिवीर और महावीर के नाम से भी जाना जाता है। तीस वर्ष की आयु में आपने राजपाट को छोड़ दिया। जंगल में जाकर 12 वर्ष तक घनघोर तपस्या की और फिर आपने कैवल्य ज्ञान प्राप्त किया। ज्ञान प्राप्त होने पर 42 की आयु से 30 वर्ष तक संसार में रहकर लोगों को सत्य, अहिंसा, अपरिग्रह, अनेकांत, अचौर्य, ब्रह्मचर्य का पाठ पढ़ाया और तत्कालीन समाज को अंधविश्वास और कर्मकांड से मुक्ति दिलाई।
भगवान महावीर ने त्याग, संयम, प्रेम ,करुणा, शील और सदाचार के उपदेश जनता को दिए। आपके उपदेश प्राणी मात्र के लिए थे, ना कि किसी जाति, धर्म या व्यक्ति विशेष के लिए। भगवान महावीर ने अहिंसा के साथ जियो और जीने दो का भी सिद्धांत दिया। अहिंसा की बहुत सूक्ष्म व्याख्या की। अहिंसा का अर्थ है हिंसा का परित्याग करना। हिंसा दो प्रकार की होती है द्रव्य हिंसा और भाव हिंसा।
हिंसा करने के मन, वचन और काय (शरीर) तीन साधन होते हैं। किसी को अस्त्र-शस्त्र तलवार से मार देना द्रव्य हिंसा कहलाती है और मन वचन से दूसरे के प्रति झूठ चोरी क्रोध कपट आदि दुर्गुणों का मन में पैदा होना भाव हिंसा कहलाती है। जैन धर्म के अनुसार जलचर, थलचर, नभचर प्राणियों के अलावा सभी प्राकृतिक चीजों पेड़, पौधों ,वनस्पतियों यहां तक कि नदियों, पहाड़ों ,पत्थरों में भी जीवन होने की मान्यता है।
यह भी पढ़ें… अब जमीनी जंग में उतरेंगे मशीनी योद्धा!
महावीर के सिद्धांत ला सकते हैं विश्व में शांति
भगवान महावीर का कहना था किसी भी तरह के जीवों की हिंसा यानी एक इंद्रिय, दो इंद्रिय, तीन इंद्रिय , चार इंद्रिय, पांच इंद्रिय वाले किसी भी जीव की हिंसा हमें नहीं करनी चाहिए। हमें अपने मन में सब के प्रति दया भाव रखना चाहिए। मारना तो दूर की बात है किसी के प्रति मन में हिंसा का विचार लाना भी हिंसा का कारण है। विरोधी हिंसा के अंतर्गत यदि आपके राष्ट्र ,धर्म और बहन बेटियों पर कोई संकट आए तो उसका मुकाबला वीरता से करो ऐसे में अहिंसा का व्रत खंडित नहीं होता। दुष्टों से भयभीत होकर भागना या उनका मुकाबला ना करना कायरता की श्रेणी में आता है। अत अहिंसा एक नकारात्मक शब्द है जो हिंसा से बना है। अहिंसा वीरों का आभूषण हैं, ना कि कायरों का।
आज जब विश्व बारूद के ढेर पर खड़ा है ऐसे में भगवान महावीर के सिद्धांत अहिंसा, अपरिग्रह और अनेकांत को अपनाकर आपसी वार्ता से ही विश्व में शांति लाई जा सकती है और मानवता को बचाया जा सकता है। इस बात पर विश्व नेताओं को ध्यान देना चाहिए कि किसी भी युद्ध से किसी भी समस्या का समाधान नहीं निकल सकता बल्कि युद्ध तो कई दूसरी समस्याओं को जन्म देता है।
शांति से बैठकर, बातचीत करके ही किसी समस्या का सुलझाया जा सकता है। किसी की सनक, किसी का गर्व या घमंड युद्ध करवाता है पर युद्ध से कभी किसी का भला नहीं होता बल्कि पूरा विश्व इसका खामियाजा भुगतता है इसीलिए जितनी जल्दी शांति वार्ता से युद्ध का समाधान निकल जाए, उतना ही अच्छा। ऐसे समय में सबको भगवान महावीर के उपदेशों पर न सिर्फ ध्यान देना चाहिए बल्कि अपने जीवन में उनका पालन भी करना चाहिए जिससे कि हमारे साथ ही सारे विश्व का कल्याण हो सके।
