प्रकृति में सब कुछ स्वतः संतुलित है। पांच तत्वों के संतुलित सम्मिश्रण से ही संपूर्ण सृष्टि की रचना हुई है। सांसारिकता में उलझकर कब हम अपना संतुलन खो देते हैं, इसका हमें आभास भी नहीं हो पाता हा, लेकिन इसका परिणाम हमें जरूर भुगतना पड़ता है। आध्यात्मिकता हमारे मन, वचन और क्रिया के संतुलन में योगदान देती है।
अज्ञानतावश हम यह समझते हैं कि यदि हम आध्यात्मिक मार्ग पर आगे बढ़ेंगे तो हम सांसारिकता में पीछे रह जाएंगे। यथार्थ यह है कि हम यदि किसी सच्चे सद्गुरु, ज्ञानी या संत कीशरण में जाते हैं और आध्यात्मिक ज्ञान को जीवन में उतारते हैं तो हमारी सांसारिक समस्याओं का या तो खुद ही समाधान हो जाता है या हम समस्याओं से पार चले जाते हैं।
इसका अर्थ यह नहीं है कि आध्यात्मिक मार्ग पर यदि हम चल रहे हैं तो हमारे जीवन में कोई समस्या या कठिनाई नहीं आएगी। सब कुछ आएगा,लेकिन हमें उससे बाहर निकालना होता है, उससे प्रभावित नहीं होना चाहिए, यह गुण हममें विकसित होना चाहिए।प्रतिदिन दैनिक सांसारिक कार्य करते समय हम जो भी विचार या व्यवहार करते हैं, वह हमारे माध्यम से परमात्मा ही कर रहा है, ऐसा भाव रखने पर सांसारिकता हमें उलझा नहीं पाएगी।
सांसारिकता और आध्यात्मिकता: जीवन में संतुलन का सहज मार्ग
वास्तविकता यह है कि कोई भी विचार आपका अपना नहीं होता है। ब्रह्मांड में विभिन्न विचार तरंगों के रूप में फैले होते हैं। आपके भावों के अनुरूप या आपके दृष्टिकोण के अनुसार ब्रह्मांड के विचार आपके मन में उतर जाते हैं। इसलिए लकीर के फकीर न बनें। हर कार्य व व्यवहार मेंसांसारिकता और आध्यात्मिकता को एक-दूसरे का विरोधी नहीं बल्कि सहयोगी मानकर दोनों का सम्मान करते हुए हमें आनंद में स्थित रहना है।
आध्यात्मिकता से हमारे मन, वचन और कर्म खुद ही संतुलित हो जाते हैं। संतुलन हमारी हर प्रकार की प्रगति और उद्धार का आधार है।नए दृष्टिकोण को खोजें। इससे आपके विचारों का पैटर्न बदल जाएगा और आपके जीवन में नवीनता का अनुभव होगा।जब जीवन में सांसारिकता और आध्यात्मिकता के लिए समय देने की बात आती है तो हमें सांसारिक कार्यों के लिए भी समयअवश्य देना चाहिए, लेकिन उस समय हमें पूरे भाव से गुरु को समर्पित रहना है। यह भाव रखना है कि हमारी उन्नति हो रही है, क्योंकि समर्पित रहना भी स्वयं में एक प्रकार की साधना है, लेकिन यह साधना हमें दिखाई नहीं देती।
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ये हमारे व्यवहार को संतुलित करती है।तीसरा तरीका है- निदिध्यासन। हम पूरे जगत को जगदीश्वर रूप में मानते हैं। उसी के अनुसार विचार तथा व्यवहार करते हैं, तब हमारे जीवन में सांसारिकता और आध्यात्मिकता दोनों संतुलित रहते हैं।सांसारिकता और आध्यात्मिकता को एक-दूसरे का विरोधी नहीं बल्कि सहयोगी मानकर दोनों का सम्मान करते हुए हमें आनंद में स्थित रहना है। आध्यात्मिकता से हमारे मन, वचन और कर्म खुद ही संतुलित हो जाते हैं। संतुलन हमारी हर प्रकार की प्रगति और उद्धार का आधार है।
