मारिया कोरिना मचादो यानी लोकतंत्र की लौ!

दस अक्तूबर, 2025 को नोबेल शांति पुरस्कार के लिए वेनेज़ुएला की साहसी विपक्षी नेता मारिया कोरिना मचादो के चयन की घोषणा हुई। बेश़क, नॉर्वे की राजधानी ओस्लो से आई इस खबर ने पूरी दुनिया को लोकतंत्र की ताक़त का अहसास कराया। ग़ौरतलब है कि नॉर्वेजियन नोबेल समिति ने उन्हें यह सम्मान लोकतंत्र के अधिकारों को बढ़ावा देने और शांतिपूर्ण परिवर्तन के संघर्ष के लिए दिया है। मारिया कोरिना को हार्दिक बधाई! आपकी यह जीत न सिर्फ वेनेज़ुएला की, बल्कि पूरे लैटिन अमेरिका और दुनिया की उन आवाज़ों की जीत है, जो अँधेरे में भी रोशनी जलाए रखती हैं!

मारिया मचादो: संघर्ष, साहस और लोकतंत्र की मिसाल

सयाने बता रहे हैं कि मारिया कोरिना मचादो का जन्म 1967 में वेनेज़ुएला के वैलेंसिया शहर में एक मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ। इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद वे राजनीति के मंच पर उतरीं। 2002 में उन्होंने सुमेटे नामक संगठन की स्थापना की, जो नागरिकों को मतदान और लोकतंत्र की समझ सिखाता है। यह संगठन अमेरिकी फंडिंग से जुड़ा रहा, लेकिन इसका मक़सद वेनेज़ुएला में पारदर्शी चुनाव सुनिश्चित करना था। 2012 में वे संसद पहुँचीं, जहाँ उन्होंने ह्यूगो शावेज़ के शासन के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद की।

शावेज़ के बाद निकोलस मादुरो के आने पर तो उनका संघर्ष और तेज़ हो गया। 2023 में विपक्षी प्राइमरी चुनावों में उन्होंने भारी बहुमत से जीत हासिल की और राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार बनीं। लेकिन मादुरो शासन ने उन्हें चुनाव लड़ने से रोक दिया। फिर भी, मारिया ने हार नहीं मानी। वे भूमिगत हो गईं, लेकिन सोशल मीडिया और गुप्त सभाओं के सहारे लाखों लोगों को एकजुट किया। उनकी पार्टी वेंते वेनेज़ुएला ने 2024 के राष्ट्रपति चुनावों में मादुरो के ख़िलाफ़ अभियान चलाया।

याद रहे कि मारिया ने हमेशा अहिंसक रास्ता अपनाया। प्रदर्शन, अंतरराष्ट्रीय दबाव और कानूनी लड़ाई! नोबेल समिति ने कहा कि वे लोकतंत्र की लौ जलाए रखने वाली हैं; तानाशाही के बढ़ते अँधेरे में भी उम्मीद की किरण हैं! उनके प्रयासों से वेनेज़ुएला में लाखों लोग सड़कों पर उतरे और अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने मादुरो पर प्रतिबंध लगाए। मारिया की यह यात्रा एक ऐसी साधारण महिला की असाधारण हिम्मत की कहानी है, जो आर्थिक संकट, दमन और निर्वासन के बावजूद डटी रहीं।

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नोबेल सम्मान पर विश्वभर में मिली-जुली प्रतिक्रियाएँ

स्वाभाविक ही, वेनेज़ुएला के विपक्ष ने मारिया को शांति का नोबेल दिए जाने की घोषणा को लोकतंत्र की नैतिक जीत बताया। पूर्व राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार एडमुंडो गोंजालेज ने कहा, यह हमारी साझा लड़ाई का सम्मान है। रोचक तथ्य यह है कि मारिया ने यह पुरस्कार अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप को समर्पित किया। व्हाइट हाउस ने भी उन्हें बधाई दी और कहा कि यह लोकतंत्र की रक्षा का संदेश है।

यूरोपीय संघ और कनाडा जैसे देशों ने इसे तानाशाही के ख़िलाफ़ वैश्विक संकेत माना। अचरज नहीं कि भारत में भी इसे गांधीवादी अहिंसा की याद कहा जा रहा है। दुनियाभर में लोग मारिया को आयरन लेडी कह रहे हैं। मारिया की भावुक प्रतिक्रिया वायरल हो रही है – मेरे पास शब्द नहीं, लेकिन यह जीत सबकी है! दूसरी ओर, विवाद भी कम नहीं। मादुरो शासन ने इसे अमेरिकी साज़िश करार दिया। कहा कि मारिया तेल के लिए विदेशी एजेंट हैं! कुछ वामपंथी समूहों का आरोप है कि नोबेल समिति अमेरिकी हितों की पिट्ठू है!

यह भी कि यह पुरस्कार रिजीम चेंज के लिए है, शांति के लिए नहीं! मारिया के इज़राइल समर्थन और बिटकॉइन को तानाशाही के ख़िलाफ़ हथियार बताने पर भी बहस छिड़ी है। और हाँ, इस पुरस्कार के प्रबल प्रत्याशी डोनल्ड ट्रंप के समर्थकों की हताशा तो जगज़ाहिर है ही! फिर भी, ये प्रतिक्रियाएँ साबित करती हैं कि नोबेल शांति पुरस्कार प्राय विवादास्पद होता है! इसके बावजूद, मारिया का चयन दुनिया को चेतावनी देता है- तानाशाही को चुनौती दो, वरना अँधेरा फैलेगा!

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