मौन, चिंतन, तर्पण और ध्यान का दिन है मौनी अमावस्या

तिथि मुहूर्त

विक्रम पंचांग के अनुसार, मौनी अमावस्या 18 जनवरी, रविवार की रात 12 बजकर 3 मिनट से शुरु हो रही है, जो 19 जनवरी, सोमवार की देर रात तक रहेगी। उदया तिथि के आधार पर 18 जनवरी, रविवार को मौनी अमावस्या का व्रत एवं अनुष्ठान मान्य होंगे।

शुभ योग

माघी अमावस्या रविवार को है। इस दिन व्यतीपात योग के साथ दुर्लभ अर्धोदय योग भी बन रहा है। स्कंद पुराण में इस योग को बहुत पुण्यदायी बताया गया है। स्कंद पुराण के अनुसार, अर्धोदय योग में सभी स्थानों का जल गंगा के समान पवित्र हो जाता है और सभी ब्रह्म के समान शुद्धात्मा वाले हो जाते हैं। अर्धोदय योग में स्नान-दान आदि पुण्य कार्य करने से कई गुना अधिक फल की प्राप्ति होती है।

माघ मास की अमावस्या को मौनी अमावस्या या माघी अमावस्या भी कहा जाता है। मौनी शब्द संस्कृत के मौन से निकला है, जिसका अर्थ है- कुछ न बोलना यानी मौन धारण करना। इस दिन मौन के साथ संयम, चिंतन और ध्यान को विशेष रूप से प्रतिष्ठित किया गया है। इस दिन गंगा स्नान और तर्पण का विशेष महत्व होता है। इसलिए माघ माह की मौनी अमावस्या विशेष रूप से भगवान शिव और पितरों की आत्मिक शांति के लिए श्रेष्ठ तिथि समझी जाती है।

धार्मिक महत्व

धर्मशास्त्रां के मुताबिक इस दिन गंगा नदी में स्नान करने से व्यक्ति को मोक्ष तुल्य फल की प्राप्ति होती है। गंगा का जल इस दिन अमृतमय माना जाता है। इस तिथि पर कुछ खास जगहों पर स्नान करने की परंपरा है- प्रयागराज का त्रिवेणी संगम, हरिद्वार और वाराणासी आदि।

पितृ तर्पण और श्राद्ध कर्म

मौनी अमावस्या पर पितरों का तर्पण, श्राद्ध और पिंडदान करने का विशेष महत्व है। धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक इस दिन किये तर्पण से पूर्वज प्रसन्न होते हैं। इस दिन व्रत रखने से पितृ दोष का निवारण होता है। अपने पूर्वजों को सम्मान देना, पुण्य प्रदान करना और उनका स्मरण करना, जीवन में संतुलन व सकारात्मक ऊर्जा का कारण बनता है। माना जाता है कि इससे अनिष्ट दूर होता है।

मौन व्रत धारण करना

इस दिन का व्रत मौन रहकर किया जाता है, जो एक अनूठी परंपरा है। इस व्रत का अभ्यास उन लोगों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, जो आत्मचिंतन, मानसिक शांति और ध्यान में गहनता चाहते हैं। मौन का पालन करने से मन की अशांति और विद्वेष जैसे मानसिक विकृतियों से मुक्ति मिलती है।

शास्त्र कहते हैं कि इस प्रकार का संयमित व्रत आत्मा को उच्च स्तर पर ले जाता है और कर्मों के प्रभाव को संतुलित करता है। इस दिन गरीबों, पक्षियों, पशुओं को अन्न, वस्त्र, तिल, फल आदि का दान करना बहुत शुभ माना जाता है। ध्यान, जप, यज्ञ और सप्तशती पाठ से व्रती को आध्यात्मिक लाभ मिलता है। इस सबका उद्देश्य आत्मा के सत्य के निकट पहुंचना होता है।

सामाजिक महत्व

मौनी अमावस्या, माघ मेला और कुंभ संध्याओं का भी महत्वपूर्ण हिस्सा होती है। मौन व्रत से आवाज की अनावश्यकता कम होती है और मन की अराजकता नियंत्रित होती है। इससे एकाग्रता बढ़ती है और आंतरिक चिंतन की ऊर्जा विकसित होती है। इसलिए मौनी अमावस्या को आत्मिक शुद्धि का पर्व माना जाता है।

पूर्वजों के प्रति सम्मान, संयम और धर्म के मार्ग पर चलने का अवसर माना जाता है। मौनी अमावस्या हमें याद दिलाती है कि जीवन में सबसे बड़ी पूंजी आध्यात्मिक संतुलन है। पितरों के प्रति सम्मान व श्राद्ध कर्म जीवन में सकारात्मक ऊर्जा लाते हैं तथा मौन, दान, ध्यान और स्नान जैसे कर्म हमें मानसिक और आत्मिक उन्नति की ओर अग्रसर करते हैं।

आर.सी.शर्मा

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