मोदी व ट्रंप: आपस में व्यापार वार्ता के लिए सहमत

अगर वाशिंगटन इंडो-पैसििफक में चीन के वर्चस्व को नियंत्रित करना चाहता है तो उसे नई दिल्ली की ज़रूरत पड़ेगी। भारत के लिए क्वैड जैसे गुट में रहना लाभकारी है क्योंकि चीन व रूस ने अनंत समझौता किया हुआ है। इसके अतिरिक्त भारत व अमेरिका को एक-दूसरे से बहुत अधिक लाभ हैं। लोगों का लोगों से संपर्क, वैज्ञानिक शोध में साझेदारी, टेक और अन्य अनेक चीज़ें। दोनों देशों में से कोई भी इनकी कुर्बानी नहीं करना चाहेगा। इसलिए ट्रंप को अपने शब्दों पर कायम रहना चाहिए और जल्द टैरिफ युद्ध पर विराम लगाना चाहिए।

आने वाले कुछ सप्ताह में मैं अपने बहुत अच्छे दोस्त प्रधानमंत्री मोदी से बातचीत करने जा रहा हूं। मुझे विश्वास है कि हमारे दोनों महान देशों के लिए (अमेरिका-भारत व्यापार बाधाओं को संबोधित करने की वार्ताओं का) सफलतापूर्वक निष्कर्ष पर पहुंचने में कोई कठनाई नहीं होगी। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के इस बयान के बाद भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा, भारत व अमेरिका करीबी दोस्त व प्राकृतिक साथी हैं।

हमारी टीमें इन वार्ताओं का जल्द निष्कर्ष निकालने के लिए कार्य कर रही हैं। मैं भी राष्ट्रपति ट्रंप से बातचीत करने जा रहा हूं। हम साथ मिलकर काम करेंगे अपने लोगों का सुनहरा व अधिक समृद्ध भविष्य सुनिश्चित करने के लिए। इन दोनों नेताओं के बयानों से कुछ महत्वपूर्ण संकेत मिल रहे हैं। एक, दोनों आपस में बातचीत करने के लिए तैयार हैं। दो, दोनों देशों की टीमें व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने के बहुत करीब हैं और उसके तय होने के बाद ही मोदी व ट्रंप आपस में वार्ता करेंगे बल्कि व्यापार समझौते की घोषणा करेंगे।

मोदी-ट्रंप रिश्तों में खटास और कूटनीतिक तनातनी

गौरतलब है कि मोदी व ट्रंप के रिश्तों में खटास आनी तो उस समय से ही शुरू हो गई थी जब जो बाइडेन के कार्यकाल के दौरान मोदी अमेरिका की आधिकारिक यात्रा पर थे और ट्रंप ने माई फ्रेंड मोदी इज़ कमिंग कहते हुए उम्मीद व्यक्त की थी कि मोदी उनसे मिलेंगे व उनका चुनाव प्रचार करेंगे, पहले की तरह (अबकी बार ट्रंप सरकार), लेकिन मोदी उनसे नहीं मिले।

बदले में ट्रंप ने अपने शपथ ग्रहण समारोह में मोदी को आमंत्रित नहीं किया, अवैध अप्रवासी भारतीयों को हथकड़ी व बेड़ी पहनाकर मिलिट्री हवाईजहाज़ से वापस भारत भेजा और फिर जब मोदी अमेरिका गये तो वाइट हाउस के गेट पर उनका एक जूनियर अधिकारी से स्वागत कराया, जबकि उस दिन कई अन्य राष्ट्रों के प्रमुखों को ट्रंप ने स्वयं रिसीव किया था।

फिर ऑपरेशन सिंदूर की सीज़फायर का सारा श्रेय ट्रंप ने स्वयं लेने का प्रयास किया और चालीस से अधिक बार कहा कि व्यापार करने का लालच देकर उन्होंने भारत व पाकिस्तान के बीच युद्धविराम कराया था। अपने इस आधारहीन दावे की पृष्ठभूमि में ट्रंप यह चाहते थे कि कनाडा में जी-20 की बैठक के बाद मोदी व पाकिस्तान के जनरल आसिम मुनीर उनके साथ वाइट हाउस में लंच करें और संयुक्त रूप से नोबेल शांति पुरस्कार के लिए उनके नाम का प्रस्ताव रखें।

अपनी घरेलू राजनीति को मद्देनज़र रखते हुए मोदी के लिए भारत विरोधी व सांप्रदायिक मुनीर के साथ लंच करना मुमकिन न था, उन्होंने पूर्व निर्धारित कार्यक्रम का हवाला देते हुए लंच निमंत्रण स्वीकार नहीं किया। वैसे भी ट्रंप के लिए नोबेल शांति पुरस्कार की सिफारिश कैसे की जा सकती थी जब वह गाज़ा में इज़राइल द्वारा किये जा रहे नरसंहार का समर्थन करते हैं और 24-घंटे में यूक्रेन युद्ध रुकवाने का दावा करने के बावजूद अभी तक कुछ नहीं कर पाये हैं।

ट्रंप का टैरिफ दबाव और भारत की रणनीतिक चालें

बहरहाल, इस सबसे ट्रंप इतने क्षुब्ध हुए कि उन्होंने प्रस्तावित व्यापार समझौते में ऐसी शर्तें लगाने का प्रयास किया जिन्हें भारत स्वीकार नहीं कर सकता था और नई दिल्ली पर दबाव डालने के लिए ट्रंप ने भारत पर 25 प्रतिशत का टैरिफ लगाया फिर उसमें 25 प्रतिशत अतिरिक्त जुर्माना जोड़ा यह कहते हुए कि भारत प्रतिबंध के बावजूद रूस से तेल आयात कर रहा है, जबकि यूक्रेन-रूस का युद्ध शुरू होने पर अमेरिका के कहने पर ही भारत ने रूस से तेल लेना शुरू किया था ताकि तेल के ग्लोबल दामों को नियंत्रित रखा जा सके।

अमेरिका स्वयं रूस से खाद व अन्य चीज़ें आयात करता है, जिनके बारे में ट्रंप का कहना है कि उन्हें मालूम नहीं। कैसा राष्ट्रपति है जिसे अपने देश के बारे में ही कुछ मालूम नहीं? फिर ट्रंप ने कहा कि वह क्वैड की बैठक में शामिल नहीं होंगे, जिसकी मेज़बानी भारत करेगा। ट्रंप की इन बेतुकी हरकतों का नई दिल्ली को जवाब देना आवश्यक था। इसलिए गलवान घटना को अनदेखा करते हुए मोदी ने चीन में आयोजित एससीओ की बैठक में शामिल होने का निर्णय लिया। यह ट्रंप के लिए ज़बरदस्त झटका था।

अगर रूस, चीन, ईरान व भारत एक मंच पर होंगे तो ट्रंप के टैरिफ युद्ध की सारी हवा निकल जायेगी। इसका ट्रंप को एहसास था, इसलिए उन्होंने कहा कि हम भारत व रूस को डीप, डार्क चीन के हाथों खो चुके हैं। लेकिन ट्रंप को जल्द ही महसूस हो गया कि भारत को खोना अमेरिका के लिए काफी हानिकारक होगा, इसलिए वह भूल सुधार में लग गये और उन्होंने मोदी की प्रशंसा करते हुए उन्हें फिर से अपना दोस्त कहा, जिसका मोदी ने भी सकारात्मक जवाब दिया।

ट्रंप- मोदी रिश्ते: दबाव, वार्ता और सतर्कता

साथ ही अमेरिका को खुश करने के लिए मोदी ने कहा कि वह ब्रिक्स सम्मेलन में शामिल नहीं होंगे; उनकी जगह विदेश मंत्री एस.जयशंकर जायेंगे। अब स्थिति यहां तक आ गई है कि दोनों नेता आपस में बात करने के लिए तैयार हो गये हैं। लेकिन ट्रंप भरोसेमंद दोस्त नहीं हैं, वह कब आपनी बातों से मुकर जायें, पलट जायें, कुछ कहा नहीं जा सकता है। वैसे भी कूटनीतिक मामलों में व्यक्तिगत दोस्ती का कोई अर्थ नहीं होता है।

ट्रंप ने यूरोपीय संघ से कहा है कि वह भारत पर 100 प्रतिशत टैरिफ लगाये, यानी वह नई दिल्ली पर निरंतर दबाव बनाये रखना चाहते हैं। अत: यह अकारण नहीं है कि मोदी ने अपने नवीनतम बयान में ट्रंप को दोस्त नहीं कहा है बल्कि भारत व अमेरिका को करीबी दोस्त बताया है। अमेरिका पर ही जवाबी दबाव बनाने के लिए मोदी ने कतर पर इजराइली हमले की कड़े शब्दों में निंदा की है, जबकि अभी तक वह इजराइल की आलोचना करने से बच रहे थे। यूक्रेन युद्ध रुकवाने के प्रयास में मोदी ने इटली की प्रधानमंत्री जिओर्जिया मेलोनी से भी बात की है। इन सब बातों को ट्रंप को सख्त संदेश देने के रूप में देखा जाना चाहिए।

बहरहाल, ट्रंप ने जब अपनी सोशल मीडिया पोस्ट से इस बात की पुष्टि की कि भारत व अमेरिका अपनी व्यापार वार्ता को जारी रखे हुए हैं तो बाज़ारों में उछाल अवश्य आया। यह सही है कि आने वाले दिनों में ट्रंप व मोदी के बीच बातचीत संभावित है, लेकिन यह सब वाइट हाउस व मागा समर्थकों जैसे पीटर नवारो के निंदनीय बयानों के बाद हो रहा है, इसलिए नई दिल्ली को सावधान रहना चाहिए।

भारत-अमेरिका संबंध: व्यापार, रक्षा और क्वैड सहयोग

विशेषकर इसलिए कि ट्रंप गिरगिट की तरह रंग बदलते हैं और अपने टैरिफ प्रेमी मागा समर्थकों को प्रसन्न करने के लिए वह किसी भी हद तक जा सकते हैं। इसलिए जब तक व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर न हो जायें तब तक उसे हुआ न माना जाये। भारत ने बहुत मज़बूती से अपना पक्ष रखा है और थियानजिन एससीओ सम्मेलन के ज़रिये कुछ स्ट्रेटेजिक संदेश भी वाशिंगटन को भेजे हैं। साथ ही ट्रंप के एक अति करीबी से भी संपर्क बनाये रखा है। इससे ट्रंप को भारत-अमेरिका के स्ट्रेटेजिक संबंध का एहसास हुआ है, जो व्यापार से आगे जाता है। ट्रंप का फोकस केवल गुड्स ट्रेड पर है, जो भारत में सरप्लस हैं, लेकिन वह सर्विसेज ट्रेड को आसानी से अनदेखा कर देते हैं जहां अमेरिका 44 बिलियन डॉलर सरप्लस में है।

शाहिद ए चौधरी
शाहिद ए चौधरी

अमेरिका भारत से 24 बिलियन डॉलर का रक्षा व्यापार भी कर रहा है, जो 2007 से निरंतर बढ़ता जा रहा है। फिर चीन भी एक मुद्दा है। अगर वाशिंगटन इंडो-पैसििफक में चीन के वर्चस्व को नियंत्रित करना चाहता है तो उसे नई दिल्ली की ज़रूरत पड़ेगी। भारत के लिए क्वैड जैसे गुट में रहना लाभकारी है क्योंकि चीन व रूस ने अनंत समझौता किया हुआ है। इसके अतिरिक्त भारत व अमेरिका को एक-दूसरे से बहुत अधिक लाभ हैं। लोगों का लोगों से संपर्क, वैज्ञानिक शोध में साझेदारी, टेक और अन्य अनेक चीज़ें। दोनों देशों में से कोई भी इनकी कुर्बानी नहीं करना चाहेगा। इसलिए ट्रंप को अपने शब्दों पर कायम रहना चाहिए और जल्द टैरिफ युद्ध पर विराम लगाना चाहिए।

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