वरंगल तथा करीमनगर में सरपंच चुनाव में अहम मुद्दा बने बंदर

वरंगल/करीमनगर, वरंगल और करीमनगर में लोकल बॉडी इलेक्शन की कहानी ने एक अचानक मोड़ ले लिया है। मतदाताओं का कहना है कि वे स़िर्फ उसी को सपोर्ट करेंगे, जो उनके गाँवों को लुटेरे बंदरों से छुटकारा दिला सके, जिससे शहर के मुख्य मुद्दे किनारे हो गए हैं।

वरंगल ज़िले के वर्धन्नापेट मंडल के येलंदू जैसे गाँवों में हालात खास तौर पर बहुत खराब हैं। 5,400 वोटर्स वाले इस गाँव में लगभग 10,000 से ज़्यादा बंदर हैं, जो यहाँ की इंसानी आबादी से दोगुने हैं। बंदरों के झुंड तबाही मचा रहे हैं, जिससे बच्चों, औरतों और बुज़ुर्गों का अकेले चलना खतरनाक हो गया है। वे अक्सर घरों पर हमला करते हैं, खाना चुराते हैं और अगर दरवाज़े खुले छोड़ दिए जाएँ, तो घरों में अ़फरा-त़फरी मच जाती है। गाँववालों ने सरपंच पद के लिए एक स़ाफ शर्त रखी है कि उन्हें विकास का कोई और काम नहीं चाहिए, बस बंदरों से छुटकारा मिल जाए, तो काफी है।

यह समस्या स़िर्फ वरंगल तक ही सीमित नहीं है। जयशंकर भूपलपल्ली ज़िले में, जो घने जंगलों के लिए जाना जाता है, पोडू की बढ़ती खेती की वजह से बंदर गांवों में आ गए हैं। तडिचेरला, पेड्डाटुंडला और मल्लाराम जैसी जगहों पर वोटरों को रोज़ाना बंदरों और आवारा कुत्तों दोनों के हमलों का सामना करना पड़ता है। इसी तरह पहले के करीमनगर ज़िले में बंदरों की बेकाबू आबादी ने बहुत डर पैदा कर दिया है। स्थानीय लोगों को लग रहा है कि ये जानवर उनकी संख्या से कम हैं। वोटर खुलेआम उम्मीदवारों से अपना समर्थन देने से पहले लिखित वादे की मांग रहे हैं।

बंदरों के आतंक ने गाँव की रोज़मर्रा की ज़िंदगी बर्बाद की

बंदरों के आतंक ने रोज़मर्रा की ज़िंदगी और खेती दोनों को बिगाड़ दिया है। बाहर निकलते समय लोगों पर अक्सर हमला होता है, जिसमें वे घायल हो जाते हैं। बंदर संपत्ति को नुकसान पहुँचाते हैं और सब्ज़ियों और फूलों के बगीचों पर हमला करते हैं। किसान खास तौर पर प्रभावित होते हैं, क्योंकि बंदरों के झुंड फसलें बर्बाद कर देते हैं, जिससे उन्हें अपने खेतों की सुरक्षा के लिए गार्ड पर पैसे खर्च करने पड़ते हैं।

मलियाला के रहने वाले बाले भाग्य श्री ने कहा कि उनका वोट स़िर्फ उन्हीं को जाएगा, जो बंदरों को पकड़ने का वादा करेंगे, क्योंकि गांववाले उनकी वजह से हर दिन नरक में जी रहे हैं। बंदर फसलें खराब कर देते हैं, घरों में घुस जाते हैं और अ़फरा-त़फरी मचाते हैं। अधिकारियों के इस समस्या को हल करने में नाकाम रहने पर लोगों का कहना है कि वे उसी को वोट देंगे जो सच में इस समस्या को खत्म करने का वादा करेगा।

यह भी पढ़ें… आंदोलनकारियों के खून से सने हैं कांग्रेस के हाथ : केटीआर

यह पहली बार नहीं है कि जब बंदरों की समस्या ने किसी चुनाव पर असर डाला है। जगत्याल ज़िले के कोडिम्याला मंडल में पहले हुए एक चुनाव में उम्मीदवार एलेटी ममता ने इस समस्या से निपटने का वादा किया था। 4,000-5,000 बंदरों की आबादी से परेशान गाँववालों ने उन्हें भारी बहुमत से चुना था। जीतने के बाद उन्होंने बिहार से एक खास टीम हायर की, जिसने दो महीने तक काम किया और लगभग 3,000 बंदरों को सफलतापूर्वक पकड़कर उटनूर के जंगलों में छोड़ दिया।

अब आपके लिए डेली हिंदी मिलाप द्वारा हर दिन ताज़ा समाचार और सूचनाओं की जानकारी के लिए हमारे सोशल मीडिया हैंडल की सेवाएं प्रस्तुत हैं। हमें फॉलो करने के लिए लिए Facebook , Instagram और Twitter पर क्लिक करें।

Related Articles

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

Back to top button