मिस्टर माफी ठाकुर !
हमारे संसदीय क्षेत्र में वे मि.माफी ठाकुर के नाम से प्रसिद्ध हैं पुराने तपे-तपाये जनप्रतिनिधि हैं पर उनका मुंह क्या है कि बेलगाम घोड़ा ! कब कहाँ सरपट भाग जाए दुलत्ती झाड दे, कोई ठिकाना नहीं! कभी किसी को आतंकवादी कह देंगे ,कभी किसी को जिहादी! अपने विरोधियों को साम्प्रदायिक और फिरकापरस्त कह देना उनके बाएं हाथ का खेल है! भ्रष्टाचारी और कमीशनखोर शब्द तो उनके जिह्वा में खेलते रहते हैं।
इन शब्दों का सुगंधित, शीतल चंदन वे कभी भी सामने वाले के माथे पर लेप सकते हैं! कभी-कभी तो बोलने की झोक में प्रतिक्रिया देते हुए वे अपनी ही पार्टी के कई नामी गिरामी ध्वज-वाहकों की इज्जत की मिट्टी पलीद कर देते हैं। कल ही वे विरोध-पक्ष के एक जाने-माने जनप्रतिनिधि को डकैत कहने के मानहानि के अपराध में हाईकोर्ट से माफी मांगकर छूटे हैं! इधर छूटते ही आज उन्होंने विरोधी पार्टी के एक जनप्रतिनिधि का मुंह गुंडा शब्द के गुलाल से लाल कर दिया।
राजनीति में उपमाओं का खेल और बेकाबू बयान
अब तो उन्हें यह भी याद नहीं कि उन्होंने अपने उपमा-रूपक के सुगंधित धूप-दीप से कितने बार विरोधियों का हवन-पूजन कर चुके हैं ! मुझसे मुल़ाकात हुई और मैंने पत्रकार होने के कारण यह मामला उठाया तो वे हंसने लगे ! उनकी हंसी में मंजा हुआ लोमड़पन था ! मैं समझ गया वे उत्तर देना नहीं चाहते ! जनता के साथ उनकी पार्टी वाले भी उनके द्वारा विरोधियों को अलंकृत किये गये मजेदार प्यारे-प्यारे अलंकारों का खूब मजा लेते हैं।
कई बार जब उनके द्वारा विभूषित संबोधनों का पानी सिर से उपर चला जाता है और थू-थू होने लगती है, तब पार्टी वाले यह कहकर पिंड छुड़ा लेते हैं कि यह उनकी निजी राय है,पार्टी का उससे कोई लेना-देना नहीं। एक तरह से कहें तो वे अब वे राजनीति के खुले सांड हो गये हैं। राजनीति के बाजार में वे कब कहाँ मुंह मार दें, कब किसको सींग मारकर उछाल दें उनका कोई ठिकाना नहीं !
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राजनीतिक रंजिश में हिंसा और अस्पताल का मंजर
राजनीति के ऐसे बहादुर, बेधड़क पार्टी-प्रवक्ता का आज अचानक अस्पताल के आई.सी.यू में भर्ती होने होने के समाचार ने मुझे आश्चर्य के दसवें सागर में गोते लगाने को मजबूर कर दिया! शुभचिंतक होने के कारण उनकी मिजाजपुर्सी के लिए मुझे जाना ही था। मैं जब अस्पताल पहुंचा तब उन्हें आई.सी.यू.से स्पेशल वार्ड में शिफ्ट कर दिया गया था। उनके सिर, हाथ,पैरों में जगह-जगह पट्टी बंधी हुई थी। मुझे देखते ही उनकी कंजी आँखों से अविरल अश्रु बहने लगे। मैंने उनके माथे पर हाथ रखकर उन्हें सांत्वना देना चाहा परंतु चोट के कारण उनके शरीर में सांत्वना के लिए कोई जगह ही नहीं बची थी !

काफी देर के बाद उन्होंने जज्ब करके अपने को थामा और सुबकते हुए कहने लगे- एक बार ठीक हो जाऊं फिर साले मल्लू पहलवान को छोड़ूंगा नहीं …! मैंने उसे बेपेंदी का लोटा क्या कह दिया, साले ने अपने आदमियों से मेरी यह हालत करवा दी। सोचा था कि गैंडे की औलाद ज्यादा से ज्यादा मेरे खिलाफ मानहानि का केस करेगा और मैं वहाँ म़ाफी-वाफी मांग कर छूट लूंगा पर इस आतंकी गुंडे ने तो मेरा हाथ-पाँव ही तुड़वा दिया दिनेश भाई…! वे फिर फफक पड़े ! उनकी दयनीय दशा देखकर मेरी भी आँखें भर आईं। अब तक उनका हालचाल जानने के लिए उनकी पार्टी-कार्यकर्ताओं की भीड़ अंदर आने लगी थी। मैं चुपके से उठा और बाहर चला आया! मुझे उनके राजनीतिक जीवन में हिंसा से भरे ऐसे विस्फोटक मुकाम की आशा नहीं थी!
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