नारद जी कहते हैं कि पूर्वजन्म में मैं एक दासी का पुत्र था। मुझे आचार-विचार का ज्ञान नहीं था। मैं भीलों के साथ खेलता था। चार महीने तक मैंने संत-सेवा की, श्रीकृष्ण-कथा सुनी।
संत विषयानंद नहीं देते हैं, संत भजनानंद देते हैं। संत धन देकर सुखी नहीं करते हैं, संत बिगड़े हुए मन को सुखी करते हैं। संत वासना का विनाश करते हैं। मेरे गुरुदेव ने ऐसी कृपा की, मुझे भक्ति का रंग लगा। मैं भक्ति करने लगा। मुझे भगवान् का दर्शन हुआ। एक दासी का पुत्र इस जन्म में देवर्षि हुआ।
कोई मुझे मान देता है, तब मेरे सद् गुरुदेव मुझे याद आते हैं। ये मान मुझे नहीं है, मेरे गुरुदेव को है। गुरुदेव ने पाप छुड़ाया। गुरुदेव ने कृपा करके वासना का विनाश किया है। गुरुदेव ने भक्ति का रंग लगाया। भक्ति सतत करने से जड़-चेतन की गाँठ छूट जाती है। यह शरीर जड़ है, आत्मा चेतन है, दोनों की गाँठ पड़ गयी है। वेदान्त कहता है कि यह गाँठ सच्ची नहीं है। अरे, सच्ची हो या झूठी हो, यह गाँठ सभी को दुःख देती है। शरीर जड़ है और आत्मा चेतन है।
मेरी जड़-चेतन की गाँठ छूट गई
जड़-चेतन की गाँठ सतत भक्ति करने से ही छूटती है, बहुत वेदांत की पुस्तक पढ़ने से नहीं छूटती है। जो परमात्मा के साथ प्रेम करता है, जो सतत भक्ति करता है, उसकी गाँठ छूटती है। मेरी जड़-चेतन की गाँठ छूट गई। भगवान् का स्मरण करते हुए, मैंने मनुष्य शरीर का त्याग किया। मैं दूसरे जन्म में नारद हुआ।
एक बार मैं गोलोक धाम में गया था, जहाँ आनंदमय परमात्मा नित्य-लीला करते हैं। भगवान् के धाम में काल को प्रवेश नहीं मिलता। भगवान् के धाम में काल नहीं आ सकता। भगवान् का धाम आनंदमय है। गोलोक धाम में स्वर्ण-सिंहासन पर श्रीराधाजी के साथ भगवान् विराजमान थे। मुझे दर्शन में अतिशय आनंद हुआ। आनंद में जीव नाचने लगता है। राधा-कृष्ण का दर्शन करता हुआ, मैं भी कीर्तन करते हुए, नाचने लगा।
हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे।
हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे।।
डोंगरे जी महाराज
