नेपाल संकट : विदेशी छाया और हम
नेपाल में 8-9 सितंबर, 2025 को हुई सियासी उथल-पुथल ने पूरे दक्षिण एशिया को हिला दिया है। इसे महज युवाओं का विरोध प्रदर्शन कहें, या एक सुनियोजित तख्तापलट? प्रधानमंत्री खड़ग प्रसाद शर्मा ओली का इस्तीफा, संसद भवन को आग के हवाले किया जाना और सेना का कानून-व्यवस्था पर कब्जा -ये घटनाएँ सतह पर भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की तरह दिखती हैं, लेकिन गहराई में विदेशी ताकतों की भूमिका की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
प्रकट रूप से, घटना की शुरुआत 4 सितंबर को नेपाल सरकार द्वारा सोशल मीडिया मंचों पर प्रतिबंध लगाने से हुई। सरकार का तर्क था कि ये मंच गलत सूचना फैला रहे हैं। लेकिन युवाओं ने इसे सेंसरशिप और भ्रष्टाचार छिपाने की साजिश माना। 8 सितंबर को काठमांडू में हजारों युवा सड़कों पर उतर आए, जिन्हें जनरेशन ज़ी आंदोलन कहा जा रहा है। प्रदर्शनकारियों ने भ्रष्टाचार, ईंधन मूल्य वृद्धि, बेरोजगारी और नेपो किड्स (राजनीतिक परिवारों के वारिस) के वर्चस्व के खिलाफ नारे लगाए।
हिंसा भड़क उठी। पुलिस की गोलीबारी में 19 प्रदर्शनकारी मारे गए। जवाब में प्रदर्शनकारियों ने संसद, सुप्रीम कोर्ट और कई सरकारी भवनों को आग के हवाले कर दिया। ओली को इस्तीफा देना पड़ा। सेना प्रमुख ने कानून-व्यवस्था अपने हाथ में ले ली। अभी निश्चित रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता। फिर भी सयानों को यह आंदोलन सहज नहीं लग रहा। बड़ी हद तक यह अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए और नेशनल एंडोमेंट फॉर डेमोक्रेसी(एनईडी) द्वारा प्रायोजित विद्रोहों की शैली से मेल खाता है।
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नेपाल संकट: चीन-अमेरिका संघर्ष और विदेशी एनजीओ
ओली की सरकार चीन-समर्थक मानी जाती थी। ओली ने बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) के तहत चीनी परियोजनाओं को बढ़ावा दिया, जो अमेरिका को रास नहीं आया। अमेरिका नेपाल को इंडो-पैसिफिक स्ट्रैटेजी में शामिल करना चाहता है, जहाँ चीन को घेरना मुख्य लक्ष्य है। यही नहीं, आंदोलन की अगुवाई करने वाले एनजीओ हामी नेपाल पर अमेरिकी फंडिंग का आरोप है। इसकी वेबसाइट पर स्टूडेंट्स फॉर ए फ्री तिब्बत का लोगो है, जो एनईडी द्वारा फंडेड है।
एनईडी को अमेरिकी कॉरपोरेशनों से भी समर्थन मिलता है। हाल के महीनों में नेपाल में अमेरिकी एनजीओ की गतिविधियाँ बढ़ी हैं। वहाँ लगभग 1,000 ब्रिटिश-अमेरिकी एनजीओ सक्रिय बताए जाते हैं। इसी तरह, बांग्लादेश और श्रीलंका में हाल की उथल-पुथल को भी अमेरिकी हस्तक्षेप से जोड़ा गया है, जहाँ प्रो-चीन सरकारों को गिराया गया। नेपाल में प्रदर्शनकारियों के वीडियो और हैशटैग टिकटॉक और इंस्टाग्राम पर वायरल हुए। क्या यह महज संयोग है कि बैन हटते ही आंदोलन चरम पर पहुँच गया?
विदेशी हस्तक्षेप की संभावना मजबूत है, क्योंकि नेपाल की भू-राजनीतिक स्थिति संवेदनशील है। हिमालयी देश नेपाल चीन और भारत के बीच बफर ज़ोन है। अमेरिका यहाँ फ्रीडम ऑफ रिलिजन और डेमोक्रेसी प्रमोशन के नाम पर हस्तक्षेप करता रहा है। पूर्व अमेरिकी राजदूतों की रिपोर्टों में नेपाल को चीन के प्रभाव से मुक्त करने की बात कही गई है। अब भी, चीन ने ओली के इस्तीफे पर चिंता जताई है, जबकि अमेरिका ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन का समर्थन किया है। अगर यह अमेरिकी साजिश है, तो यह दक्षिण एशिया में अमेरिकी वर्चस्व की रणनीति का हिस्सा है।
नेपाल संकट: विदेशी हस्तक्षेप और भारत की चिंता
कहना न होगा कि भारत के लिए यह घटना गंभीर संदेश की तरह है। नेपाल और भारत के बीच 1,751 किलोमीटर लंबी साझा सीमा है, जहाँ से घुसपैठ, तस्करी और आतंकवादी गतिविधियाँ बढ़ सकती हैं। ओली सरकार के दौरान कुछ सीमा विवाद उभरे थे। लेकिन अस्थिरता से अब ये और जटिल हो सकते हैं। अब, अगर नई सरकार अमेरिका-समर्थक बनी, तो भारत को अपनी पड़ोस-नीति को और मजबूत करना होगा। भारत को अपनी खुफिया एजेंसियों को सक्रिय रखना होगा, ताकि विदेशी ताकतें यहाँ न फैलें। आखिर भारत और नेपाल का रोटी-बेटी का रिश्ता है न!
अंतत, नेपाल का संकट बताता है कि आंतरिक असंतोष को विदेशी ताकतें आसानी से हाईजैक कर सकती हैं। अगर विदेशी साजिश साबित हुई, तो यह क्षेत्रीय शांति के लिए खतरा है। नेपाल के युवाओं को भी सोचना चाहिए कि कहीं वे विदेशी एजेंडे का मोहरा तो नहीं बन रहे!
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