पुराने हथियारों से नये युद्ध नहीं जीते जा सकते !

सीडीएस चौहान नहीं चाहते कि भारत विदेशी टेक्नोलॉजी पर निर्भर रहे। उनके अनुसार पाकिस्तान ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान विदेशी टेक्नोलॉजी पर भरोसा किया और नाकाम रहा। भारत को अपनी ही देशज टेक्नोलॉजी इस्तेमाल करनी चाहिए व उसे निरंतर अपग्रेड करते रहना चाहिए, तभी वह भरोसे के लायक रहेगी। ध्यान रहे कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान स्थानीय तौर पर विकसित किये गये यूएएस व काउंटर-यूएएस प्रयोग किये गये थे, जो भारतीय ज़रूरतों व भारतीय भूखंड के हिसाब से थे और इसलिए कारगर साबित हुए। सीडीएस के अनुसार, विदेशी टेक्नोलॉजी पर निर्भरता हमारी तैयारी को कमज़ोर कर देती है, उत्पादन बढ़ाने की हमारी क्षमता को सीमित कर देती है और नतीजतन नाज़ुक अवसरों पर स्पेयर्स की कमी पड़ जाती है।

दुश्मनों पर बढ़त हासिल करने के लिए न सिर्फ अति आधुनिक हथियारों से लैस होने की आवश्यकता है बल्कि देशज रक्षा टेक्नोलॉजी की भी ज़रूरत है। इस बात पर बल देते हुए चीफ ऑ़फ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) जनरल अनिल चौहान ने कहा है, आज के युद्ध को आप कल के हथियारों से नहीं जीत सकते। आज के युद्ध आने वाले कल की टेक्नोलॉजी से ही लड़े जा सकते हैं।

यह बताते हुए कि युद्ध के आधुनिक मैदानों में आउटडेटेड टेक्नोलॉजी पर भरोसा नहीं किया जा सकता, सीडीएस ने देशज ड्रोन टेक्नोलॉजी के विकास में तेज़ी लाने और यूएएस ग्रिड्स को काउंटर करने की वकालत की है। गौरतलब है कि एयर चीफ मार्शल अमर प्रीत सिंह ने 28 फरवरी 2025 को कहा था कि भारतीय वायु सेना को हर साल 35 से 40 फाइटर जेट्स जोड़ने की ज़रूरत है ताकि संख्या में कमी को पूरा किया जा सके।

यह भी कहा था कि हिंदुस्तान एयरोनॉटिकल लिमेटेड (एचएएल) ने वायदा किया है कि वह अगले साल 24 तेजस मार्क-1ए जेट्स का निर्माण करेगी। लेकिन ऑपरेशन सिंदूर के बाद 30 मई 2025 को वायु सेना प्रमुख सिंह ने इस तथ्य पर गहरी चिंता व्यक्त की कि कोई भी डिफेंस प्रोजेक्ट समय पर पूरा नहीं होता है, निरंतर देरी होती रहती है। एक भी प्रोजेक्ट ऐसा नहीं है, जो वक्त पर पूरा हुआ हो।

इस संदर्भ में उन्होंने जवाबदेही निर्धारित करने का आग्रह किया था और यह भी कि रक्षा सामानों की खरीद व निर्माण इकोसिस्टम में तेज़ी लायी जाये। उन्होंने कहा था, अनेक बार, कॉन्ट्रैक्ट्स पर हस्ताक्षर करते हुए, हम जानते हैं कि वह सिस्टम समय पर नहीं आयेंगे। मुझे ऐसा एक भी सिस्टम याद नहीं आता जो समय पर पूरा हुआ हो।

समय पर हथियार डिलीवरी और सेना की ताकत

कॉन्ट्रैक्ट पर हस्ताक्षर करते वक़्त अव्यवहारिक टाइमलाइन का वायदा किया जाता है, इस पर उन्होंने सवाल किया था, हम ऐसा वायदा ही क्यों करते हैं जिसे पूरा नहीं किया जा सकता? दोनों, सीडीएस व एयर चीफ मार्शल के बयानों से मालूम होता है कि सेना के तीनों अंगों को न सिर्फ आधुनिक हथियारों से लैस करने की ज़रूरत है बल्कि इन हथियारों की डिलीवरी भी समय पर होनी चाहिए।

बहरहाल, दिल्ली स्थित मानिकशॉ सेंटर में आयोजित एक कार्यक्रम में 16 जुलाई 2025 को बोलते हुए सीडीएस चौहान ने याद दिलाया कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान ने 10 मई 2025 को अनआर्म्ड ड्रोनों व लोइटर मुनिशन का इस्तेमाल किया था। लेकिन कोई भी वास्तव में भारतीय सेना या नागरिक इन्फ्रास्ट्रक्चर को नुकसान नहीं पहुंचा सका और उनमें से अधिकतर को बेकार कर दिया गया था।

यहां यह बताना आवश्यक है कि भारतीय सेना के लिए अमेरिका से तीन अपाचे अटैक हेलीकाप्टर्स की पहली खेप 21 जुलाई 2025 को आ जायेगी जो थल सेना की युद्ध क्षमता में वृद्धि करेगी। एएच-64ई जिन्हें हवा में टैंक भी कहा जाता है, उनकी हैवी-ड्यूटी फायर पॉवर की वजह से, 21 जुलाई 2025 को हिंडन एयर फ़ोर्स स्टेशन पर डिलीवर किये जायेंगे। अनुमान यह है कि शेष तीन हेलीकॉप्टर इस साल के अंत तक डिलीवर कर दिये जायेंगे।

इससे पहले 2015 में अमेरिका सरकार व बोइंग के साथ एक समझौते के तहत भारतीय वायु सेना ने 22 अपाचे खरीदे थे। ये सभी 22 अपाचे जुलाई 2020 तक भारत को मिल गये थे, जिनसे भारतीय वायु सेना के दो स्क्वाड्रन सक्रिय हो चुके हैं।
इसमें कोई दो राय नहीं हैं कि भारत को अपनी रक्षा व्यवस्था आधुनिक व मज़बूत करने की ज़रूरत है और वह भी बहुत जल्द।

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ड्रोन के ज़रिए पाक की सुनियोजित घुसपैठ

दरअसल, सुरक्षा व्यवस्था के लिए चिंता का विषय यह है कि पाकिस्तानी तस्करों ने अपनी नापाक हरकतें तेज़ कर दी हैं। वह ड्रग्स, हथियारों व गोला-बारूद से लैस ड्रोनों को भारत में बहुत अंदर तक पहुंचा रहे हैं। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान थोड़े समय के लिए स्थगन के बाद ड्रोन-आधारित तस्करी अधिक सटीकता के साथ फिर आरंभ हो गई है। खबरें ये हैं कि चीनी ड्रोनों का इस्तेमाल किया जा रहा है, जो अधिक ऊंचे उड़ते हैं, जिससे अक्सर पकड़ में नहीं आते हैं। इसे मामूली तस्करी नहीं कहा जा सकता बल्कि यह सुनियोजित पाकिस्तानी आईसीएडी (अवैध, बलपूर्वक, आाढामक व भ्रामक) स्ट्रेटेजी का हिस्सा है, भारत की सुरक्षा को भेदने के लिए।

उद्देश्य यह है कि सीमा के इस पार जो आपराधिक तत्व हैं, उन तक ड्रग्स, बंदूकें व पैसा पहुंचाया जाये। यह पाकिस्तान का पुराना तरीका है भारत को नुकसान पहुंचाने का। याद कीजिये कि पिछली सितम्बर में पंजाब पुलिस की एक टीम ने नाटो-ग्रेड की बन्दूकों का ज़खीरा बरामद किया था, जो संभवत अफगानिस्तान से आया था, लेकिन उसका संबंध पाकिस्तान के ड्रोन ड्राप तस्करों से था। यह कार्यप्रणाली इस एतबार से भी ज़ाहिर हो जाती है कि ऐसे ही हथियार कश्मीर में आतंकियों के पास से भी मिले थे।

जब 2019 में धारा 370 को निरस्त किया गया, उसके बाद से ही पाकिस्तान से ड्रोन ड्रॉप्स आरंभ हुए। इसे काउंटर करने के लिए बीएसएफ ने एंटी-ड्रोन सिस्टम्स अपनाये, जैसे ड्रोनाम जो लेज़र का इस्तेमाल करके पाक-मूल के यूएवी को नष्ट करते हैं। इसके अतिरिक्त विशिष्ट एंटी-ड्रोन टीमें भी गठित की गई हैं। लेकिन ड्रोन टेक्नोलॉजी इतनी बहुमुखी है कि वह निरंतर विकसित होती जा रही है। इसलिए सीडीएस चौहान कह रहे हैं कि हम अपनी देशज ड्रोन टेक्नोलॉजी को लगातार बेहतर व आधुनिक करते रहें।

देशज ड्रोन टेक्नोलॉजी की जरूरत और मजबूती

आज ड्रोनों को मॉडिफाई करके इस तरह से ढाला जा सकता है कि वह पकड़ में न आएं। वह तरीकेकार बदल सकते हैं और एप्लीकेशन में भी परिवर्तन ला सकते हैं। पोन युद्ध सबूत है कि हर पखवाड़े में ड्रोन टेक्नोलॉजी बदल रही है। इसका अर्थ यह है कि रियल टाइम में काउंटर-ड्रोन टेक्नोलॉजी को भी निरंतर बदलना होगा। मतलब यह हुआ कि सम्पूर्ण सुरक्षा व्यवस्था में महारत का विशाल पूल बनाना होगा और उसे शोध व विकास संस्थाओं से जोड़ना होगा।

ड्रोन बहुत तेज़ी से बदल रहे हैं, एफपीवी से फाइबर ऑप्टिक हुए और अब उनका एआई रूप आता जा रहा है। इन हालात में आगे रहने का एकमात्र तरीका यही है कि ड्रोन टेक्नोलॉजी में बहुत अधिक निवेश किया जाये, दोनों उद्योग व शोध में। भारत को अपना ही ड्रोन सुरक्षा कवच बनाना चाहिए। सीडीएस इसी ज़रूरत पर बल दे रहे हैं। दरअसल, सीडीएस चौहान नहीं चाहते कि भारत विदेशी टेक्नोलॉजी पर निर्भर रहे।

– नरेंद्र शर्मा

उनके अनुसार पाकिस्तान ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान विदेशी टेक्नोलॉजी पर भरोसा किया और नाकाम रहा। भारत को अपनी ही देशज टेक्नोलॉजी इस्तेमाल करनी चाहिए व उसे निरंतर अपग्रेड करते रहना चाहिए, तभी वह भरोसे के लायक रहेगी। ध्यान रहे कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान स्थानीय तौर पर विकसित किये गये यूएएस व काउंटर-यूएएस प्रयोग किये गये थे, जो भारतीय ज़रूरतों व भारतीय भूखंड के हिसाब से थे और इसलिए कारगर साबित हुए। सीडीएस के अनुसार, विदेशी टेक्नोलॉजी पर निर्भरता हमारी तैयारी को कमज़ोर कर देती है, उत्पादन बढ़ाने की हमारी क्षमता को सीमित कर देती है और नतीजतन नाज़ुक अवसरों पर स्पेयर्स की कमी पड़ जाती है।

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