बधाई! भारत अब दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था!
नई दिल्ली में 24 मई, 2025 को नीति आयोग गवर्निंग काउंसिल की बैठक संपन्न हुई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई बैठक में भारतीय अर्थव्यवस्था को नई ऊँचाइयों पर ले जाने और केंद्र-राज्य संबंधों को मजबूत बनाने पर गहन चर्चा हुई। बेशक, यह बैठक विकसित भारत 2047 के रोडमैप को साकार करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम रही। केंद्र और राज्यों के बीच सहकारी संघवाद को बढ़ावा देने को इस बैठक का सबसे बड़ा हासिल कहा जा सकता है।
नीति आयोग ने टीम इंडिया की भावना को रेखांकित करते हुए राज्यों को राष्ट्रीय विकास एजेंडे में सक्रिय भागीदार बनाया। उदाहरण के लिए, झारखंड सरकार ने अपने शहरी विकास विभाग के माध्यम से विकसित भारत 2047 के लिए राज्य-विशिष्ट रोडमैप प्रस्तुत किया। कई राज्यों ने मुद्रा ऋण योजना और पीएम स्वनिधि योजना जैसे कार्पामों की प्रगति पर अपनी ऐक्शन टेकेन रिपोर्ट साझा की और समाज के हाशिए पर मौजूद लोगों और असंगठित क्षेत्र के मज़दूरों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने की दिशा में उठाए गए कदमों को दर्शाती है।
समावेशी विकास और सहयोगात्मक संघवाद का संदेश
बैठक में भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए कई क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित किया गया। अंतरराष्ट्रीय बाजरा वर्ष के तहत श्री अन्न (पोषक अनाज) को बढ़ावा देने और भारतीय कदन्न अनुसंधान संस्थान को उत्कृष्टता केंद्र बनाने पर जोर दिया गया। इसके अलावा, जल संरक्षण के लिए अमृत सरोवर कार्पाम और हरित ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में राज्यों के साथ सहयोग पर बल दिया गया। यह दर्शाता है कि नीति आयोग न केवल आर्थिक विकास, बल्कि पर्यावरणीय स्थिरता को भी प्राथमिकता दे रहा है।
बैठक का सबसे बड़ा संदेश था कि भारत का विकास तभी संभव है, जब सभी राज्य एकजुट होकर काम करें। जैसा कि प्रधानमंत्री ने कहा, जब हर राज्य विकसित होगा, तो भारत विकसित होगा। यह 140 करोड़ भारतीयों की साझा आकांक्षा है। यह संदेश केंद्र-राज्य संबंधों में सहयोग और समन्वय की ज़रूरत को जताता है। नीति आयोग ने राज्यों को अपनी नीतियों को राष्ट्रीय लक्ष्यों के साथ जोड़ने के लिए प्रोत्साहित किया, ताकि स्थानीय ज़रूरतों और राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के बीच संतुलन बनाया जा सके।
इसके अलावा, बैठक ने यह सबक दिया कि विकास का रास्ता समावेशी होना चाहिए। समाज के कमज़ोर वर्गों, जैसे असंगठित क्षेत्र के मज़दूरों और छोटे उद्यमियों को आर्थिक मुख्यधारा में लाने के लिए योजनाओं को ज़्यादा असरदार बनाने की ज़रूरत है। नीति आयोग ने बॉटम-अप दृष्टिकोण पर जोर दिया, जिसके तहत नीतियाँ ज़मीनी स्तर की ज़रूरतों को ध्यान में रखकर बनाई जाएँ। कह सकते हैं कि इसे अधिकतम शासन, न्यूनतम सरकार की परिकल्पना को साकार करने की दिशा में एक कदम है।
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नीति आयोग की चुनौतियाँ और सहकारी संघवाद की कमी
पूछा जा सकता है, क्या सचमुच सब तरफ इतनी हरियाली है! तो मानना पड़ेगा, इस सच की कुछ सीमाएँ हैं; और चुनौतियाँ भी। पहली चुनौती है विभिन्न राज्यों की अलग-अलग प्राथमिकताओं और संसाधनों को एक समान मंच पर लाने की। कुछ राज्यों के पास बेहतर संसाधन और बुनियादी ढाँचा है, जबकि दूसरे कुछ अभी भी आधारभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं। ऐसे में, नीति आयोग को यह सुनिश्चित करना होगा कि सभी राज्यों को समान अवसर मिलें।
दूसरी सीमा रही कुछ राज्यों की अनुपस्थिति। विपक्षी दलों द्वारा शासित कुछ राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने इस बैठक से किनारा किया। इससे सहकारी संघवाद की भावना के खोखलेपन का ही पता चलता है। यानी, राजनीतिक मतभेद विकास के एजेंडे से ऊपर हैं? यह प्रवृत्ति दीर्घकाल में देश के लिए नुकसानदेह ही साबित होगी न?
तीसरी चुनौती है नीतियों के कार्यान्वयन में देरी की। कई योजनाएँ (जैसे पीएम स्वनिधि या मुद्रा ऋण) कागजों पर प्रभावी दिखती हैं, लेकिन ज़मीनी स्तर पर उनकी पहुँच और प्रभाव सीमित हैं। अत नीति आयोग को इन योजनाओं की निगरानी और मूल्यांकन के लिए और मजबूत तंत्र विकसित करना होगा। फिलहाल आप कुँअर बेचैन के इस संकेत का आनंद लीजिए कि-
पूरी धरा भी साथ दे तो और बात है!
पर तू ज़रा भी साथ दे तो और बात है!!
चलने को एक पाँव से भी चल रहे हैं लोग;
पर दूसरा भी साथ दे तो और बात है!
