नीतीश के फैसले ने बदल दिये सियासत के समीकरण
नीतीश कुमार के राजनीतिक फैसले ने सियासत के समीकरण को बदल दिया है। उनकी विदाई से मंडल युग की समाप्ति हो सकती है, जिसका असर आने वाले समय में नेताओं की चुनावी रणनीतियों पर पड़ेगा। उनकी कमी से क्या कांग्रेस की सियासत में नई जान आएगी, यह देखना दिलचस्प होगा।
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने राज्यसभा के लिए नामांकन दाखिल कर दिया है। उनके नामांकन के मौके पर गृहमंत्री अमित शाह भी पटना पहुंचे। इसके साथ ही यह तय हो गया कि बिहार में दो दशकों के बाद राज्य की सत्ता में एक बड़ा बदलाव होने जा रहा है। नीतीश कुमार को लेकर बिहार के सियासी गलियारों में लगातार यह चर्चा चल रही थी कि वो बिहार की सत्ता से अलग राज्यसभा का रुख करने वाले हैं।
यह भी इस बात का संकेत था कि बिहार की सियासत में एक बड़ा बदलाव होने जा रहा है। नीतीश कुमार ने एक सोशल मीडिया पोस्ट में लिखा है, पिछले दो दशक से भी अधिक समय से आपने अपना विश्वास एवं समर्थन मेरे साथ लगातार बनाए रखा है, तथा उसी के बल पर हमने बिहार की और आप सब लोगों की पूरी निष्ठा से सेवा की है। कांग्रेस पार्टी ने बिहार के सत्ता में हो रहे इस बदलाव को जनता के साथ धोखा बताया है। आरजेडी ने भी कड़ी प्रतिक्रिया दी है।
दसवीं बार सीएम बनने के बाद भी पद छोड़ने को तैयार नीतीश
जनता दल यूनाइटेड के सुप्रीमो नीतीश कुमार, जिन्होंने चार माह से भी कम समय पहले रिकॉर्ड दसवीं बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी, लेकिन अब अप्रत्याशित रूप से इस प्रतिष्ठित कुर्सी को छोड़ने को तैयार हैं। अब 75 वर्षीय नीतीश कुमार आगामी राज्यसभा चुनाव लड़ने जा रहे हैं। बहरहाल, विधानसभा में सत्तारूढ़ गठबंधन के लिए पर्याप्त बहुमत के कारण उनकी जीत निश्चित मानी जा रही है। निष्कर्ष यह भी है कि राज्यसभा चुनाव में सफल होने के बाद उनका मुख्यमंत्री के रूप में दो दशक पुराना सफर समाप्त हो जाएगा।
इसमें कोई दो राय नहीं कि राज्य में उनका अगला उत्तराधिकारी भाजपा से ही आएगा। उल्लेखनीय है कि नवंबर 2025 में हुए विधानसभा चुनावों में भाजपा राज्य में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी। भाजपा ने जो अच्छा प्रदर्शन किया था, उसके चलते ही नीतीश को फिर से सत्ता में बने रहने में मदद मिली थी। लेकिन तभी राजनीतिक पंडित कयास लगा रहे थे कि कालांतर उनको पद छोड़ना ही होगा, अब चाहे यह स्वेच्छा से हो या मजबूरी में। निस्संदेह, उत्तर भारत में बिहार एकमात्र ऐसा हिंदी भाषी राज्य है जहां अब तक भाजपा का कोई मुख्यमंत्री नहीं रहा है। वहीं दूसरी ओर अटकलें लगायी जा रही हैं कि नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार, जो सक्रिय राजनीति में अभी नए हैं, नई सरकार में उप मुख्यमंत्री बन सकते हैं।
भाजपा की बढ़ती ताकत के बीच जेडीयू की रणनीति
बहुत संभव है बिहार में भाजपा की महत्वाकांक्षा को देखते हुए जेडीयू अपनी पार्टी का जनाधार बनाये रखने के लिये पार्टी के लिये उपमुख्यमंत्री पद चाह रही हो। हो सकता है कि सत्ता में अचानक आने वाले इस बड़े बदलाव को लेकर कुछ जेडीयू नेताओं में असंतोष देखने में आए।बिहार के राज्यसभा जाने की खबरों और तेजी से बदलते राजनीतिक घटनाक्रम के बीच जनता दल (यूनाइटेड) यानी जेडीयू के कई कार्यकर्ताओं ने बिहार में मुख्यमंत्री आवास के बाहर प्रदर्शन किया। इन कार्यकर्ताओं की मांग है कि कि नीतीश कुमार को ही मुख्यमंत्री की कुर्सी पर होना चाहिए।
नीतीश कुमार सबसे ज़्यादा समय तक 20 साल बिहार में मुख्यमंत्री के पद पर रहने वाले शख़्स हैं। उनके कार्यकाल में बिहार, जो पहले अराजकता के लिए जाना जाता था, अब एक अनुशासित राज्य बन गया है। इसी वजह से लोग उन्हें प्यार से सुशासन बाबू के नाम से भी जानते हैं। जब से उन्होंने राज्यसभा में जाने की घोषणा की है, तब से सभी यह सोचने लगे हैं कि क्या बिहार की सियासत में अब कोई बड़ा बदलाव आने वाला है।
नीतीश कुमार की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक है, विरोधियों के बीच सामंजस्य बनाना। पिछले 20 वर्षों में वे भाजपा के सहयोग से सरकार चला रहे हैं, लेकिन उन्होंने कभी भी भाजपा का कोई एजेंडा लागू नहीं होने दिया। उन्होंने समाजवादी नीतियों को अपने कार्यकाल में बरकरार रखा और सामाजिक मर्यादा को बनाए रखने में सफल रहे। अनुभवी व उम्रदराज नीतीश कुमार के सामने भी चुनौती है कि कैसे अपने दल के विधायकों को एकजुट रखा जाए। साथ ही यह सुनिश्चित करना कि उनकी पार्टी का जनाधार प्रभावित न हो।
नीतीश के राज्यसभा जाने से चिराग पासवान को मिलेगा मौका
वहीं दूसरी ओर नीतीश कुमार के राज्यसभा में जाने की स्थिति में लोक जनशक्ति पार्टी के प्रमुख और केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान को राज्य की राजनीति में अपनी पैठ मजबूत बनाने में मदद मिलेगी। यह घटनाक्रम मुख्य विपक्षी दल राष्ट्रीय जनता दल के लिये महत्वपूर्ण होगा क्योंकि वह सत्ताधारी गठबंधन की कमजोरियों का फायदा उठाने की कोशिशें तेज करेगा। वहीं दूसरी ओर सोशल मीडिया पोस्ट में नीतीश कुमार ने दो दशक की पारी में सहयोग के लिये बिहार की जनता का आभार जताया है तथा अपना दायित्व निभाने की बात कही है।
साथ ही राज्यसभा में जाने की तार्किकता का भी पा किया है और विकसित बिहार के संकल्प को फिर से दोहराया है। निस्संदेह, वर्ष 2005 से अब तक, बीच के कुछ महीनों को छोड़कर, उनका सत्ता में बने रहना अभूतपूर्व रहा है। किसी भी गठबंधन की सरकार रही हो, नीतीश कुमार ही मुख्यमंत्री बने रहे। यही वजह है कि जेडीयू में कार्यकर्ताओं का एक वर्ग उनके राज्यसभा में जाने को लेकर निराश है।
बिहार में अपराध की स्थिति में सुधार लाने के लिए नीतीश कुमार ने महत्वपूर्ण कदम उठाए। अब तो लोग यह बताते हैं कि पहले उन्हें दिल्ली से अपने घर जाने में दिन लग जाते थे, लेकिन अब वे महज पांच घंटे में बिहार पहुंच जाते हैं। साफ-सुथरी सड़कें और सुरक्षित यात्रा ने बिहार को एक नया रूप दिया है। महिलाओं की स्थिति में सुधार लाने में नीतीश कुमार का योगदान अद्वितीय रहा है। पहले महिलाओं को बाजारों में अकेले जाने से डर लगता था, लेकिन अब वे स्वतंत्रता से अपने काम के लिए बाहर निकलती हैं। शराबबंदी की नीति ने भी महिलाओं को काफी राहत पहुंचाई है।
पंचायती राज में 20% आरक्षण से सामाजिक संतुलन मजबूत
नीतीश कुमार ने अति पिछड़ी जातियों को समानता का अवसर देने का निर्णय लिया है। पंचायती राज व्यवस्था में 20 प्रतिशत आरक्षण लागू कर उन्होंने दलितों और दबंग जातियों के बीच दूरी कम की। इससे समाज में एकता की भावना बढ़ी है। नीतीश कुमार ने सभी सरकारी नौकरियों में महिलाओं को 50 प्रतिशत का कोटा दिया है, जिससे उन्हें समाज में अपनी पहचान बनाने का अवसर मिला है। इसके परिणामस्वरूप, अब महिलाएं स्वतंत्रता से अपने काम कर रही हैं।
नीतीश कुमार ने हमेशा मुस्लिम समुदाय को अपने साथ रखा। उनके कार्यकाल में राज्य की नीतियों को जदयू के तहत संचालित किया गया। इससे मुसलमानों का एक बड़ा हिस्सा नीतीश के साथ रहा है। बहरहाल, अब तक विधान परिषद, बिहार विधानसभा और लोकसभा का सदस्य रहने के बाद, वे राज्यसभा के भी सदस्य बन जाएंगे। वहीं राज्य की विपक्षी पार्टी कांग्रेस बिहार की सत्ता में होने वाले बदलाव को जनता के साथ छल बता रही है। इसे जनादेश के विरुद्ध कदम बताया जा रहा है।

वहीं आरजेडी की तरफ से कहा जा रहा है कि इस बड़े राजनीतिक घटनाक्रम से बिहार की जनता हतप्रभ है। यह सब भाजपा के विधानसभा में संख्या बल के दबाव में होना था, लेकिन यह इतना जल्दी हो जाएगा, इसकी उम्मीद नहीं थी। वे इसे जेडीयू के संकुचन की शुरुआत बता रहे हैं। नीतीश कुमार के राजनीतिक फैसले ने सियासत के समीकरण को बदल दिया है। उनकी विदाई से मंडल युग की समाप्ति हो सकती है, जिसका असर आने वाले समय में नेताओं की चुनावी रणनीतियों पर पड़ेगा। उनकी कमी से क्या कांग्रेस की सियासत में नई जान आएगी, यह देखना दिलचस्प होगा।
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