छाये बादल

देखो नभ में छाये बादल ,
बिना बताए आए बादल।
पानी कितना लिए हुए पर,
खुद हैं बिना नहाए बादल।
बूँद-बूँद को हैं तरसाते,
अम्बर में फिरते इतराते।
पानी दे, गुड़ धानी दे कह,
बच्चे इनको पास बुलाते।
उधर कहीं मेढंक टर्राया,
झींगुर ने भी शोर मचाया।
बोल पपीहे के सुनकर था,
तनिक तरस बादल को आया।

राजपाल सिंह गुलिका, हरियाणा

जब सबने मिल मनुहार की,
अर्ज़ मेघ ने स्वीकार की।
पानी-पानी हुआ धरा पर,
वृष्टि यूँ मूसलाधार की।

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