ओणम उत्सव के दौरान पूक्कलम का निर्माण केरल की सांस्कृतिक विरासत का अनुपम प्रतीक है। पूक्कलम शब्द मलयालम भाषा से लिया गया है, जिसमें पू का अर्थ फूल एवं कलम का अर्थ रचना या रंगोली है। यह फूलों से बनाई जाने वाली रंगोली आठ से दस दिनों तक चलने वाले ओणम महोत्सव में मुख्य भूमिका निभाती है। पूक्कलम का उद्देश्य राजा महाबली के स्वागत के साथ सामाजिक सहयोग और सौहार्द का प्रदर्शन करना है। पूक्कलम बनाने की परंपरा ओणम के पहले दिन अथम से शुरू होकर हर रोज़ नए फूलों एवं परतों के साथ आगे बढ़ती है।
पहले दिन सिर्फ पीले रंग के थुम्बा जैसे छोटे फूलों से गोलाकार आधार बनाया जाता है। उसके बाद चिथिरा, चोदी, विशकम आदि हर दिन में नए फूल जोड़े जाते हैं, जिससे डिज़ाइन में विविधता आती है और पूक्कलम का आकार बढ़ता जाता है। इस कला में गेंदे, गुलाब, चंपा, चमेली, हिबिस्कस आदि स्थानीय फूलों का प्रयोग आम है। आधुनिक काल में पूक्कलम डिज़ाइनों में ज्यामितीय आकृतियाँ, थीम आधारित आर्ट और यहां तक कि 3डी पैटर्न भी देखे जाते हैं। वहीं परंपरागत पूक्कलम में केंद्र में मिट्टी से बनी त्रिक्काकरा अप्पन, राजा महाबली की आकृति रखी जाती है।
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पूक्कलम को बनाते समय पूरे परिवार व समुदाय का सहभाग ज़रूरी माना जाता है। बच्चे, महिलाएं और पुरुष सभी मिलकर फूलों की पंखुड़ियों को कलात्मक ढंग से सजाते हैं। इससे न सिर्फ सृजनात्मकता को बढ़ावा मिलता है, बल्कि पारिवारिक व सामाजिक संबंध भी मज़बूत होते हैं। पूक्कलम न केवल सौंदर्य और परंपरा की अद्भुत झलक देता है, बल्कि यह उल्लास, स्वागत, समृद्धि और एकता का संदेश भी देता है। ओणम के दौरान पूक्कलम सजाना केरल के प्रत्येक घर के आँगन को आनंद और सांस्कृतिक गौरव से भर देता है।
