शक्तियां – सिद्धियां हमें मुक्त करती हैं ?

हममें से ज्यादातर लोग आध्यात्मिक मार्ग पर शक्तियों – सिद्धियों से आकर्षित होकर जाना चाहते हैं, जबकि मानव जीवन का लक्ष्य धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष प्राप्त करना है, लेकिन अज्ञानतावश हम अपने जीवन का समय और शक्ति अनर्थ ही खर्च कर देते हैं, जिससे हमें ना तो मुक्ति पाने की दिशा मिल पाती है और ना ही हमारी दशा शेष रहती है। धर्म का अर्थ हमारे जन्म के कुल, स्थान, काल और परंपरा से नहीं है बल्कि हमारे मानवीय कर्त्तव्यों से है।

शास्त्रां में भी कहा गया है- परहित सरिस धर्म नहीं भाई अर्थात् हमारा आचार-विचार और व्यवहार सर्व कल्याणकारी होना चाहिए। धन का अर्थ हम स्थूल धन-दौलत से लेते हैं, जबकि वास्तविक धन है- गुरु ज्ञान, जो स्थाई रहता है और संकट के समय हमारी सहायता करता है। आमतौर पर हमारी कामनाएं भी सांसारिक ही होती हैं जिनकी पूर्ति होने पर हमें सुख की अनुभूति होती है और पूर्ति न होने पर दुःख की। हमारी आंतरिक कामना आत्मा के परमात्मा से मिलन की है। इस कामना की पूर्ति की यात्रा में भी आनंद है तथा पूर्ति में भी आनंद ही आनंद।

भक्ति की राह में सबसे बड़ी परीक्षा : मोह और अहंकार

जब हम अपने जीवन में सभी कर्तव्यों का पालन करते हुए पुरुषार्थ करते हैं यानी उस परम पुरुष को पाने के लिए प्रयास करते हैं, तो हमारे दैनिक जीवन के सभी कर्तव्य हमें मोक्ष की ओर ले जाते हैं। जब तक हम जीवित सद्गुरु की शरण में नहीं जा पाते तब तक यही लगता है कि शक्तियों और सिद्धियों को पाकर तंत्र-मंत्र व यंत्र द्वारा जो चाहे वो करके मुक्त हो सकते हैं, लेकिन मानव जीवन के लक्ष्य की प्राप्ति में सिद्धियां और शक्तियां सबसे बड़ी बाधा होती हैं। शास्त्रां में भगवान ने स्वयं कहा है कि जो लोग मेरी भक्ति करते हैं, उनको मैं समृद्ध करता हूं ।

समृद्धि पाकर नब्बे प्रतिशत लोग आध्यात्मिक मार्ग पर आगे बढ़ाना छोड़ देते हैं, दस प्रतिशत लोग समृद्ध होने के बावजूद भी यदि मेरी भक्ति में मग्न रहते हैं तो मैं उन्हें पद-प्रतिष्ठा, मान-सम्मान देता हूं। पद-प्रतिष्ठा पाकर इसमें से नब्बे प्रतिशत लोग भक्ति करना छोड़ देते हैं, क्योंकि वे मान-सम्मान, पद-प्रतिष्ठा के आकर्षण में उलझ जाते हैं। इसमें से बचे दस प्रतिशत लोग जो आगे भी भक्ति-भाव को बनाए रखते हैं, उन्हें मैं उच्च पद व सामाजिक प्रतिष्ठा प्रदान करता हूं।

जहाँ शक्ति का मोह छूटे, वहीं ईश्वर मिलता है

इनमें फंसकर ज्यादातर लोगों के पास फिर मेरे लिए समय ही नहीं बचता। यदि कुछ योगी, भक्त,साधु आदि इस बाधा को भी पार करके मेरी भक्ति में लगे रहते हैं तब मैं उनको अलौकिक शक्तियां देता हूं। इन अलौकिक शक्तियों की बाधा को पार करना लगभग असंभव है। करोड़ों में कोई एक होता है, जो इन शक्तियों से भी मोह नहीं करता और इस बाधा को भी पार करके केवल मुझे ही चाहता है तो मैं उसे अपने में लीन कर लेता हूं। इस प्रकार कोई एक विलक्षण शुद्ध आत्मा ही मुझे पाती है। वास्तविकता यह है कि वह मुझे नहीं पाती, बल्कि मैं ही उसमें समाता हूं ।

प्रकृति ने सभी जीव – जंतुओं को उनकी आवश्यकता और उपयोग के अनुसार गुण दिए हैं, जैसे- पक्षी आकाश में उड़ सकते हैं, मछली जल में तैर सकती है, लेकिन यदि मनुष्य भूमि से ऊपर उठने लगे और जल पर चलने लगे, तो इसमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए। यह वास्तव में हमारा विकास नहीं है। इससे हमारा अहंकार बढ़ता है और सिद्धियों और शक्तियों से मोह हमें कर्म बंधनों में जकड़ता है।

सद्गुरु रमेश

कोई भी सिद्धि या शक्ति हमें कभी मुक्त नहीं कर सकती और न ही मुक्ति के मार्ग पर आगे ले जा सकती है। मुक्ति के लिए आवश्यक हमें सहज और सरल होना चाहिए। अपने स्व के भाव में स्थित होना चाहिए। गुणातीत, भावातीत और कालातीत होने पर ही हम अनंत से एक होकर पूर्ण मुक्त और अनंत हो सकते हैं, शक्तियों और सीद्धियों से नहीं।

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