भक्ति के मूर्तिमान अवतार शिरोमणि श्रीदेवकीनंदन

जिस प्रकार गंगाजी का प्रवाह निरंतर बना रहता है, उसी प्रकार इस पृथ्वी पर भक्ति की गंगा भी अविरल बहती रहती है। यदि ऐसा न हो तो पृथ्वी पर धर्म का प्रभुत्व ही नहीं रह पाएगा। भक्ति की ऐसी ही अविरल गंगा प्रवाहित करने वाले भक्त हैं- शिरोमणि श्रीदेवकीनंदन। वे भक्ति के मूर्तिमान अवतार थे। उनके मन में बाबा गंगाराम के लिए अद्भुत छटपटाहट थी। बाबा गंगाराम की लीला में एक विलक्षण पात्र के रूप में स्वयं उन्हीं के अंश से उनका जन्म हुआ था।

उत्तरप्रदेश के बाराबंकी जनपद में कल्याणी नदी के तट पर स्थित सफदरगंज नगर में पाम संवत 1987 को होली के दिन ब्रह्म मुहूर्त में भक्त देवकीनंदन ने मानव के कल्याण का संकल्प लेकर जन्म लिया। प्रभु बाबा गंगाराम ने इहलोक से अपनी लीलाओं को संवरण कर स्वधाम प्रयाण किया, तो समय भक्त देवकीनंदन की अवस्था मात्र 6 वर्ष थी। भक्त देवकीनंदन के मन में बाबा की छवि विद्यमान थी। उस अलौकिक तेज का अनुभव अवस्था बढ़ने के साथ-साथ और प्रगाढ़ होता गया। एक अज्ञात शक्ति उन्हें अपनी ओर खींचती थी, जिससे प्रेरणा लेकर वे अपना मार्ग खोजते थे।

बाल्यावस्था से युवावस्था तक प्रखर व्यक्तित्व का विकास

समय बीतता गया, भक्त देवकीनंदन भी बाल्यावस्था से युवावस्था में प्रवेश कर चुके थे। प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा के समय उनकी विलक्षणता उजागर हो चुकी थी। उच्च शिक्षा उन्होंने राजस्थान के पिलानी नगर में ग्रहण की। वहाँ से स्नातक एवं प्रयाग से विशारद की उपाधि लोकाचारवश ग्रहण की। उन्होंने अपने विद्याध्ययन काल में शांत, गंभीर एवं मधुर स्वभाव के कारण विशेष स्थान बना लिया था। विद्याध्ययन के बाद उनमें पहले से व्याप्त अलौकिक तेज और प्रखर हो गया।

भक्त देवकीनंदन के परिणय का अवसर आया। शिव समान देवकीनंदन के लिए योग्य शक्ति स्वरूपा पत्नी का चयन देवलोक में निश्चित किया हुआ था। तदनुसार धर्मपरायण गायत्री देवी का विवाह देवकीनंदन के साथ संपन्न हुआ। गायत्री देवी अपने धर्मानुरागी पति देवकीनंदन की संबल-शक्ति, प्रेरणा तथा मार्गदर्शक बनकर आई। जिस प्रकार प्रभु बाबा गंगाराम ने भक्त देवकीनंदन को अपनी लीलाओं का माध्यम बनाया था, उसी प्रकार गायत्री देवी को भी विवाह से पूर्व दर्शन देकर, अपने अलौकिक तेज का प्रकाश दिखाकर, अपनी लीलाओं का कृपा-पात्र बना लिया था।

स्वप्न में मिला आशीर्वाद और दिव्य दांपत्य का आरंभ

बाबा ने गायत्री देवी को विवाह के पूर्व ही स्वप्न में आशीर्वाद देते हुए कहा, तुम मेरे भक्त की सहधर्मिणी बनकर मेरी देवलोकोत्तर लीलाओं का माध्यम बनोगी। तुम दया, करूणा और ज्ञान द्वारा मेरी भक्ति का प्रकाश फैलाओ। भक्त देवकीनंदन और गायत्री देवी की आस्था भक्ति में उत्तरोत्तर वृद्धि होती गई। भक्त देवकीनंदन गृहस्थ जीवन में अनासक्त भाव से रहे।

ऐसा कोई ग्रंथ नहीं था, जिसका उन्होंने अध्ययन न किया हो। दो दशकों के कोलकाता प्रवास में एक सुसंस्कृत परिवार की सृष्टि हुई। चार पुत्रियों और दो पुत्रों ने भक्त देवकीनंदन के कुल उद्यान को महकाया। भक्त देवकीनंदन और गायत्री देवी ने मात्र परिवार के कल्याण के लिए जन्म नहीं लिया था, वरन् उन्हें यह ज्योति सारे विश्व में फैलानी थी।

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