श्राद्ध परंपरा धार्मिक और विज्ञान सम्मत है
सनातन धर्म एक ऐसा धर्म है, जो मनुष्य को जीवन-पा से मुक्त करते हुए उसकी आत्मा को मोक्ष प्राप्ति की राह दिखाता है। इसी संदर्भ में मानव को अपने मृत पूर्वजों की आत्मा को भी शांति प्रदान करते हुए, उनके लिए भी मोक्ष की प्रार्थना करने के लिए पितृपक्ष की व्यवस्था की गई है, जिसके अंतर्गत तर्पण, पिंडदान आदि प्रक्रियाएं की जाती हैं।
हाँ, कुछ लोग हमारी इस परंपरा को अंधविश्वास या ढोंग करार देते हुए भ्रामक बातें फैलाते हैं। इसी से संबंधित कबीर दास का एक प्रसंग बहुत प्रसिद्ध है। एक बार कबीर के गुरू रामानंद अपने पितरों का श्राद्ध कर रहे थे। श्राद्ध में पितरों को दूध की खीर अर्पण की जाती है।
अत: उन्होंने कबीर को गाय का दूध लाने के लिए भेजा। कबीर गुरू आज्ञा से चल पड़े। रास्ते में उन्हें एक गाय मृत पड़ी दिखी। कबीर ने उसके मुँह के आगे घास रख दी और उसके समीप ही बर्तन लेकर खड़े हो गए। उधर, श्राद्ध का समय बीत रहा था। काफी देर हो गई तो रामानंद ने अपने दो शिष्यों को कबीर को देखने के लिए भेजा।
जब वह भी बहुत देर तक नहीं लौटे तो गुरु रामानंद स्वयं कबीर को खोजने निकल पड़े। मरी हुई गाय के पास कबीर को खड़ा देखकर उन्होंने पूछा, यहां क्या कर रहे हो? कबीर बोले, गुरु जी, यह गाय न तो दूध दे रही है और न ही घास खा रही है।
कबीर के सवाल ने पितृपूजा की भावना पर डाला प्रकाश
रामानंद ने कहा, बेटा, कहीं मरी हुई गाय भी दूध देती है और चारा खाती है भला? कबीर ने फौरन पूछा, महाराज, मेरे मन में जिज्ञासा है कि जब मरी हुई गाय दूध नहीं दे सकती और न ही चारा खा सकती है तो फिर बरसों पहले परलोक सिधार चुके आपके पितर दूध कैसे पियेंगे? रामानंद अपने शिष्य की इस बात पर निरुत्तर रह गए।
वास्तव में सनातन धर्म में पितरों का तर्पण और पिंडदान करने की परंपरा भावना-प्रधान है और इसके साथ प्रकृति संरक्षण की भी जिम्मेदारी है। अब तो विज्ञान भी आत्मा और भूत-प्रेत को मानने लगा है तो इस परंपरा के साथ वैज्ञानिक दृष्टिकोण भी छुपा है।
पितृपक्ष में पितरों की पूजा से मिलता है सुख और समृद्धि
सनातन धर्म ग्रंथों के अनुसार मान्यता है कि पितृपक्ष के दौरान पितर पृथ्वी लोक पर आते हैं और उनकी पूजा-अर्चना करने से घर में सुख, शांति और समृद्धि आती है। इस दौरान ब्राह्मण भोज, दक्षिणा और वस्त्र-दान, कुत्ता, गाय, चींटी और कौव्वा आदि जीवों के लिए भी भोजन की व्यवस्था करने का विधान है।
पितृपक्ष दिवंगत पूर्वजों को स्मरण करने और उनके प्रति सम्मान व्यक्त करने का एक अनुष्ठान है। तर्पण के द्वारा पितरों को जल अर्पित किया जाता है, जिससे उन्हें तृप्ति मिलती है। पिंडदान में चावल और अन्य सामग्री से पिंड बनाकर पितरों को अर्पित किया जाता है।
भारतीय धर्म ग्रंथों के अनुसार, मनुष्य पर तीन प्रकार के मुख्य ऋण माने गए हैं- देव-ऋण, ऋषि-ऋण एवं पितृ-ऋण। श्राद्ध द्वारा पूर्वजों व पितृ-ऋण को उतारना आवश्यक होता है। वर्षभर में अपने पितरों की मृत्यु-तिथि पर जल, तिल, जौ, कुश और पुष्पादि श्रद्धापूर्वक अर्पित करके उनका स्मरण करते हुए, गौग्रास और विप्र-भोज करवाया जाता है।
विष्णु पुराण के अनुसार श्रद्धाभाव से अपने पूर्वजों का मृत्यु-तिथि पर श्राद्धकर्म करने से मनुष्य, ब्रह्मा, इंद्र, रुद्र, अश्विनी कुमार, सूर्य, अग्नि, वसु, मरुद्गण, विश्वेदेव, पितृगण, पक्षी, मनुष्य, पशु, सरीसृप, ऋषिगण, भूतगण आदि संपूर्ण जगत को तृप्त करता है।
श्राद्ध में प्रदर्शन नहीं, श्रद्धा और भाव आवश्यक
श्राद्ध में अपनी सामर्थ्य से अधिक खर्च, किसी प्रकार का प्रदर्शन करना बिल्कुल मना है। पुराण के अनुसार यदि कोई श्राद्ध करने में असहाय है तो वह निश्चित तिथि पर द्विज श्रेष्ठ को प्रणाम करके एक मुट्ठी तिल या भक्ति-विनम्र चित्त से सात-आठ तिलों से पृथ्वी पर जलांजलि दे सकता है।
इसका भी अभाव हो तो एक दिन का चारा श्रद्धापूर्वक गाय को दें। इसका भी अभाव हो तो स्नानादि करके सूर्य आदि दिक्पालों को नमस्कार करते हुए, उच्च स्वर में कहें- मेरे पास श्राद्धकर्म के योग्य न वित्त है, न धन है और न अन्य सामग्री है, अत: मैं अपने पितृगण को नमस्कार करता हूं।
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वे मेरी भक्ति से ही तृप्ति लाभ करें। इस प्रकार जिन पूर्वजों के कारण हम आज इस धरा पर आए हैं, उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त करना भी हमारा कर्तव्य है। मानव मन में बड़ी शक्ति होती है। उसके अधीन होकर मूरली वाला कान्हा भी नाचने लगता है तो मन के चाहने से हमारे मृतक पूर्वज धरती पर न आते हों, यह सोचना भी नहीं चाहिए।
सनातनी परंपराएँ केवल भावनात्मक या आध्यात्मिक नहीं हैं, इनके मूल में होती है, सृष्टि के पंच तत्वों की सुरक्षा और संरक्षण की भावना तथा वैज्ञानिक पहलू भी। इसीलिए इस शुभ पितर पक्ष का लाभ उठाते हुए, अपने पुरखों का श्रद्धा से श्राद्ध करें।

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