सरल-सुलभ न्याय : शायद दृश्य सुहाने आएँगे !

विधिक सहायता तंत्र को सशक्त बनाने पर, भारत के सर्वोच्च न्यायालय परिसर में, हाल ही में संपन्न राष्ट्रीय सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को आशावादी कहा जाना चाहिए। राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (नालसा) के 30 वर्ष पूरे होने पर आयोजित इस सम्मेलन में उन्होंने न्याय व्यवस्था की नींव मजबूत करने का संकल्प दोहराया। बेशक यह एक अहम सवाल है कि कैसे न्याय हर नागरिक की पहुँच के भीतर हो – सिर्फ किताबों या अदालतों की दीवारों तक सीमित न रहे!

प्रधानमंत्री का यह कहना बहुत मायने रखता है कि न्याय सबके लिए सुलभ हो, समय पर मिले और सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि से ऊपर उठे। यह कथन गरीब, वंचित, दलित और हाशिये पर जी रहे लाखों लोगों के लिए नई उम्मीद जगाता है। भारत एक विविधतापूर्ण देश है। हमारी 70 प्रतिशत से ज्यादा आबादी ग्रामीण इलाकों में रहती है। यहाँ विधिक सहायता तंत्र एक पुल का काम करता है।

लोक अदालत और सरल भाषा से न्याय आम जनता तक

प्रधानमंत्री ने याद दिलाया कि लोक अदालतों और मुकदमा-पूर्व निपटारे से लाखों विवाद सुलझे हैं। तीन सालों में विधिक सहायता रक्षा परामर्शी प्रणाली से 8 लाख आपराधिक मामले हल हो हुए हैं। ये आँकड़े बताते हैं कि न्याय अब सिर्फ अमीरों का विशेषाधिकार नहीं, बल्कि आम आदमी का हक बन रहा है। यह कोई रहस्य नहीं कि गाँवों में महिलाएँ और मजदूर अक्सर कानूनी भूल-भुलैया से डरते हैं। लोक अदालतें इस डर को दूर कर सकती हैं।

ऐसा करके मानवाधिकारों – समानता, गरिमा और न्याय का अधिकार – को मजबूत किया जा सकता है। इसके लिए नालसा की स्थानीय इकाइयों को और मजबूत करने की जरूरत है, ताकि तहसील से तालुका तक हर कोने में न्याय की रोशनी पहुँचे।प्रधानमंत्री ने अपने कार्यकाल के शासन सुधारों का भी उचित ही बखान किया। बेशक, भारतीय न्याय संहिता जैसे नए कानूनों ने पुरानी जड़ता को तोड़ा है। व्यापार करने की आसानी और जीने की आसानी के साथ न्याय की आसानी जोड़ना एक क्रांतिकारी कदम है। इस तरह सरकार कानून के जटिल जंगल को सरल जंगल में बदल रही है।

सभी जानते हैं कि जटिल भाषा वाले कानून अक्सर आम लोगों को भ्रमित करते हैं, जिससे मुकदमों की बाढ़ आ जाती है। प्रधानमंत्री का आह्वान कि कानून ड्राफ्टिंग के समय ही सरल भाषा अपनाई जाए, एक बड़ा संदेश है। हिंदी और अन्य भारतीय भाषाएँ – अगर कानूनी दस्तावेजों में जगह पाएँ, तो अनुपालन बढ़ेगा और विवाद कम होंगे। सर्वोच्च न्यायालय की पहल – 80,000 फैसलों का 18 भारतीय भाषाओं में अनुवाद – इस दिशा में मील का पत्थर है।

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भाषाई समावेशन, तकनीक और मध्यस्थता से न्याय सुलभ

कल्पना कीजिए, एक बिहारी किसान अपने मुकदमे का फैसला हिंदी में पढ़ सके, या तमिलनाडु की महिला न्यायिक बहस को तमिल में समझ सके। यह भाषाई समावेश न केवल संवैधानिक मूल्य (अनुच्छेद 343-351) को मजबूत करेगा, बल्कि सामाजिक एकता को भी बढ़ावा देगा। अपने भाषण में प्रधानमंत्री ने तकनीक और सामुदायिक मध्यस्थता पर भी विचार किया। यूपीआई और ई-न्यायालयों का उदाहरण देकर बताया कि तकनीक लोकतंत्र की ताकत बन सकती है। ई-न्यायालयों के तीसरे चरण के लिए बजट दोगुना किया जाना सराहनीय है।

ई-फाइलिंग, वर्चुअल सुनवाई और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से न्याय घर-घर पहुँच रहा है। लेकिन, ग्रामीण भारत में इंटरनेट की कमी एक चुनौती है। नालसा के सामुदायिक मध्यस्थता प्रशिक्षण मॉड्यूल से न्याय की भारतीय परंपरा पुनर्जीवित हो सकती है – ग्राम पंचायतों से लेकर गाँव के बुजुर्गों तक का संवाद।

यानी, अदालतें अंतिम विकल्प हों, न कि पहला। मध्यस्थता से विवाद सुलझेंगे, सद्भाव बनेगा और अदालतों का बोझ कम होगा। हाँ, इसे महिलाओं और अल्पसंख्यकों के लिए सुरक्षित स्थान होना चाहिए, जहाँ डर के बिना बात हो सके! निस्संदेह, प्रधानमंत्री का यह संबोधन विकसित भारत के न्याय तंत्र का विज़न है, जहाँ हर नागरिक स्वाभिमान से जी सके। उम्मीद की जानी चाहिए कि आगे और बढ़ें तो शायद दृश्य सुहाने आएँगे! (दुष्यंत कुमार)।

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