बढ़ती ट्रेन दुर्घटनाओं के बीच रेलगाड़ियों में बिगड़ता सोशल बिहेवियर

भारत में सबसे ज्यादा सुरक्षित माने जाने वाले रेल सफर की भी यह हकीकत है कि साल 2023 में कुल 24,678 दुर्घटनाएं हुईं, जिनमें 21,803 लोग मारे गये। मगर इन मरने वालों में करीब 73 फीसदी लोग दुर्घटनाओं के दौरान नहीं बल्कि रेलगाड़ियों से गिरकर या गलत ढंग से ट्रैक पर चलने के कारण मौत का शिकार हुए। कहने का मतलब यह है कि बाकी अन्य यातायात के साधनों से कम खतरनाक होने के बावजूद रेलगाड़ियों से हर साल 20 हजार से ज्यादा लोग मारे जाते हैं। यह हमारे पास सबसे नजदीकी सरकारी आंकड़ा है, वास्तविकता इससे भी भयावह हो सकती है। पिछले 24 घंटों के अंदर छत्तीसगढ़ के बिलासपुर तथा उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर में हुई दो ट्रेन दुर्घटनाओं में 20 लोग मारे गये हैं और इससे ज्यादा लोग घायल हुए हैं। लेकिन इन दुर्घटनाओं से कहीं ज्यादा रेलवे का सफर अब अपने सोशल बिहेवियर के कारण भी खतरनाक होता जा रहा है।

जिस गति से रेलवे तरक्की कर रहा है, उसी गति से रेलवे की बदनामी भी बढ़ रही है। अगस्त 2027 तक भारत में मुंबई से अहमदाबाद तक हाई स्पीड ट्रेन दौड़ने लगेगी, स्पीड होगी 320 किलोमीटर प्रति घंटे। इससे पहले वंदे भारत एक्सप्रेस ट्रेन, जो वर्ष 2019 से लगभग 130 किलोमीटर की स्पीड से दौड़ रही है, का जाल पूरे देश में बिछ सा गया है। राजधानी, शताब्दी, गरीब रथ, तेजस जैसी रेलें भी हैं और तो और इस वर्ष मिजोरम में भी रेल पहुंच गई तथा भारत का स्वर्ग कश्मीर भी अब इससे सीधा जुड़ गया है। पर शर्मनाक यह कि जितनी गति इनकी रेल विकास नेटवर्क की है, उससे तेज गति यात्रियों के साथ हो रही बदसलूकी तथा बदइंतजामी की है।

पहले जनरल डिब्बों में चोरी, झगड़े आम थे, पर अब यह आरपीएफ के सामने रेलवे स्टेशनों पर हो रहे हैं। सरकार के मुंह मांगे दाम देकर यात्रा करने वाले यात्री अब तक की सबसे तेज दौड़ने वाली वंदे भारत में अपनी जान कब गंवा देगा, कोई नहीं जानता। इन ट्रेनों की गति भी उन्हीं पैसेंजर ट्रेनों की सी हो गई है, जो हर स्टेशन पर रुकती हैं और कई बार रेल की स्पीड से तेज यमराज आकर ले जाते हैं बीमार यात्री के प्राण। देश की जीवन रेखा रेलवे में जिसके कारण करोड़ों लोगों का जीवन चल रहा है और देश को सुविधाओं के लिए हजारों करोड़ रुपए मिलते हैं, में लगने लगा है कि अब हम अपने सामान और सम्मान के प्रति खुद ही जागरूक और सावधान रहें।

रेल यात्राओं में बढ़ती अव्यवस्था और असंवेदनशीलता

खैर, कोई बड़ी बात नहीं है कि रेल में सीट के आसपास यह लिखा मिले – यात्री अपने सामान के साथ अपने सम्मान की भी खुद ही रक्षा करें। पर ऐसा क्यों होगा यह जानने के लिए दो उदाहरण देख लीजिए। पहला उदाहरण है जबलपुर का। मध्यप्रदेश के जबलपुर रेलवे स्टेशन पर एक यात्री ने समोसा वेंडर से समोसा खरीदा और उसे यूपीआई से पेमेंट किया। लेकिन भुगतान नहीं हो पाया और रेल ने चलने की सीटी दे दी। समोसा विक्रेता ने न सिर्फ अपने पैसे लेने के लिए यात्री का कॉलर पकड़ा बल्कि उसकी घड़ी भी उतार ली।

अगर इसका वीडियो मोबाइलों पर नहीं दिखता, तो तय था कि यात्री अपनी इज्जत के साथ ही अपने सामान से भी हाथ धो बैठता और सदमे में रहता। यह बात दीगर है कि उस विक्रेता को रेलवे अफसरों ने दंडित किया। एक घटना और है। हरियाणा के रेवाड़ी में एक महिला श्रद्धालु को स्टेशन पर टीसी द्वारा लात मारने, उसके पति को पीटने का मामला भी सुर्खियों में रहा। यहां भी बाद में कार्रवाई होने की बात है।

जरा वंदे भारत में अव्यवस्था भी देख लीजिए। जोधपुर से दिल्ली जा रही वंदे भारत में कैटरिंग मैनेजर को हार्ट अटैक आया और वह उसी में गिर पड़े। जब उसमें रखे फर्स्ट एड बॉक्स को खोला गया, तो उसमें सिर्फ वह दवाएं थीं, जो आमतौर पर सर्दी-जुकाम में ही काम आती हैं। इससे बड़ी शर्मसार करने वाली दूसरी बात क्या होगी कि उस ट्रेन के एक अफसर की जान चली जाती अगर उसमें चिकित्सा विभाग से जुड़े दो अफसर नहीं होते तो।

रेलवे की तरक्की के साथ घटती यात्री सुविधाएं

सफर लग्जरी जरूर हुआ है पर जान जोखिम में डालने की कीमत पर क्यों? जब वंदे भारत की यह हालत है, तो सोचिए उस ट्रेन का क्या हश्र होगा जिसके शौचालय में भी यात्री सफर करते हैं? रेलवे में यात्रियों का सामान तो पहले ही से असुरक्षित था पर अब सम्मान भी इसी श्रेणी में आ गया है। पर क्यों? दरअसल रेलवे जिस प्रकार से तरक्की कर रहा है, उसी प्रकार से उस पर आश्रित समाज की सामाजिक सुरक्षा बढ़ नहीं रही है।

पहले हर स्टेशन पर एएच व्हीलर स्टाल हुआ करते थे, जिन पर पुस्तकों के साथ ही अखबार और कुछ खास दवाएं भी मिल जाती थीं। मगर अब यह गायब हो चुके हैं। पहले हर स्टेशन के हर प्लेटफार्म पर लोकल फूड यानी पूरी-सब्जी, फल-फ्रूट आदि के ठेले होते थे, मोची मिल जाते थे, यहां तक कि बच्चों के लिए इमरजेंसी में काम आने वाले आइटम भी मिल जाते थे, पर यह सब अब कमाई के लिए गायब हो गए हैं।

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हर चीज पर सरकार की नजर है और वह ठेका देकर कमाई करना चाहती है और यात्री भी ऑनलाइन सामान रेल में ही मंगाकर अपना सफर पूरा कर रहे हैं। जब यहां पर यह सब नहीं मिल रहे हैं, तो जो भी मिल रहा है, वह लेने के लिए स्थानीय वेंडर पूरी जी जान लगा देते हैं। परिणाम वह अपना एक रुपया भी नुकसान होते देखकर उग्र हो जाते हैं और जबलपुर समोसा कांड जैसे मजमे स्टेशनों पर नजर आ जाते हैं।

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ट्रेनों में सुरक्षा और चिकित्सा सुविधाओं की कमी

रेलगाड़ियों में, स्टेशन पर और उसके आसपास आरपीएफ की माकूल व्यवस्था होने के कारण पहले थोड़ा डर रहता था। मगर अब इनमें मांगने वाले, ट्रांसजेंडर और साधु की आड़ में बदमाश जिस प्रकार से उगाही करते हैं, वह बताता है कि सुरक्षा तो है ही नहीं, साथ ही यात्रा के दौरान कब आपके साथ बदतमीजी हो जाएगी, कहा नहीं जा सकता। इसके पीछे एक कारण यह भी है कि अब टिकट कलेक्टर के पास टिकट चैक करने की भी फुर्सत नहीं होती।

साधारण डिब्बे तो जाने दीजिए वह स्लीपर में भी नहीं आता। उसे सिर्फ इस बात का ध्यान रखना होता है कि प्रथम, द्वितीय और थर्ड एसी में कौन सा यात्री अपने स्टेशन के बाद भी सफर कर रहा है। कारण क्या है? सिर्फ यह कि या तो उससे जुर्माना वसूला जाए या फिर वह गलती के लिए कोई खुद उपाय सुझाए? सामान और सम्मान के साथ यात्रा करने में यात्रियों के साथ एक जो समस्या आ रही है, वह यह है कि उन्हें इमरजेंसी चिकित्सा भी नहीं मिल पा रही है, जिसके वह हकदार हैं।

दरअसल पहले रिजर्वेशन के दौरान चिकित्सक को वरीयता मिलती थी पर अब तो डीआरएम आदि भी उन्हें मांगने पर भी सीट की अनुपलब्धता बताकर मना कर देते हैं। रही सही कसर फर्स्ट एड बॉक्स में क्या रखना है इसकी नई वरीयता सूची नहीं होने के कारण यात्रियों को मुश्किल वक्त में दिल, दस्त, अस्थमा का अटैक, चोट लगने आदि के दौरान या तो अगले स्टेशन आने का इंतजार करना पड़ता है या फिर कोई साथी यात्री उन्हें दवा आदि उपलब्ध करा दे, पर निर्भर रहना पड़ता है।

स्पीड ट्रेनों के बीच बढ़ती सोशल दुर्घटनाएं

यहां यह बात भी नहीं भूलनी चाहिए कि कई बार मदद करना मुसीबत बन जाता है, इसलिए अब कुछ लोग तो दवा आदि छोड़िये भूखे को भोजन भी नहीं देते हैं, सहयात्री जो रेल पटरियों पर विकास की दौड़ लगा रही है, उसे इस तरह की स्थितियों में सम्मानजनक जर्नी का साथी कैसे कहा जा सकता है। वर्तमान में जब रेल और आम बजट एक हो गए हैं, तब भारत सरकार का सर्वाधिक ध्यान वंदे भारत रेलों पर है।

-मनोज वार्ष्णेय
-मनोज वार्ष्णेय

पर इनमें सुविधा पर ध्यान कितना है इसका अंदाज इसी से लग सकता है कि अगर गलती से भी यात्री गेट बंद होने से पहले रेल में नहीं चढ़ पाया, तो उसके लिए मुसीबत आ जाती है और फिर सम्मानजनक यात्रा के लिए उसे क्या कुछ नहीं करना पड़ता। एक बात यह भी है पहले रेल दुर्घटनाएं आम थीं, पर जबसे उन पर कंट्रोल हुआ है, तबसे सबसे मंहगे एसी डिब्बों, मंहगी प्रीमियम ट्रेनों में सोशल दुर्घटनाएं बढ़ रही हैं। इन दुर्घटनाओं में चोरी, मार-पीट जनरल बातें हो चुकी हैं। जब स्पीड ट्रेन चलने की तैयारी है, तब आम ट्रेनों की यह हालत है, तो कैसे कह सकते हैं कि हवा से बात करती रेलों में सब कुछ अच्छा ही होगा?

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