पीजेटीएयू में जैव प्रौद्योगिकी पर राज्य-स्तरीय कार्यशाला आयोजित

हैदराबाद, प्रोफेसर जयशंकर तेलंगाना स्टेट एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी तथा बायोटेक कंसोर्टियम इंडिया लिमिटेड द्वारा संयुक्त रूप से आज जैव प्रौद्योगिकी पर आधारित राज्य-स्तरीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। फसल सुधार के लिए जैव प्रौद्योगिकी अनुप्रयोग: प्रमुख विकास शीर्षक से आयोजित कार्यक्रम में फसल नवाचार को आगे बढ़ाने के लिए राज्य-स्तरीय नेतफत्व का आह्वान किया गया।

जानकारी देते हुए बताया गया कि भारतीय बीज उद्योग महासंघ द्वारा समर्थित कार्यशाला का उद्देश्य कृषि प्रणालियों में अत्याधुनिक अनुसंधान को वास्तविक दुनिया के अनुप्रयोगों के साथ जोड़ना था। पीजेटीएयू के प्रमुख वैज्ञानिक, नीति निर्माता और उद्योग जगत के प्रतिनिधिओं ने मंच साझा करते हुए जलवायु तनाव, कीटों का दबाव, स्थिर फसल उपज भारतीय कृषि के लिए बढ़ती चुनौतियों स्थायी उत्पादकता वृद्धि सुनिश्चित करने के लिए आनुवंशिक संशोधन और जीन संपादन सहित जैव प्रौद्योगिकी उपकरणों को अधिक से अधिक अपनाने की आवश्यकता पर बल दिया।

जैव प्रौद्योगिकी में सहभागिता और सतत नवाचार पर चर्चा

भारतीय चावल अनुसंधान संस्थान के निदेशक डॉ. आर.एम. सुंदरम ने राज्य-स्तरीय विस्तार सेवाओं को वैज्ञानिक प्रगति के साथ जोड़ने के महत्व पर प्रकाश डाला। कृषि पारिस्थितिकी तंत्र में अग्रिम पंक्ति के अधिकारियों से लेकर नीति-निर्माताओं तक जैव-प्रौद्योगिकी नवाचारों को समझने, संप्रेषित करने और उत्तरदायित्व के साथ लागू करने के लिए क्षमता निर्माण की तत्काल आवश्यकता है।

बायोटेक कंसोर्टियम इंडिया लिमिटेड की मुख्य महाप्रबंधक डॉ. विभा आहूजा ने कहा कि वैज्ञानिक प्रगति को प्रभाव में बदलने के लिए राज्य सरकारों, विश्वविद्यालयों और कृषक समुदाय के साथ सक्रिय जुड़ाव आवश्यक है। उन्होंने कहा कि बीसीआईएल का उद्देश्य हितधारकों के साथ मिलकर काम करना है, ताकि जैव प्रौद्योगिकी की जटिलताओं को दूर किया जा सके। साथ ही इसके जिम्मेदार उपयोग पर आम सहमति बनाई जा सके।

डीसीएम श्रीराम लिमिटेड के बायोसीड्स प्रभाग के डॉ. परेश वर्मा ने कहा कि जैव-प्रौद्योगिकी अपने आपमें एक साध्य नहीं, बल्कि व्यापक स्थिरता लक्ष्यों को प्राप्त करने का महत्वपूर्ण साधन है। उन्होंने कहा कि जीएम तकनीक बेहतर इनपुट-उपयोग दक्षता और कम पर्यावरणीय प्रभाव वाली फसलों को विकसित करने का अवसर प्रदान करती है, जबकि उनकी उच्च उपज क्षमता बरकरार रहती है। डॉ. वर्मा ने कहा कि जैविक और अजैविक तनावों के प्रति सहनशीलता, पोषण की कमी जैसी दीर्घकालिक चुनौतियों से निपटने के लिए अब शोधकर्ताओं के पास आनुवांशिक संशोधन और जीनोम संपादन दोनों प्रकार की तकनीकी विकल्प उपलब्ध हैं।

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सतत विकास में एकीकरण के महत्व पर बल

आईसीएआर-केंद्रीय कपास अनुसंधान संस्थान के पूर्व निदेशक डॉ. वाई.जी. प्रसाद ने अनुसंधान से विस्तार तक के सतत विकास में एकीकरण के महत्व पर बल दिया। उन्होंने कहा कि हम जैव प्रौद्योगिकी को अलग-थलग नहीं कर सकते। इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि इसे मौजूदा विस्तार ढाँचों में कितनी अच्छी तरह समाहित किया गया और हम अपने कर्मियों को कितने प्रभावी ढंग से प्रशिक्षित करते हुए किसानों के मुद्दों का कैसे समाधान करते हैं।

पीजेटीएयू में आयोजित कार्यशाला में तकनीकी और हितधारक सत्रों के दौरान कपास के क्षेत्रीय अनुभवों से लेकर जीन-संपादित फसलों के नियामक परिदृश्य तक विभिन्न विषयों पर चर्चा की गई। प्रतिभागियों ने किसानों और आम जनता को शामिल करने के लिए प्रभावी निर्णय लेने, क्षेत्रीय परीक्षणों के लिए सुव्यवस्थित अनुमोदन, बेहतर संचार रणनीतियों आदि का आह्वान किया। कार्यशाला में अकादमिक शोधकर्ताओं, छात्रों और निजी क्षेत्र के प्रतिनिधियों ने कृषि जैव प्रौद्योगिकी के बारे में अधिक साक्ष्य-आधारित चर्चा की आवश्यकता पर बल दिया।

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