आईएएस अधिकारी के खिलाफ मुकदमे पर रोक
हैदराबाद, उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को करोड़ें रुपये के ओबुलापुरम माइनिंग कंपनी (ओएमसी) मामले में एक आईएएस अधिकारी के खिलाफ मुकदमे पर रोक लगा दी। न्यायमूर्ति एम. एम. सुंदरेश और न्यायमूर्ति एन के सिंह की पीठ ने तेलंगाना उच्च न्यायालय के एक आदेश के खिलाफ वरिष्ठ आईएएस अधिकारी वाई श्रीलक्ष्मी की याचिका पर संज्ञान लेते हुए उन्हें अंतरिम राहत प्रदान की।
पीठ वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ दवे और अधिवक्ता फारुख रशीद से सहमत थी, जिन्होंने कहा कि अधिकारी के खिलाफ मुकदमा कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग है। राहत प्रदान करते हुए पीठ ने कहा कि उच्च न्यायालय का आदेश बहुत अजीब था। उसने याचिका पर सीबीआई को नोटिस जारी किया। श्रीलक्ष्मी ने 2006 से 2009 के बीच आंध्र-प्रदेश सरकार में उद्योग एवं वाणिज्य सचिव के रूप में कार्य किया था। उनका नाम कथित घोटाले में सीबीआई द्वारा दायर पूरक आरोपपत्र में शामिल किया गया था।
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आरोपमुक्त करने के लिए उन्होंने निचली अदालत का रुख किया और तर्क दिया कि उनके खिलाफ केवल संदेह थे और आरोप तय किए जाएँ, इस लायक कोई ठोस आरोप नही हैं। हालांकि, 2022 में उनकी याचिका खारिज कर दी गई।
इसके बाद उन्होंने तेलंगाना उच्च न्यायालय का रुख किया, जिसने उनकी आपराधिक पुनरीक्षण याचिका को स्वीकार कर लिया और 8 नवंबर, 2022 को उन्हें बरी कर दिया।
सीबीआई ने इसे उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी, जिसने 7 मई, 2023 को उच्च न्यायालय के आदेश को रद्द कर दिया और मामले को तर्कसंगत निर्णय के लिए वापस भेज दिया।पुनर्विचार के बाद उच्च न्यायालय ने 25 जुलाई को उनकी पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी और उनके खिलाफ मुकदमा फिर से शुरू कर दिया। सीबीआई के अनुसार, श्रीलक्ष्मी ने व्यवसायी और कर्नाटक के पूर्व मंत्री जी. जनार्दन रेड्डी के स्वामित्व वाली मेसर्स ओबुलापुरम माइनिंग कंपनी प्राइवेट लिमिटेड का कथित रूप से पक्ष लेकर एक लोक सेवक के रूप में अपने पद का दुरुपयोग किया।
सीबीआई ने आरोप लगाया कि उनके कार्यों ने अन्य आरोपियों को सरकार के साथ धोखाधड़ी करने में मदद की और सरकारी खजाने को भारी नुकसान पहुँचाया। उन पर भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 के प्रावधानों के अलावा भारतीय दंड संहिता की धारा 120बी (आपराधिक षड्यंत्र) और 409 (आपराधिक विश्वसघात) के तहत आरोप हैं। रेड्डी को दोषी ठहराया गया और उनकी अपील लंबित है।
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