हॉकिंग को जानने-बूझने की दृष्टि से ज़रूरी किताब स्टीफेन हॉकिंग : एक विवेचन  

स्टीफन हॉकिंग वैज्ञानिकों की नीहारिका के चमकीले नक्षत्र हैं। जब हम वैश्विक व्यक्तित्वों की बात करते हैं, तो उनकी फेहरिस्त बिना हॉकिंग के समावेश के पूरी नहीं हो सकती। उनमें गजब का जीवट था और गजब की मेधा। अपनी लासानी जिजीविषा और अप्रतिम मेधा से उन्होंने ज्ञान के पटल पर अद्भुत इबारतें लिखीं। उन्होंने चिकित्सकीय अनुमानों को झुठलाया और आइंस्टीन की परंपरा को विस्तार दिया।

वह सिर्फ महान वैज्ञानिक नहीं थे, बल्कि आला दर्जे के संचारक भी थे और यह मणिकांचन योग उन्हें बरबस ऊँची पायदान पर खड़ा कर देता है। उनकी अवधारणायें और कृतियां आज मानव-सभ्यता की अमूल्य थाती हैं। उनमें चीजों की व्याख्या है, कीमती सूत्र हैं, संकेत हैं और चेतावनियां भी।  

ऐसी विरल शख्सियत के बारे में आईसेक्ट पब्लिकेशन की किताब आई है : ‘स्टीफन हॉकिंग : एक विवेचन’। संपादन संतोष चौबे और मोहन सगोरिया का है। सौ पेजी इस किताब का चरित्र मिश्रित है। उसमें जीवन-परिचय है, विचार हैं, विविध पहलू हैं; साक्षात्कार है और आश्चर्यजनक तौर पर कवितायें भी हैं। विभिन्न विधाओं का योग परस्पर पूरक के तौर पर है और हॉकिंग के महान व्यक्तित्व को व्यक्त और विश्लेषित करने का माध्यम भी।

किताब की शुरूआत हॉकिंग के ब्रह्मांड के जन्म के बारे में एकीकृत सिद्धांत की अवधारणा से होती है, जहां धर्म उस विज्ञान की नयी खोजों की राह कठिन बनाता है, जो तर्क और प्रमाणों की नींव पर खड़ा होता है।  
किताब का पहला अध्याय ‘ब्रह्मांड पर विचार’ सर्वाधिक महत्वपूर्ण और सारगर्भित अध्याय है और उसमें भी पादेव प्रसाद का आलेख ‘दिक और काल के सजग प्रहरी’ खगोल भौतिकी के पर्याय बन चुके हॉकिंग के बारे में मूल्यवान जानकारियां परोसता है।

वरिष्ठ लेखक देवेंद्र मेवाड़ी का आलेख ‘किताबों के आईने में ब्रह्मांड दिखता है’, जो क्रमानुसार कृति का दूसरा आलेख है, इसी का पूरक एवं विस्तार है। आगे की सारी सामग्री इन दो प्रारंभिक आलेखों की बातों को आगे बढ़ाती अथवा विस्तार व आयाम देती है। ये आलेख हॉकिंग के बारे में कई जरूरी, कई नयी और अल्पज्ञात सूचनायें देते हैं और हमारे ज्ञान-कोषों को समृद्ध करने के साथ ही हमारी जिज्ञासा के तंतुओं को बल प्रदान करते हैं। यकीनन हॉकिंग को जानना एक नितांत अशक्त व्यक्ति के जटिल और आधुनिक चिंतन को जानना है।

हॉकिंग की कृति ‘ए ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ टाइम’ का बेस्ट सेलर होना अचरज नहीं है। अचरज तो तब होता, जब उनकी यह सारवान कृति बेस्ट सेलर नहीं होती। उन्होंने विख्यात खगोलज्ञ पेन रोज के साथ महाविस्फोट से ब्रह्मांड के जन्म की बिग बैंग थ्योरी ही प्रतिपादित नहीं की, बल्कि द यूनीवर्स, जार्जेस कॉस्मिक ट्रेजर हंट, जार्ज एण्ड द बिग बैंग आदि के जरिये जिज्ञासु और जागृत जनों तथा बच्चों को विज्ञान के भेदों का रहस्य बताया।

यही नहीं, उन्होंने अपंगता के बावजूद आधुनिकतम तकनीक से भारत समेत अनेक देशों में व्याख्यान भी दिये। महान खगोलविद गैलीलियो की मृत्यु के ऐन तीन सौ साल बाद 8 जनवरी, 1942 को जनमे हॉकिंग इक्कीस वर्ष की वय में एमियोट्राफिक लेटरल स्कलेरोसि (एएलएस) नामक लाइलाज बीमारी के शिकार हो गये थे और डॉक्टरों ने उनके बमुश्किल तीन साल जीने की भविष्यवाणी कर दी थी, लेकिन हॉकिंग ने 76 वर्षों का सुदीर्घ और सार्थक जीवन जिया।

उनके चेहरे की कतिपय मांसपेशियां हिलती थीं, बायें हाथ की मात्र एक ऊँगली काम करती थी। व्हीलचेयर पर बैठे-बैठे वह एक-एक शब्द तलाशते कुर्सी से जुड़े कम्प्यूटर से काम करते और वॉयस सिंथेसाइजर से शब्दालाप करते। कैंब्रिज विश्वविद्यालय में लुकासियन चेयर पर वह तीस साल (1979-2009) बतौर आचार्य प्रतिष्ठित रहे, जिस पर कभी महान आइजक न्यूटन आसीन थे।

वे भारत आये और टाटा इंस्टीट्यूट, मुंबई में उन्होंने स्ट्रिंग थ्योरी पर व्याख्यान दिया। मुंबई में संक्षेप में ‘हमारा ब्रह्मांड और भविष्य में विज्ञान’ पर व्याख्यान में उन्होंने अछूते संदर्भों को छुआ और तदंतर दिल्ली में सीरी फोर्ट सभागार में भविष्य कथन : ज्योतिष से कृष्ण विवर तक पर बोलते हुए ब्रह्मांड के रहस्यों को बखूबी समेट लिया।  

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हॉकिंग साफ-साफ कहते हैं कि ब्रह्मांड का कोई सृजनकर्ता नहीं है। विशाल ब्रह्मांड में करीब 200 अरब मंदाकिनियां हैं और प्रत्येक में 200 अरब तारे और यह 13.7 अरब प्रकाश वर्षों की दूरी तक फैला है। यक्ष प्रश्न है कि क्या उनका स्ट्रिंग-सिद्धांत ‘सर्वस्व-सिद्धांत’ – थ्योरी ऑफ एवरीथिंग’ बन जाएगा? क्या सापेक्षता और क्वांटम यांत्रिकी का एकीकरण होगा? क्या मूलभूत कण बिंदुवत नहीं रज्जुवत है? क्या हॉकिंग की धरती के विनाश की चेतावनी खरी उतरेगी और हमें नया वैकल्पिक ग्रह तलाश लेना चाहिये? क्या यह सही है कि किसी ने ब्रह्मांड की रचना नहीं की है और न ही कोई उसे चला रहा है?  

हॉकिंग को नोबुल नहीं मिला, लेकिन जीते-जी किंवदंती बने वह नोबुल से ऊपर उठ चुके थे। डॉ. कपूरमल जैन, अरूण कुमार पाठक, विजन कुमार पांडेय, डॉ. वसी हैदर, प्रमोद भार्गव आदि के आलेख हॉकिंग और हॉकिंग की बातों को समझने के मान से उपयोगी हैं। डॉ. मनीष मोहन गोरे का लेख पृथ्वी के संकटों पर आशंका करने वाला वैज्ञानिक सोना है, तो हॉकिंग से साक्षात्कार का उनका अनुवाद सोहागा।

शरद कोकास, राघवेन्द्र तिवारी और शुचि मिश्रा की कविताएं विषयानुरूप हैं। शुचि ने हॉकिंग की जटिल शख्सियत को कविता में बखूबी बाँधा है। विवेच्य पुस्तक विश्व-इतिहास की एक महानतम शख्सियत को जानने-बूझने की दृष्टि से जरूरी, उपयोगी और पठनीय किताब है। हिन्दी-संसार में ऐसे उपाम स्वागतेय हैं। किताब में संपादकीय टिप्पणी या पूर्वरंग की अनुपस्थिति न्यूनता-सी प्रतीत होती है। यह किताब ऐसी ही अन्य किताबों की श्रंखला की जरूरत और महत्ता को रेखांकित करती है।

डॉ. सुधीर सक्सेना

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