टैरिफ की धमकी और भारत का जवाब !

अपने आपको सारी दुनिया का भाग्यविधाता समझने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप और नाटो प्रमुख मार्क रूट की ने रूस के साथ व्यापार करने वाले देशों (विशेषकर भारत, चीन और ब्राजील) को 100 प्रतिशत से 500 प्रतिशत तक टैरिफ की धमकी दी है। यह धमकी रूस-यूक्रेन युद्ध के संदर्भ में दी गई है, जिसमें अमेरिका और नाटो रूस पर दबाव बनाने के लिए नए आर्थिक हथियारों का इस्तेमाल करना चाहते हैं। देखना रोचक होगा कि इस धमकी का भारत के लिए क्या अर्थ है और भारत के पास इसका क्या तोड़ संभव है?

जगज़ाहिर है कि ट्रंप और नाटो प्रमुख की यह धमकी रूस को यूक्रेन युद्ध में पीछे हटने के लिए मजबूर करने की रणनीति का हिस्सा है। ट्रंप ने साफ कहा है कि अगर रूस 50 दिनों के भीतर शांति समझौता नहीं करता, तो वह रूस के साथ व्यापार करने वाले देशों पर भारी टैरिफ लगाएँगे। नाटो प्रमुख मार्क रूट ने इसे और स्पष्ट करते हुए भारत, चीन और ब्राजील को चेतावनी दी कि रूसी तेल और गैस खरीदने की कीमत उन्हें आर्थिक प्रतिबंधों के रूप में चुकानी पड़ सकती है।

भारत की ऊर्जा नीति पर विदेशी दबाव का करारा जवाब

इसका लक्ष्य रूस की आर्थिक जीवनरेखा को कमजोर करना है, क्योंकि भारत और चीन रूस के सबसे बड़े तेल खरीदार हैं। भारत 2022 में अपने तेल आयात का केवल 2 प्रतिशत रूस से लेता था। लेकिन अब हम लगभग 40 प्रतिशत रूसी तेल पर निर्भर हैं – सस्ते दामों पर उपलब्ध है न! समझना होगा कि ट्रंप आदि की टैरिफ धमकी केवल आर्थिक नहीं, बल्कि भू-राजनीतिक भी है।

अमेरिका और नाटो चाहते हैं कि भारत जैसे देश रूस के खिलाफ पश्चिमी खेमे में शामिल हों। लेकिन क्या यह इतना आसान है? भारत के लिए रूस न केवल ऊर्जा आपूर्तिकर्ता है, बल्कि हमारा रक्षा और तकनीकी सहयोग का भी लंबा इतिहास रहा है।जैसा कि होना ही था, भारत ने इस धमकी को सिरे से खारिज करते हुए अपनी ऊर्जा सुरक्षा और राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता दी है। पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने स्पष्ट कहा है कि भारत किसी भी स्थिति से निपटने में सक्षम है।

अगर रूसी तेल की आपूर्ति बाधित होती है, तो भारत के पास मध्य पूर्व जैसे वैकल्पिक स्रोत हैं। भारत ने यह भी कहा है कि हमारा रूस के साथ व्यापार वैश्विक प्रतिबंधों के दायरे में नहीं आता और यह वैश्विक ऊर्जा बाजार को स्थिर करने में मदद करता है। इससे पश्चिम को यह समझ लेना चाहिए कि भारत किसी भी बाहरी दबाव में आकर अपनी नीतियाँ बदलने वाला नहीं है!

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टैरिफ की चुनौती और भारत की रणनीतिक तैयारी

कहना न होगा कि भारत का यह रुख दोगलेपन के खिलाफ भी है। जहाँ पश्चिमी देश रूस पर प्रतिबंध लगाने की बात करते हैं, वहीं यह भी किसी से छिपा नहीं कि यूरोपीय देश भी गैस और अन्य संसाधनों के लिए रूस पर निर्भर हैं। भारत ने साफ कहा है कि हम अपनी ऊर्जा जरूरतों को बाजार की वास्तविकताओं और भू-राजनीतिक परिस्थितियों के आधार पर तय करेंगे!
गौरतलब है कि धमकी के बावजूद, भारत के लिए स्थिति पूरी तरह प्रतिकूल नहीं है।

अमेरिका के साथ चल रही व्यापार वार्ता एक अवसर साबित हो सकती है। ट्रंप ने संकेत दिए हैं कि भारत के साथ एक बड़ी व्यापार डील हो सकती है, जो टैरिफ की मार को कम कर सकती है। विदेश मंत्री एस.जयशंकर ने भी अमेरिकी सीनेटरों के साथ भारत की ऊर्जा सुरक्षा की चिंताओं को साझा किया है।

सयाने बता रहे हैं कि अगर टैरिफ लागू होते हैं, तो भारत के फार्मास्यूटिकल, टेक्सटाइल और आईटी जैसे निर्यात क्षेत्र प्रभावित हो सकते हैं। ऐसे में, भारत की रणनीति विविधीकरण और आत्मनिर्भरता पर केंद्रित होनी चाहिए। स्वदेशी तेल उत्पादन को बढ़ाकर और वैकल्पिक आपूर्तिकर्ताओं पर ध्यान देकर भारत इस चुनौती से निपट सकता है।

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