तारिक रहमान होंगे बांग्लादेश के नये प्रधानमंत्री

बांग्लादेश में बेगमों की जंग पर तो विराम लग गया है कि खालिदा ज़िया का निधन हो चुका है और शेख हसीना देश में मौजूद नहीं हैं और मानवता के विरुद्ध अपराधों के लिए अदालत उन्हें मौत की सज़ा सुना चुकी है। इसलिए बांग्लादेश में तारिक रहमान के साथ एक नये युग का आरंभ हो रहा है। वक़्त ही बतायेगा कि वह अपने देश को किस दिशा में लेकर जायेंगे, जबकि उनसे उम्मीदें तो बहुत हैं।

जनरल ज़िया-उर-रहमान व खालिदा ज़िया के 60-वर्षीय बेटे तारिक रहमान 17-साल तक निर्वासन में रहने के बाद स्वदेश लौटे, चुनाव लड़ा और अब वह बांग्लादेश के नये प्रधानमंत्री बनने जा रहे हैं। उनके बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) गठबंधन ने 12 फरवरी 2026 को जातीय संसद के लिए हुए 13वें आम चुनाव में 212 सीटें जीती हैं, स्थानीय जमुना आदि टीवी चैनलों के अनुसार। बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी के नेतृत्व वाले 11 दलों के गठबंधन को कुल 70 सीटें हासिल हुई हैं, जिसमें 5 सीटें नेशनल सिटीजन पार्टी की हैं, जिसने जेन जी आंदोलन में शेख हसीना का तख्ता पलटने में अहम भूमिका अदा की थी।

अवामी लीग पर प्रतिबंध, चुनाव से बाहर रहीं शेख हसीना

शेख हसीना, जो इस समय भारत में राजनीतिक शरण लिए हुए हैं, कि अवामी लीग पार्टी पर प्रतिबंध लगा हुआ है, इसलिए वह चुनाव में भाग न ले सकी। शेख हसीना ने चुनाव को सुनियोजित स्वांग बताया है। बहरहाल, 300 संसदीय सीटों (जिनमें से एक पर चुनाव स्थगित हुआ, प्रत्याशी के निधन के कारण) के लिए 50 राजनीतिक दलों के सदस्यों व स्वतंत्र प्रत्याशियों सहित लगभग 2000 उम्मीदवार मैदान में थे और तकरीबन 48 प्रतिशत मतदान हुआ, जो 2024 के आम चुनाव के 42 प्रतिशत मतदान से बेहतर रहा। इस मतदान में मतदाताओं को दो वोट डालनी थीं, एक सांसद चुनने के लिए और दूसरी संवैधानिक सुधारों के संदर्भ में जनमतसंग्रह के लिए।

बांग्लादेश के एक सदन वाले राष्ट्रीय संसद को जातीय संघसद कहते हैं। इसमें 300 सदस्य सीधे जनता द्वारा चुनकर आते हैं, जबकि 50 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हैं, जो चुनाव के बाद पार्टियों में उनकी जीत के अनुपात में विभाजित कर दी जाती हैं। बांग्लादेश में 1973 से 2026 तक जो कुल 13 आम चुनाव हुए हैं, उनमें से सिर्फ पांच (1991, 1996-2, 2001, 2008 व 2026) को ही अंतरराष्ट्रीय चुनाव पर्यवेक्षकों ने स्वतंत्र व निष्पक्ष चुनाव घोषित किये हैं। 1996 में दो बार आम चुनाव कराने पड़े थे; क्योंकि 1996-1 चुनाव को अधिकतर विपक्षी पार्टियों ने बायकाट किया था और बीएनपी ने खुद को 278 सीटों पर जीता हुआ दिखाया था। दरअसल, बांग्लादेश में अधिकतर चुनावों की कहानी राजनीतिक पार्टियों द्वारा बायकाट व उन पर प्रतिबंध के इर्दगिर्द ही घूमती रही है।

यह भी पढ़ें… डिजिटल धोखाधड़ी पर तुरंत लगे लगाम!

अवामी लीग पर प्रतिबंध, बीएनपी-जमात बनी मुख्य दावेदार

इस बार के आम चुनाव में अपदस्थ प्रधानमंत्री शेख हसीना की अवामी लीग पर प्रतिबंध था और जो पार्टियां- बीएनपी व जमात-ए-इस्लामी, जो वर्षों तक चुनावी दौड़ से बाहर रहीं या उन्हें बाहर रखा गया, सत्ता की मुख्य दावेदार बनकर उभरी। शेख हसीना ने 2009 के बाद से 15 साल तक निरंतर राज किया और उनके शासनकाल में बांग्लादेश में स्थिरता व आर्थिक विकास देखने को मिला। लेकिन साथ ही उन पर तानाशाह होने के भी आरोप लगे, जिसकी वजह से उनके खिलाफ विद्रोह हुआ और 2024 में उन्हें अपनी जान बचाकर भारत में शरण लेनी पड़ी।

यह केवल इतना नहीं था कि अलोकप्रिय हुए नेता को हिंसक विद्रोह में सत्ता से हटा दिया गया बल्कि छात्रों के आंदोलन में बांग्लादेश के बुनियादी इतिहास को भी मिटाने का प्रयास किया गया, जिसमें शेख हसीना के पिता व उनकी पार्टी अवामी लीग के संस्थापक बंगबंधु शेख मुजीबुर्रहमान प्रमुख शख्सियत थे। जैसे ही अवामी लीग के लीडर व समर्थक अंडरग्राउंड हुए बीएनपी व जमात-ए-इस्लामी जैसी पार्टियां सत्ता के नये दावेदारों के रूप में उभरने लगीं, विशेषकर नोबेल पुरस्कार विजेता मुहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार के नेतृत्व में।

हालांकि अब तारिक रहमान के नेतृत्व में बीएनपी गठबंधन का सत्ता में आना तय हो गया है, लेकिन बांग्लादेश के समक्ष चुनौतियों का अम्बार लगा हुआ है। सबसे पहले तो पिछले 18 माह में धीमे हुए आर्थिक विकास को पटरी पर लाने की आवश्यकता है ताकि बेरोज़गारी, महंगाई आदि समस्याओं का समाधान निकाला जा सके। इतना ही महत्वपूर्ण यह भी है कि अल्पसंख्यक हिन्दू समुदाय पर जो हिंसक हमले हो रहे हैं, उन पर त्वरित प्रभाव से विराम लगाया जाये।

बीएनपी से सांप्रदायिक सौहार्द की बढ़ती उम्मीदें

बीएनपी से सांप्रदायिक सौहार्द कायम करने व धर्मनिरपेक्ष मूल्यों को प्रोत्साहित करने की उम्मीद की जा सकती है, विशेषकर इसलिए कि उसके प्रमुख हिन्दू लीडर ज्ञानेश्वर चंद्र रॉय ने ढाका-3 सीट से शानदार जीत दर्ज की है, जमात-ए-इस्लामी के मुहम्मद शाहीनूर इस्लाम को पराजित करके। रॉय की जीत बांग्लादेश के राजनीतिक इतिहास में महत्वपूर्ण मील का पत्थर है कि ढाका-3, जो मुस्लिम बहुल सीट है, पर पहली बार कोई हिन्दू प्रत्याशी जीता है। रॉय बीएनपी की स्टैंडिंग कमेटी के सदस्य हैं।

बहरहाल, तारिक रहमान के समक्ष भारत से संबंध सुधारने की भी चुनौती है, जो शेख हसीना को शरण देने की वजह से प्रभावित हुए हैं। गौरतलब है कि तारिक रहमान जब आत्म-निर्वासन से बांग्लादेश लौटे थे, तो नई दिल्ली ने अपने विदेश मंत्री एस.जयशंकर को उनसे मुल़ाकात करने के लिए ढाका भेजा था। इसलिए भारत व बांग्लादेश के संबंध बेहतर होने की संभावना है। बांग्लादेश में मतदान के साथ ही जुलाई नेशनल चार्टर, जो 84-पॉइंट का सुधार पैकेज है, पर भी जनमतसंग्रह हुआ था।

इस चार्टर को जनता ने अपनी सहमति दी है, लेकिन जनमतसंग्रह कहीं भी अच्छा विचार साबित नहीं हुआ है। ब्रिटेन के सांसद 1998 में इस विषय पर कुछ भी तय नहीं कर पाये थे। ब्रिटेन से अधिक स्विट्ज़रलैंड जनमतसंग्रह में माहिर रहा है कि उसने 1981 व 1999 के बीच 148 जनमतसंग्रह कराये। भारत में 1975 के बाद से कोई जनमतसंग्रह नहीं हुआ है, पाकिस्तान ने आखिरी बार यह 2002 में कराया था। क्या इससे स्विस लोकतंत्र हम से अधिक परफेक्ट हो जाता है? सिद्धांत में, शायद। व्यवहार में, हमें नतीजों के आधार पर समीक्षा करनी चाहिए।

भारत में सार्वभौमिक मतदान अधिकार का ऐतिहासिक महत्व

आज़ाद भारत में प्रत्येक पुरुष व महिला को 1950 में ही मतदान का अधिकार मिल गया था। स्विट्ज़रलैंड में पुरुषों ने 1959 में महिलाओं को मतदान दिये जाने के जनमतसंग्रह को ठुकरा दिया था और इस गलती का सुधार इसके 12 साल बाद किया गया। यह सही है कि जनमतसंग्रह लोकतंत्र की जड़ों के बहुत करीब है, लेकिन विशेषज्ञों की राय से संचालित प्रतिनिधि लोकतंत्र के अपने लाभ हैं। अधिकतर समकालीन मुद्दे जैसे भारत में अधिक परमाणु ऊर्जा प्लांट्स और वह भी थोरियम ईंधन वाले, होने चाहिए या नहीं, आम मतदाताओं के लिए बहुत जटिल हैं।

सरकारें जनता को अपनी नीतियों के लाभ व हानि के बारे में जागरूक करें, लेकिन इस प्रकार का पांच मिनट का ज्ञान प्रोफेशनल महारत का विकल्प नहीं है। साथ ही जनमतसंग्रह अक्सर तब आयोजित किया जाता है, जब सरकारें कोई स्टैंड लेने से डरती हैं। याद करें कि केरल ने 2018 में जनमतसंग्रह कराने का ऑफर दिया था कि महिलाओं को सबरीमला मंदिर में प्रवेश करना चाहिए या नहीं। उसी साल ब्रिटेन ने 52 प्रतिशत हां व 48 प्रतिशत न से यूरोपीय संघ से निकलना तय किया, जो अब गलत साबित हुआ।

विजय कपूर

जनमतसंग्रह की सबसे बड़ी समस्या बहुसंख्यावाद है, जिससे से अल्पसंख्यकों के हित प्रभावित होते हैं। बांग्लादेश में बेगमों की जंग पर तो विराम लग गया है कि खालिदा ज़िया का निधन हो चुका है और शेख हसीना देश में मौजूद नहीं हैं और मानवता के विरुद्ध अपराधों के लिए अदालत उन्हें मौत की सज़ा सुना चुकी है। इसलिए बांग्लादेश में तारिक रहमान के साथ एक नये युग का आरंभ हो रहा है। वक़्त ही बतायेगा कि वह अपने देश को किस दिशा में लेकर जायेंगे, जबकि उनसे उम्मीदें तो बहुत हैं।

Exit mobile version