हैदराबाद, तेलंगाना उच्च न्यायालय ने किसान के आत्महत्या करने पर 10 वर्ष तक उसके परिवार को आर्थिक मुआवजा जारी न करने पर सरकार के प्रति कड़ा असंतोष जताया। अदालत ने कहा कि कपास की फसल बोने के बाद प्रतिकूल परिस्थितियों के चलते फसल खराब हो जाने से किसान के आत्महत्या करने पर उसके परिवार को संभालने की जिम्मेदारी सरकार की है, लेकिन सरकार ने कर्ज अदा न कर पाने के कारण आत्महत्या करने वाले अन्नदाता किसान के परिवार को पिछले 10 वर्ष से आर्थिक मुआवजा क्यों जारी नहीं किया गया।
यह सवाल उठाते हुए सरकार को खरी-खोटी सुनाई। इस मामले पर इसके पूर्व आदेश जारी करने के बावजूद भी आदेश को अमल में न लाने के कारण सरकार के प्रति असंतोष जताया। वर्ष 2014 के दौरान पति के आत्महत्या कर लेने पर सरकार द्वारा आर्थिक मुआवजा मंजूर करने के बावजूद भी एमआरओ की लापरवाही के चलते मुआवजा जारी नहीं किया गया।
हनमकोंडा ज़िले के आत्माकूर मंडल, नीरुकुल्ला ग्राम निवासी लक्कुरुसु मोगिली ने कर्ज लेकर कपास की फसल बोई थी और फसल ठीक से न होने और उगाई गई फसल के लिए उचित दाम न मिलने के कारण मोगिली ने 17 जुलाई, 2014 को कीटनाशक पीकर आत्महत्या कर ली थी। इस मामले पर पुलिस ने अपनी रिपोर्ट भी पेश की और मोगिली की पत्नी लक्ष्मी ने आर्थिक मुआवजे के संबंध में आवेदन किया।
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लक्ष्मी को मुआवजा न मिलने पर उच्च न्यायालय का आदेश
अधिकारियों की ओर से सकारात्मक प्रतिक्रिया न मिलने पर लक्ष्मी ने उच्च न्यायालय की शरण ली। इस याचिका पर अदालत ने सुनवाई कर गत अक्तूबर माह में सरकारी आदेश संख्या 173 के तहत ऋण के भुगतान हेतु एक लाख रुपये और पाँच लाख रुपये का मुआवजा देने के आदेश दिए। इस आदेश पर अमल न होने के कारण लक्ष्मी ने अदालत में अवमानना की याचिका दायर की, जिस पर हाल ही में उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जस्टिस सी.वी. भास्कर रेड्डी ने सुनवाई की।
दस्तावेजों की जाँच-पड़ताल करने पर पता चला कि 13 फरवरी को ज़िलाधीश ने 6 लाख रुपये मंजूर करते हुए आदेश जारी किए, लेकिन तहसीलदार ने जान-बूझकर 6 लाख रुपये जारी नहीं किए। तहसीलदार के इस व्यवहार पर अदालत ने कड़ी फटकार लगाई और कहा कि तहसीलदार के इस व्यवहार से आत्महत्या करने वाले किसानों के परिवारों को संभालने की सरकार की योजना पर पानी फिर गया है।
न्यायाधीश ने अवमानना की याचिका पर अगला आदेश जारी होने तक आत्माकूर के तहसीलदार के वेतन, भत्तों समेत अन्य भुगतानों पर रोक लगाते हुए ज़िलाधीश को आदेश दिए। पीड़ित को मंजूर किए गए 6 लाख रुपये प्राप्त होने तक तहसीलदार के वेतन का भुगतान न किया जाए। इस आदेश के साथ मामले की सुनवाई 28 मार्च तक स्थगित कर दी गई।
