काम चलाऊ राष्ट्र की महान गाथा
हम भारतीयों के जीवन में अगर कोई चीज खून में घुली हो, तो वह है जुगाड़। जुगाड़ हमारी नसों में बहता है, हमारी जुबान पर चढ़ा है और हमारी योजनाओं का आधार है। जिसे बाकी दुनिया अव्यवस्था कहती है, उसे हम नवाचार का नाम देकर गर्व से ढोते हैं। हमारे लिए कोई काम असंभव नहीं, बस थोड़ी रस्सी, एक ईंट, पुराना डिब्बा और दो तीन परिचित मिल जाएँ फिर देखिए जुगाड़ का कमाल !
हमारे मोहल्ले में ही देख लीजिए। एक पड़ोसी का पंखा खराब हुआ तो उसने नया नहीं खरीदा। पहले पुराने को उल्टा घुमाया, फिर उसमें लकड़ी की पत्ती फँसाई, तार जोड़े, ऊपर से झाड़न बाँधी और अब वह पंखा नहीं, हवा से कपड़े झाड़ने की मशीन बन गया है। पूछो तो कहेगा भैया, काम चल गया न? नया क्यों लें! स्कूल-कॉलेजों में तो जुगाड़ का पूरा पाठ्यक्रम चलता है। परीक्षा में नकल न पकड़ी जाए, इसके लिए बच्चों ने जुगाड़ से छोटी-छोटी चिट बनाना सीख लिया। कोई मोज़े में छुपाता है, कोई पेन की रििफल में डालता है और कोई तो घड़ी के डायल में ही उत्तर लिखवा लाता है।
पकड़े जाएँ तो मासूम चेहरा और बहाना- सर, ये तो पहले से ही था! गाँवों में जुगाड़ की असली प्रयोगशाला मिलती है। खेत में ट्रैक्टर नहीं है? कोई बात नहीं बाइक के पिछले पहिए पर लकड़ी की पटिया बाँध दी, उसमें लोहे की नाली जोड़ दी और किसान जी खेत जोतने चल पड़े। कोई पेट्रोल पंप दूर है? तो क्या हुआ मिट्टी के तेल से काम चला लिया। जुगाड़ से कुछ भी संभव है बस दिमाग में बिजली होनी चाहिए।
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जुगाड़: दफ्तर, शादी और रोज़गार का समाधान
नगरपालिका भी जुगाड़ की छात्रा है। कचरे के ढेर हटाने के लिए सालाना बजट तो पास होता है, लेकिन कर्मचारी जुगाड़ लगाकर दो ट्रक की जगह आधा ट्रक चलाते हैं। एक ही गाड़ी से तीन मोहल्लों का कचरा ढोकर एक ही मैदान में पटक देते हैं। कागज़ों में हर गली चमक रही है, असल में बदबू ही बदबू। फिर भी अधिकारी मुस्कुराकर कहते हैं सब नियंत्रण में है, जुगाड़ मजबूत है!
शादी-ब्याह में भी जुगाड़ का महत्व कम नहीं। पाँच सौ मेहमान बुलाओ, खाना तीन सौ का बनवाओ। जो पहले खा ले वो राजा, बाकी जुगाड़ से देख लेंगे। कोई आधा पेट खाकर चला जाएगा, कोई पत्तल में चम्मच मारकर चुप हो जाएगा। अगर खाने में कोई चीज़ कम पड़ जाए तो पानी वाला रायता डाल दो, सब हजम! सरकारी दफ़्तरों में जुगाड़ तो महाकाव्य है। वहाँ फाइल तभी चलती है जब बाबू की मेज़ के कोने में एक ल़िफाफा सरकाया जाए।
अगर आपके पास जुगाड़ है तो एक दिन में बिजली का कनेक्शन, पानी का नल और जन्म-मृत्यु प्रमाण पत्र सब कुछ मिल सकता है। और अगर नहीं है तो आप फाइल लेकर चक्कर लगाते रहिए जुगाड़ आपको दर्शन नहीं देगा। जुगाड़ अब रोजगार भी पैदा कर रहा है। शहरों में बेरोज़गार लड़के मोटरसाइकिल पर डिब्बे बाँधकर दूधवाला बन जाते हैं, ठेले पर अंगूर बेचने वाला कबाड़ी बन जाता है। बिजली नहीं है? जुगाड़ से तार खींच लो। गाड़ी नहीं है? पुराने स्कूटर को चार पहिए जोड़कर चालू कर लो। हमारे लिए जुगाड़ साधन नहीं, साधना है।
राजनीति से सोशल मीडिया तक जुगाड़ की महिमा
राजनीति में तो जुगाड़ की पूजा होती है। कोई भी उम्मीदवार टिकट नहीं पाए तो जुगाड़ लगाता है किसी बड़े नेता के पैर छू ले, किसी का अभिनंदन कर ले, किसी की सभा में भीड़ जुटा दे। फिर देखिए अगले चुनाव में टिकट उसका ही होगा। सरकार में भी जुगाड़ से कुर्सी पर बैठे लोग कभी-कभी भूल जाते हैं कि वो वहाँ जनता के लिए हैं, उन्हें तो जुगाड़ से अपने लिए व्यवस्था बनानी है।
सोशल मीडिया पर भी जुगाड़ की महिमा अपार है। फोटो खींचनी है तो पोज़ और फिल्टर से काम नहीं चलेगा, जुगाड़ से रोशनी, पर्दे और पंखा भी समायोजित करना होगा। कुछ लोग तो शादियों में दूल्हा-दुल्हन के पीछे खड़े होकर मुफ्त का जुगाड़ छवि भी बना लेते हैं हम भी इस विवाह में शामिल हुए! आजकल बच्चे पढ़ाई के बजाय जुगाड़ सीख रहे हैं कैसे प्रोजेक्ट बिना बनाए जमा कराना है, कैसे नंबर बढ़वाने हैं, कैसे स्कूल की वर्दी बदलवानी है।
माँ-बाप भी जुगाड़ पर ही जी रहे हैं महंगाई से लड़ना है तो हर चीज़ को दो बार इस्तेमाल करो, कागज़ का ल़िफाफा बार-बार मोड़ो, प्लास्टिक की बोतल में सरसों का तेल भरो। निष्कर्षत: अगर किसी दिन इस देश में जुगाड़ पर प्रतिबंध लग जाए तो शायद आधा देश थम जाए। हम मशीन बना सकते हैं, विज्ञान खोज सकते हैं, लेकिन जुगाड़ हमारी आत्मा है। हमारी समस्याएँ जितनी बड़ी हैं, उनका हल उतना ही छोटा है बस जुगाड़ चाहिए। जुगाड़ से ही देश चलता है, साइकिल से लेकर रॉकेट तक सब जुगाड़ से चलाना हमसे सीखिए। कभी-कभी लगता है, इस देश का असली राष्ट्रगान होना चाहिए जुगाड़ ही जीवन है। तभी तो हम कहते हैं, कर लो जुगाड़, बाकी सब बेकार।
–डॉ.सिद्धार्थ कुमार जौहरी
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