हॉकर का सफर

मुझे याद आता है, तीस-पैंतीस बरस से भी ज्यादा बीत गए। मेरे परिवार के सभी सदस्य आज भी अखबार पढ़ने के बड़े ही शौकीन हैं। इसके पीछे शायद कारण यह भी रहा कि मेरे दादाजी स्वयं गांव के बीचोंबीच स्थित पीपल के गट्टे पर बैठकर अखबार पढ़ा करते थे। उन्होंने अपने जमाने में दसवीं तक पढ़ाई की थी।
वह वहाँ लोगों के साथ ताश खेलने के उद्देश्य से रोज़ जाते थे और दिन में एक बार पीपल के गट्टे के कोने में स्थित सेठ मनसुखलाल की दुकान से अखबार लेकर पढ़ा करते थे और गांववालों को देश-दुनिया की खबरें बांच-बांच कर सुनाया करते थे। वहाँ खूब अच्छा डिस्कशन होता था, देश-दुनिया की खबरों पर तब। पीपल का गट्टा शायद गांव-शहरों, विदेशों की खबरों का संवाद केंद्र-सा बन गया था। दरअसल, दादाजी का मानना था कि अखबार पढ़ने से मनुष्य के समय का सदुपयोग होता है। उनका मानना था कि अखबार हमें फ़ालतू की गपशप, मिथ्या, झूठ, लड़ाई-झगड़े, द्वेष, ईर्ष्या, चोरी इत्यादि से बचाकर सांसारिक ज्ञान प्रदान करता है। खैर, बाद में पिताजी ने दादाजी के अखबार पढ़ने के शौक और उनकी अखबार में विशेष रूचि के चलते एक न्यूज़पेपर हॉकर पीटर से कहकर घर पर ही अखबार डालवाने लगे। तब गांवों में टीवी भी नहीं हुआ करते थे। मनोरंजन का सबसे बेहतरीन और अच्छा साधन अखबार ही थे। पिताजी द्वारा घर पर ही अखबार डलवाने से हम सबको भी अखबार पढ़ने की लत-सी लग गई। सुबह पांच बजते ही हम सबमें अखबार पढ़ने की होड़-सी लग जाती। सर्दी हो या गर्मी, बारिश हो या कोई भी मौसम सभी अपने-अपने कमरों में अलसुबह भले ही बिस्तर पर लेटे हों या किसी काम में व्यस्त हों, लेकिन नजरें दरवाजे की दहलीज़ पर टिकी होतीं कि कब हॉकर फुर्ती से अपनी पुरानी साइकिल पर आएगा और अखबार दरवाजे पर फेंककर चला जाएगा। जैसे ही हॉकर पीटर (छोटी उम्र का युवक) अपनी साईकिल की घंटी बजाता, दरवाजे की ओर यकायक ढेरों कदम एक साथ दौड़ पड़ते।
पहले मैं-पहले मैं की जैसे होड़ लग जाती। कभी छीना-झपटी तो कभी अखबार को लेकर आपसी तकरार तक भी हो जाया करती थी। जिस दिन अखबार पढ़ने को नहीं मिलता, उस दिन ऐसा लगने लगता जैसे आज दिमाग को उसकी खुऱाक नहीं मिली। दरअसल, हमारे पेट की तरह ही हमारे दिमाग को भी हर रोज़ अपनी खुऱाक समय पर चाहिए होती है, जो अखबार से मिलती है।
आज टीवी, इंटरनेट, सोशल नेटवर्किंग साइट्स का जमाना है। डिस्को-बार की भरमार है। हर कहीं सैलून हैं, मनोरंजन के अनेक साधन हैं, लेकिन जो मनोरंजन व ज्ञान अखबार में है, वह कहीं भी नहीं है। यहां तक कि मुझे भी अखबार पढ़ने के प्रति इतना जज्बा, जोश और नशा है कि धर्मपत्नी से भी बहुत बार इसके लिए बहस हो जाती है। अखबार न हुआ, कोई प्रेमिका हो गई हो जैसे। खैर, पीटर पिछले आठ-दस महीनों से हमारे यहां अखबार डाल रहा है। अक्सर अलसुबह अखबार डाल जाता है पीटर, लेकिन पिछले चार-पांच दिन बीते अखबार सुबह आठ बजे के बाद आने लगा। इतने समय तक मेरा दफ्तर का टाइम हो जात, जिससे अखबार को पढ़ना तो दूर सरसरी नज़र से देखना भी संभव नहीं हो पा रहा था। मैं अक्सर बिना अखबार पढ़े ही दफ्तर जाने लगा। मन में अखबार न पढ़ने की खीज जरूर होती, लेकिन पीटर पर गुस्सा करते-करते दफ्तर की दुनिया में खो जाता और फिर अखबार को भूल जाता। यह सिलसिला पंद्रह-बीस से भी ज्यादा दिन तक चलता रहा। पीटर रोज आठ बजे के बाद अखबार डाल रहा था। कभी कभी तो नौ-साढ़े नौ भी बज जाया करते थे। इधर, ऑफिस व्यस्तताओं के बीच मुझे भी पीटर को यह कहने तक का भी समय नहीं मिल पाया कि- बेटा! समय पर अखबार डालकर जाया करो। शाम को बासी अखबार पढ़ने का कोई फायदा नहीं है। लेट आने पर न तो मैं, न ही मेरी पत्नी और न ही बच्चे अखबार का मजा चख पाते हैं, क्योंकि सभी अपनी दिनचर्या में व्यस्त हो जाते हैं।
बीस-पच्चीस दिन गुजरने के बाद एक दिन रविवार को हम सभी देर सुबह तक सो रहे थे। तभी दरवाजे पर पीटर की साईकिल की वार्निंग बेल ने मुझे सहसा ही नींद से जगा दिया। बाद में पता चला कि पीटर ने आज अखबार के तीन महीनों के बिल के भुगतान के संदर्भ में घंटी बजाई थी। मैं उठा और आँख मलते हुए दरवाजे की ओर गया।
पीटर ने मुझसे कहा, लीजिए बाबूजी, आपके अखबार का तीन महीने का बिल। मैंने पीटर से अखबार का बिल लिया और पैसे चुकाकर कहा, बेटा पीटर! आजकल अखबार बहुत लेट मिल रहा है, क्या बात है? पहले तो साढ़े पांच बजे डाल दिया करते थे। आजकल तुम्हारी टाइमिंग ठीक नहीं है। इस पर पीटर ने अपना सिर खुजाते हुए थोड़ा झिझकते/सकपकाते हुए कहने लगा, वो क्या है न बाबूजी! रात को देर तक कॉटन फैक्ट्री में काम करता हूँ। आजकल महंगाई बहुत बढ़ गई है। हॉकर के काम से घर खर्च निकालना बहुत मुश्किल हो रहा है। कॉटन फैक्ट्री में देर रात तक काम करने से सुबह जल्दी आँख नहीं खुल पाती है और फिर सुबह उठकर अखबार के साथ क्लासीफाइड और सप्ताह विशेष के सप्लीमेंट भी रोज़ डालने पड़ते हैं न! कई बार अखबार में अलग से पैम्फलेट डालने के थोड़े-बहुत पैसे मिल जाते हैं। पेट पालने की मजबूरी है, इसलिए लेट हो जाता हूं। बाबूजी एक न्यूज़पेपर हॉकर बहुत ही कठिन जिंदगी जीता है।
मेरा हर दिन सुबह साढ़े चार बजे से शुरू होता है। न कोई छुट्टी, न कोई हाफ-डे, न कोई रिलेक्स। सालभर में होली-दीवाली दो ही छुट्टियां आती हैं। बाबूजी! मुझे हर सुबह पाँच बजे अखबार की एजेंसी पर पहुंचना होता है, ताकि कॉलोनी के सैकड़ों घरों और दुकानों में 6 से 8 मील की दूरी तय करके समय पर पहुंच सकूं। बाबूजी! कुछ स्थानों पर तो पाँचवीं से आठवीं मंजिल तक अपार्टमेंट हैं। कई बार सुबह सात बजे तक भी लिफ्ट चालू नहीं होती है, क्योंकि लिफ्ट चालू करने वाला देर रात ड्यूटी करके सुबह सात बजे तक सोया रहता है। इसलिए मुझे समाचार-पत्र सीधे ग्राहकों के दरवाजे तक पहुंचाने के लिए सैकड़ों सीढ़ियाँ हर रोज़ चढ़नी पड़ती हैं। मेरी साइकिल भी बहुत पुरानी हो गई है, जिससे यह रास्ता पूरा करने में लगभग दो घंटे से भी ज्यादा का समय लग जाता है। अखबार बांटने के बाद मुझे स्कूल के लिए तैयार होने के लिए घर वापस भी जाना होता है। जून से सितंबर के मानसून के महीनों के दौरान तो मुझे अपना दिन बहुत पहले शुरू करना पड़ता है। अखबार को प्लास्टिक से ढकने, उन्हें सैट करने/जंचाने में अतिरिक्त समय लग जाता है। बारिश के दिनों में साइकिल चलाना भी मुश्किल हो जाता है। बारिश रुकने के इंतजार में सड़क किनारे की दुकानों या किसी टीन शैड अथवा किसी पेड़ की शरण लेते हैं। कभी-कभार ऐसे स्थानों पर होते हैं, जहां बारिश से शरीर ढकने-छुपाने की जगह तक नहीं मिलती है। इन स्थितियों में भीग भी जाते हैं, सर्दी-जुकाम हो जाता है। कीचड़ में लथपथ हो जाता हूं। खैर, आपको आगे से किसी तरह की कोई शिकायत का मौका नहीं दूँगा। आपको अखबार समय पर मिल जाया करेगा। मैं इस बात का पूरा ध्यान रखूंगा। मेरी पूरी कोशिश होती है कि मेरे ग्राहकों को किसी तरह का कोई कष्ट न हो। हमें थोड़ी तकल़ीफ उठानी पड़े तो कोई बात नहीं है। यह तो हमारी रोजी-रोटी है, काम है। इसी से हमारी जिंदगी जैसे-तैसे चलती है।
मैं पीटर की बातें बहुत ध्यान से सुन रहा था। हालांकि, मैं नींद से थोड़ा सुस्ता रहा था, लेकिन उसकी बातें सुनकर मेरी आंखों में एक नई रौशनी जगमगा उठी थी। मैं इस सोच में खो गया कि न्यूज़पेपर हॉकर्स तब जागते हैं, जब हम अपने घरों में चैन और आराम की नींद सो रहे होते हैं। कम तनख्वाह में भी वे विकट जलवायु परिस्थितियों में भी संघर्षपूर्ण जीवन जीते हैं। कई बार न जाने अखबार की लेट-लतीफी को लेकर कितनी-कितनी बातें लोगों के मुंह से सुनते हैं। भरी सर्दी और तेज बारिश में अखबार डालने का काम कितना कठिन है, यह एक न्यूज़पेपर हॉकर ही जानता है। घरों में बंद होकर अखबार का इंतजार करने वाले यह कभी नहीं जान सकते।
मैं अपनी ही सोच में खोया था। मुझे पता ही नहीं चला कि पीटर कब अपनी साईकिल लेकर वहां से निकल पड़ा। मेरी तंद्रा तब टूटी जब पत्नी वान्या ने मुझे आवाज़ दी, साहिल के पापा! अब दरवाजे पर ही खड़े रहेंगे या अंदर भी आएँगे। चाय ठंडी हो रही है। मैं भीतर गया और डायनिंग टेबल पर बैठकर चाय की चुस्कियां लेने लगा, लेकिन मन में विचारों का सैलाब तो उमड़-घूमड़ रहा था कि काश! कोई न्यूज़पेपर हॉकर्स की पीड़ा और व्यथा को भी समझ सके!
(-सुनील कुमार महला)
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