लापरवाही की हद : बच्चों को संक्रमित खून!

झारखंड के चाईबासा में जो घटना सामने आई है, उसने पूरे देश को झकझोर दिया है। थैलेसेमिया से पीड़ित कुछ बच्चों को अस्पताल में ऐसा रक्त चढ़ा दिया गया, जो एचआईवी संक्रमण से ग्रस्त था। एक सात साल के बच्चे में जब संक्रमण की पुष्टि हुई, तब यह चौंकाने वाला सच खुला कि और भी बच्चों को वही संक्रमित खून दिया गया था। यह कोई सामान्य भूल नहीं, बल्कि हमारे स्वास्थ्य तंत्र की गंभीर विफलता है। इस एक घटना ने दिखा दिया है कि व्यवस्था कितनी लापरवाह, असंवेदनशील और ग़ैर-जवाबदेह है!

गौरतलब है कि थैलेसेमिया के मरीज, खासकर बच्चे, पूरी तरह अस्पतालों और ब्लड बैंक पर निर्भर रहते हैं। उन्हें जीवन भर नियमित अंतराल पर खून चढ़ाना पड़ता है। उनके लिए हर बार रक्तदान एक नई उम्मीद होता है – जीवन का विस्तार! लेकिन जब उसी रक्त में मौत का ज़हर मिल जाए, तो यह केवल चिकित्सा-त्रुटि नहीं, बल्कि एक सामाजिक अपराध है। इन बच्चों और उनके परिवारों के भरोसे का टूटना और उम्मीदों का बिखरना स्वाभाविक है।

स्वास्थ्य तंत्र की लापरवाही और भरोसे का पतन

कहने को तो अस्पतालों में खून चढ़ाने से पहले हर यूनिट की जाँच अनिवार्य होती है। लेकिन यह मामला साबित करता है कि या तो वह जाँच कागज़ों पर ही पूरी कर दी जाती है, या फिर उसे चलताऊ ढंग से निपटा दिया जाता है। ब्लड बैंक में परीक्षण की मशीनें, प्रशिक्षित कर्मचारी और निगरानी की व्यवस्था अक्सर नाम मात्र की होती है। फिर भी, अगर किसी ने थोड़ी-सी जिम्मेदारी दिखाई होती, तो मासूमों की यह त्रासदी टल सकती थी!

इस हादसे का एक और पहलू भी है। राज्य की जवाबदेही! अस्पताल सरकारी है, इसलिए यह मामला केवल किसी डॉक्टर या तकनीशियन की गलती नहीं कहा जा सकता। यह पूरे तंत्र की नाकामी है। सुना है, राज्य सरकार ने कुछ अधिकारियों को निलंबित किया है और पीड़ित परिवारों को मुआवजे का आश्वासन दिया है। लेकिन सवाल यह है कि, क्या इतनी बड़ी लापरवाही को कुछ निलंबनों और आश्वासनों से ढक दिया जाएगा? क्या किसी ने सोचा है कि इन बच्चों को अब जीवन भर एचआईवी की दवा और निगरानी में रहना होगा? उनका अपराधी कौन है?

Ad

यह घटना हमें सोचने पर मजबूर करती है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य-व्यवस्था किस दिशा में जा रही है। पतन के गर्त में ही न! स्वास्थ्य-व्यवस्था केवल इलाज नहीं, भरोसे का भी नाम है। अपने बच्चे को अस्पताल लेकर जाने वाला परिवार मानता है कि वहाँ उसकी देखभाल होगी, उसकी सुरक्षा होगी। वही अस्पताल कत्लगाह साबित हो, तो?

यह भी पढ़ें… पूर्वोत्तर की एकजुट आवाज़ : एक नई उम्मीद

स्वास्थ्य व्यवस्था में जवाबदेही और सुधार की पुकार

क्या प्रशासन कोरी बयानबाज़ी और लीपापोती से आगे बढ़कर ठोस कदम उठाने को तैयार है? कुछ नहीं कहा जा सकता। क्या राज्य के सभी ब्लड बैंकों और ट्रांसफ्यूजन केंद्रों का तत्काल स्वतंत्र ऑडिट नहीं कराया जाना चाहिए? ज़रूरी है कि पीड़ित बच्चों और उनके परिवारों को न केवल आर्थिक मुआवजा दिया जाए, बल्कि जीवन भर की चिकित्सा, मनोवैज्ञानिक सहायता और शिक्षा-सहायता भी निःशुल्क दी जाए। साथ ही, स्वास्थ्य विभाग में जवाबदेही की व्यवस्था विकसित की जाए और हर स्तर पर यह सुनिश्चित किया जाए कि ऐसी चूक दोबारा न हो।

माना कि यह मामला किसी एक जिले या एक अस्पताल का है। लेकिन यह पूरे देश की चिकित्सा-व्यवस्था के लिए चेतावनी की तरह है। अगर अब भी हमने सुधार नहीं किया, तो अगली बार यह त्रासदी किसी और शहर, किसी और बच्चे के साथ दोहराई जा सकती है। और तब हम सब उतने ही दोषी होंगे, जितने आज चाईबासा के जिम्मेदार लोग हैं! अंतत, इतना और कि बच्चों की जिंदगी से खिलवाड़ कोई गलती नहीं, यह एक पाप है। अस्पताल ही भय का पर्याय बन जाए, तो समाज का विश्वास तो टूटेगा ही। यह विश्वास फिर से जगाना होगा – क्योंकि स्वास्थ्य सेवा कोई उपकार नहीं, बल्कि हर नागरिक का बुनियादी अधिकार है।

अब आपके लिए डेली हिंदी मिलाप द्वारा हर दिन ताज़ा समाचार और सूचनाओं की जानकारी के लिए हमारे सोशल मीडिया हैंडल की सेवाएं प्रस्तुत हैं। हमें फॉलो करने के लिए लिए Facebook , Instagram और Twitter पर क्लिक करें।

Ad

Related Articles

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

Back to top button